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खुशियों की फसल

मैं खुशियों की खेती करता हूँ
कभी रंग बोता हूँ
कभी खुशबू बोता हूँ
कभी वक़्त देता हूँ
तो कभी प्यार बोता हूँ
मैं खुशियों की खेती करता हूँ

कुछ, बोते ही फसलें देती हैं
कुछ सदियों बाद देती हैं
कुछ अभी तो कुछ कभी देती हैं
फल की चिंता नहीं करता हूँ
मैं खुशियों की खेती करता हूँ

कभी सरसों सी चटख चांदनी
तो कभी केसर का स्वाद मैं पाता हूँ
कभी आम सा बौरा उठता
तो कभी महुआ सा मदमाता हूँ
मैं खुशियों की खेती करता हूँ

पश्चिम में जब ढलता सूरज
पुरवैय्या को याद करता हूँ
कभी नन्हेसे पल्लव को छूकर
ख़ुशी का आंसू ढलकाता हूँ
मैं खुशियों की खेती करता हूँ
मैं खुशियों की खेती करता हूँ

-Poem written by my father

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Pallavi Sapre

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