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ज़रूर बने आनंद- मंत्रालय

एक अप्रैल को दो सूचनायें एक साथ मिलीं। कुपोषण के मामले में मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश शीर्ष पर हैं। दूसरी सूचना हमारे मुख्यमंत्री ने दी कि राज्य में शीघ्र ही एक आनंद मंत्रालय-“मिनिस्ट्री आॅफ़ हैपिनैस” का गठन किया जाएगा। उत्तम विचार है। सरकार हमें आनंदित करने के लिये जो भी कर सकती है, जरूर करे। लेकिन समाज-विज्ञानी और मनो-विज्ञानी दोनों का कथन है कि आनंद बाहर से नहीं आता, अंदर से आता है। वैज्ञानिक फाॅसफोरेसेन्ट मछलियों का उदाहरण देते हैं। वे, समुद्र-तल में अपने शिकार पर जो प्रकाश फेंकती है वह उनके भीतर से ही आता है। मुख्यमंत्रीजी दर्शनशास्त्री हैं। वे, सुख और आनंद का अंतर भली भांति जानते हैं। एक बुद्धिवाची है तो दूसरा हृदयवाची हैं। यक्ष प्रश्न है कि हमारी भौतिक उपलब्धियाँ हमें सुख देती हैं या आनंद ? रामायण में लंका और महाभारत में हस्तिनापुर भौतिक समृद्धि के शिखर पर थे। लेकिन क्या रावण या धृतराष्ट्र को सर्वसुखों के बावजूद आनंद मिला? समृद्धिलोक अमेरिका में भी आनंद का अभाव है।
संन्यास-दीक्षा के बाद बहुत से साधु अपने नाम के साथ जो शब्द जोड़ते हैं उसे योगपट्ट कहते हैं। इसमें एक शब्द आनंद भी है। इसीलिये अधिकांश साधुओं के नाम के साथ आनंद शब्द जुड़ा होता है। हमारा असली आनंद तो परमानंद और ब्रह्मानंद है। अब तो आनंद शब्द का भी राजनीतिकरण हो गया है। असम में अगले मुख्यमंत्री पद के लिये भाजपा ने सरबानंद सोनोवाल को अपना उम्मीदवार बनाया है। अतः वहां भाजपा का चुनावी नारा है: सबका आनंद: सरबानंद।
श्री श्री रविशंकर महाराज के आर्ट आॅफ़ लिविंग अभियान के बहुत पहले एक फ्रांसीसी दार्शनिक-लेखक आंद्रे मौराँ ने एक पुस्तक इसी शीर्षक से लिखी थी। इसके अनूदित सातवें संस्करण में एक चेप्टर है “आर्ट आॅफ हैपिनैस”। आनंद की परिभाषा करते हुये आंदे्र लिखते हैं “एक ऐसी मनःस्थिति जिसे इंसान सदैव बनाये रखना चाहता है।” लेकिन फिर वे स्वयं ही प्रश्न करते हैं कि “क्या यह संभव है ?” उन्होंने दो अंग्रेज़ी शब्दों का सहारा लिया जो सुखानन्द के समानार्थी हैं- हेपिनेस और एक्स्टसी। लेकिन ये अनुभव भी अस्थायी है। भारतीय संस्कृति में इसका उत्तर सत्यं-शिवं-सुन्दरं और चिन्मयानंद की अवधारणा में है। सुख और आनंद को लेकर मैंने तीन किस्से सुने थे जो इस लेख के अंत में सुनाऊँगा।
शास्त्र-वचन है कि आनंद और विषाद दोनों का स्रोत हमारा मन है। मन में प्रवृत्ति है। सो स्मृतियों का संकलन विकलन है। राग-द्वैष और मेरा-तेरा है सो विकृति भी है। वह चंचल है। यद्यपि इन्द्रियों का स्वामी है किन्तु उसकी चंचलता का कारण भी इन्द्रियां ही हैं। अतः विशुद्ध मनःस्थिति मुशकिल है जबकि आनंद का स्रोत वही है। हमारे यहां एक सुप्रचलित कहावत है जो वास्तव में रामायण की अर्धाली है: हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ। इसमें ‘लाभ’, ‘जीवन’ और ‘यश’ सुख के स्रोत हैं जबकि ‘हानि’, ‘मृत्यु’ और ‘अपयश’ दुख के। अनुभव व्यक्तिगत हैं।
अब वे तीनों किस्से पाठकों से शेयर करें जिनका उल्लेख पूर्व में किया है। एक असाध्य रोग से दुखी राजा को किसी ने सलाह दी कि ‘यदि आप आनंदित व्यक्ति की कमीज़ पहने तो स्वस्थ हो जायेंगे। आनंद आ जायेगा।’ बड़ी मेहनत से राजा के लोगों को एक व्यक्ति मिला जो पहाड़ी की चोटी पर नाचता, गाता मस्ती में झूम रहा था। इन लोगों ने नीचे से आवाज़ दी- ‘वहीं रुको। हमें तुम्हारी कमीज़ चाहिये। उसके बराबर सोना देंगे।’ वह वहीं से चिल्लाया- ‘माफ़ करना। मेरे तन पर कोई कमीज़ है ही नहीं।’
दूसरा किस्सा भी एक राजा का ही है। मृत्यु के समय उसने अपने विश्वस्त मंत्री से कहा- ‘मैं अगले जन्म में शूकर होऊँगा। सिर्फ़ तुम ही मुझे पहचान पाओगे। जैसे ही मुझे देखो तुरंत मार देना। मेरी मुक्ति हो जायेगी।’ मंत्री ने उसे शूकर योनि में पहचानकर मारना चाहा। राजा बोला- ‘दया करो। मत मारो। अब तो मुझे इसी योनि में आनंद आने लगा है। तीसरी कहानी भी राजा की ही है। संभवतः समृद्धि में ही आनंद का अभाव रहता है। एक राजा ने अप्रतिम सुन्दरी एक भिखारिन को अपनी रानी बना लिया। वह दुखी रहने लगी। खाना-पीना भी छोड़ दिया। राजा उसे किसी भी तरह आनंदित न कर सका। तब एक राजनेता ने सलाह दी कि एक विशाल बारादरी बनवाकर उसमें बहुत से आलों में भांति-भांति के व्यंजन रखे जायें और फिर रानी के खाने की प्रतिक्रिया राजा छिपकर देखें। राजा ने देखा कि रानी प्रत्येक आले के सामने जाकर भिक्षा मांगने की मुद्रा में कहती ‘दाता कुछ दे दे’ और एक-एक व्यंजन उठाकर खा लेती। कुछ ही दिनों में वह सुखी और आनंदित दिखने लगी। हमारे संस्कार भी आनंद-स्रोत हैं। जब संस्कार आनंद देते हैं फिर सरकार क्यों नहीं ?

