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Yogeshwar Dubey : Blogs

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परिन्दा और मैं !

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...............परिन्दा और मैं ! ...............
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मेरी खिड़की पर झुकी डाली पर एक परिन्दा आया,
और खूब चह-चहाया!

फिर फुदक-फुदक कर उसकी संगिनी पास आई,
दोनों ने जुगल-बंदी गाई और खूब चोंच लड़ाई!

हर सुबह उनकी चह-चहाहट मुझे उस खिड़की तक खींच लाती थी,
ऊगते सूरज की किरणें शायद उन्हे कहीं गुदगुदाती थीं!

ये जुगल-जोड़ी फिर उस असीम आकाश में कहीं फुर्र हो जाती थी,
सूरज का धन्यवाद करने शायद आकाश की ऊँचाई छू आती थी!

लेकिन आज ये परिन्दा कुछ तिनके चोंच में लेकर लौटा है,
और इस तरह उस डाल पर एक आशियाना बनाना शुरू होता है!

कड़ी मेहनत से उसने ये घोंसला बनाया,
और एक शाम संगिनी को उस घोंसले में बैठा पाया!

चंद दिनों में परिंदे के घोंसले में चार चूजे चह-चहा रहे थे,
फूल से नूतन कंठों से नये स्वर में नये गीत गा रहे थे!

फिर परिन्दा चोंच भर-भर के चारा लाता रहा,
और खुद की भूख-प्यास भूल कर उन चूजों को चारा खिलाता रहा!

फिर उसने चूजों का हौसला बढ़ाया,
उन्हें उड़ना सिखाया, गिर के सम्भलना सिखाया!

वो साया सा उनके साथ रहता था,
और उनके कान में जाने क्या-क्या कहता था!

फिर वो समय आया कि सारे चूजे कहीं उड़ गये,
आँधी के झोंके में आशियाने के तिनके भी कहीं बिखर गये!

उसकी संगिनी जो सदा रही उसके साथ,
उसे भी निगल गया वो विराट आकाश!

मुझे याद है मैंने भी कड़ी मेहनत से एक रेत का घरोंदा बनाया था,
और मैंने भी बड़े प्यार से उसमें एक अपना परिवार बसाया था!

लेकिन समय ने करवट बदली, बच्चे बड़े होकर विदेशों में जाकर बस गये,
मेरे प्रियजन भी शायद तारा-मण्डल बन कर आकाश में कहीं सज गये!

आज इस अँधेरे से कमरे में बंद मैं बीते पलों में खोया हूँ,
और हर शाम कई-कई बार अकेला ही रोया हूँ!

लेकिन ये परिन्दा आज सुबह फिर उस डाली पर अकेला ही फुदक रहा है,
और सूरज की नई किरणों के साथ फिर खूब चहक रहा है!

शायद वो मुझे चिड़ा रहा है,
या ज़िंदगी जीने का कोई नया तरीका सीखा रहा है!

परिन्दा, मैं समझ गया, तू आज भी इस कुदरत का हिस्सा है,
और मेरा जीवन तो सिर्फ बीते पलों का किस्सा है!

तू आज भी ऊगते सूरज की अगुवाई करने दौड़ जाता है,
और डूबते सूरज को आकाश के अंतिम छोर तक छोड़ आता है!

परिन्दा, तू पल-पल में जीता है और खूब चहकता है,
मगर मैं बीते पलों में जीता हूँ और अकेले ही रोता हूँ!
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................................................................- योगेश्वर दुबे
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Because I fall in LOVE at FIRST sight
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because I REALLY LOVE YOU !

Don’t ever ask me “How I feel about You ?”
Because I like you EXACTLY as you are !

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My choice is simple “I like the BEST !”

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till life permits !”

Be careful while dealing with me,
because relation by HEART is more valuable
to me than by Blood !

My expressions are NOT to express something,
but to indicate something inexpressible !

Don't ever weigh my words, they are just fun !

My serious thought – Seriousness is the source
of all diseases !

The very purpose of coming here is to LEARN !

I am productive ONLY when I am PLAYFUL !

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to distinguish between humans.
 

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