Call Us : (+91) 0755 4096900-06 - Mail : bloggerspark@scratchmysoul.com

Prof. Prem Mohan Lakhotia : Blogs

Blog

जीवन में ज़िन्दादिली के आजमाए हुए नुस्ख़े


ज़िन्दादिली = ज़िन्दगी को पूरा जीने का लुत्फ़

यही माना है और जीया है मैंने मेरे ७० से अधिक सालों के दरमियां। कुछ अनुभूत सूत्र बांटूं! आज की मंथन मंच की गोष्ठी में मित्रों के साथ बांटे थे। पसंद भी किये गये और मित्रों ने कहा कि उपयोगी हैं। मेरे जीवन के ये खरे सत्य शायद आपके काम आ जाएं!

* ईश्वर मेरा चिर साथी है। वह साथ है तो मैं अवश्य बहुमत में हूं - मैं सच्चा हूं और उसका काम करना मेरा हक़ है। ईश्वर को भूल कर मैं ज़िन्दादिल कभी नहीं रह सकता।

* चिन्ताओं के लिए मेरे पास समय नहीं है। कुछ भी करो - भले ही कोई साधारण सा काम। व्यस्त रहो, मस्त रहो। मुस्कुराते रहो।

* जो मैं कर सकता हूं, उसे मेरे अलावा कोई और नहीं कर सकता। उस अनूठे काम के लिए ही मैं बनाया गया। नहीं किया तो मैं ही मिट्टी का माधो।

* भावना दिमाग़ से और चिन्तन दिल से। संवेदना बिना विचार व्यर्थ। मुझे नहीं बनना केवल ज़िन्दा बदन, होना है मुझे ज़िन्दा दिल - बुलन्द जोश और नेक ईरादे वाला।

* तर्क मेरी विधा नहीं; सिद्धान्त मेरी पोथी नहीं; मेरा न्याय और विवेक साफ़गोई और निर्मल भाव से किए गए कर्तव्य में है। इस मरणशील उम्र में कुछ ऐसा ज़रूर करना है जिसके लिए मैं अमित रूप से याद किया जा सकूं।

* केवल अर्थ ही समर्थ नहीं करता। मेरी सार्थकता मेरी मानवीयता में है; मेरे कर्म-संस्कारों में है; मेरी रचनात्मक कृति में है; मेरी जग-हित के लिए कर्मठता में है। अपने लिए जीकर क्या करूंगा - वह तो रोज़ मरने जैसा है।

* अथातो जिज्ञासा - कुछ नया और सुरुचिपूर्ण जानते रहना ही तो ज़िन्दादिली है - जिज्ञासा ही मिट गई, ज्ञान-पिपासा ही मिट गई तो जीने का मक़सद क्या?

* उत्कर्ष के लिए संघर्ष करने से ही संवरती है ज़िंदगी।

* अपने ऊपर नियंत्रण रखो - संयम हि खलु: जीवनं। उदासी और दु:खों से टूटा, अपनी मर्यादा से फिसला तो जीया क्या?

* मेरी ज़िंदगी का एक ही नेम - वो हैं प्रेम। न मिले तो भी बांटता रहूं। अपना नाम सार्थक नहीं किया तो बेकार ही धरा पर जन्म लिया।

* संस्कार से पहले सभ्यता नहीं चाहिए मुझे।

मेरी हरदम एक ही ख़्वाहिश रही है -

दिल दे तो इस मिज़ाज़ का परवरदिगार दे।
जो रंज की घड़ी को भी ख़ुशी से गुज़ार दे। .... कलम शायर दाग की

प्रेम मोहन
१ मार्च २०१४

Post your comment

9 Comments

About The Author

Photograph

Prof. Prem Mohan Lakhotia

Media/Journalist/Author

Rajasthan ,  INDIA

A person of diverse interests, hobbies and faculty. Previously engaged as a professor of management and holds additional recognition as a linguist and literary figure. Has also served industry as a top ranking executive for nearly 25 years. Presently offers services in the following areas: communications consultant, trans-creator, literary critic, personality guide and nameologist. A well-known public speaker at programmes of diverse nature and has written daily with exception-less regularity over the last six decades in a reflective mood within an elegant format of a diary. His poems, thoughts and essays can be found in multiple languages and have been widely printed at national and international levels. His tenth book titled SHASHWAT GEETIKAYEN, is a lyrical trans-creation in Hindi of Vaidic and other classical Sanskrit Scriptures and was released for distribution in January 2010. Shashwat Geetikayen, has been widely acclaimed in literary circles across the globe. Has traveled internationally and is known as a keen blogger on various social and spiritual matters. Contact : SMRITI, 141/A, Ganesh Nagar, Iskcon Road, Mansarovar, Jaipur 302 020. Rajasthan, India Phones : 0141 315 1955; 09829111955; email:bhashavid@gmail.com

View More 

Samsung

Recent Blogs By Author

Sony