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Ghanshyam Saxena

Media/Journalist/Author

Madhya Pradesh ,  INDIA

Ghanshyam Saxena
(Bilingual Author)
Retd. Joint Director P.R. Govt. of M.P. 

Status : Married (Wife Mrs. Kusum Saxena)
Edited : 1. Vanashree : 1st Hindi Magazine on environment
2. Grey Hair : Senior Citizens Magazine (Continuing)
Initiated : Environmental programme from A.I.R. namely Hariyali Aur Khushhali.
Wrote : Hundreds of articles and papers on environment; in leading newspapers and magazine regular column writing on various subjects.
Participated : In a host of programmes on A.I.R. Television, Seminars and Workshops.
Associated : 1. With World Watch Institute, Washington.
2. Senior Citizen's groups, Bhopal, M.P. 
Travelled : Widely - U.S.A. Twelve European Countries, Dubai and South East Asian Countries.
Authored : 1. Forest Crisis (Natraj pub. Dehradoon) English.
2. Teen Golion se Teen Gumbadon Tak (A study of communialism: National, Delhi)
3. Jungle Satya Aur Jungle Satyagraha (Deptt. of Culture, M.P.)
4. Manmohan Singh : Kaanto ka Taj (National)
5. Breasts and Bullets (Novel : Grapwine, Delhi) English.
6. Pradhan Mantri ki Angoothi (Satire : Naman, Delhi)
7. Jungle ki Sachchi Kahaniyan (Benten Books, Bhopal)
8. Ummedon ke Ulloo (Satire : Naman, Delhi
Occasional : Poetry - Writing
Address : 4, Professor's Colony, Bhopal
Contact : 9893094221, 0755-4220100
Email : saksenaji@gmail.com

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