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Dr.girijesh Saxena : Blogs

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ii शक्ति बोध ii

मित्रो यह लेख यूँ तो मैंने पूर्व सैनिकों के सन्दर्भ में एक सैनिक पत्रिका के लिए लिखा है परन्तु व्र्हत्त परिपेक्ष में देखा जाय तो यह पूरे देश पूरी जन तांत्रिक प्रक्रिया पर लागू होता है. हमें अपने iमताधिकार शक्ति का आभास होना चाहिए तभी संयुक्त प्रयास एवं प्रहार से भृष्ट शक्तियों को पराजित कर सकेंगे और यही होगा हमारा शक्ति परिक्षण शक्तिबोध

ii शक्ति बोध i
हमारा देश भारत जिसका इतिहास यूँ तो हजारों साल पुराना है परन्तु आज जब हम बात करते हैं तो अपने आदि काल या प्राचीन ame काल की बात ही नहीं होती। हमारा प्राचीन इतिहास यूं तो राजा महाराजओंके महिमा मय ,गरिमा मय गाथाओं से भरा पड़ा है जिसमे विभिन्न प्रकार के शाiyसक रहे। दूसरा युग आया अत्ताताइयों एवं आक्रामकों का जिसमें विभिन्न देशों के मुसलमानों ने सोने की चिडिया कहे जाने वाले भारत को लूटा और लूट का माल अपने साथ ले गए। मुग़ल वंश ने पर इसे अपना माना और यहीं बस गए जिनका पीढ़ी दर पीढ़ी बाबर से बहादुर शाह ज़फर तक राज रहा। तीसरा युग था बरतानवीओं का युग जो व्यापारी के व्यापर से शुरू होकर लूट पाट बर्बरता अत्याचार और शोषण का युग रहा ,175 वर्ष का अंधकार ।15 अगस्त 1947 से देश में एक और युग का प्रारंभ हुआ स्वराज का यानी हमारे शासक हम , कहा गया प्रजातंत्र परन्तु नियमावली, पद्धति, वही थी बरतानवी । 26 जनवरी 1950 को हमने अपना संविधान लागु किया और गणतंत्र हुए।
पूरे इतिहास में प्रमुख रूप से विभिन्न शासन प्रणालियाँ रहीं यथानुसार
1 एकलशाही : एक तंत्र जहाँ एक व्यक्ति का शासन होता था और वंशावली अनुगमन होता था ;एक व्यक्ति की बुद्धि कुबुद्धि प्रजा का भाग्य होती थी।
2 एकल शाही लोक तंत्र : राजा वंशानुगत अवश्य होता था परन्तु उसकी बुद्धि कुबुद्धि को दिशा देनें काम काफी हद तक प्रजा में स्थापित विद्वानों ,कलाकारों आदि नामित सलाहकार सदस्य करते थे। इस श्रेणी में अकबर का शासन जिसमे नवरत्न शहंशाह के सलाहकार थे। आज की राज्य सभा यानि अपर हॉउस उसी का एक प्रजातांत्रिक रूप कही जा सकती है इसमें नामांकन नहीं होता, इसमें प्रतिनिधि चयन सीधे नहीं परन्तु परोक्ष रूप से जनप्रतिनिधि करते हैं।
3 तानाशाही :यहाँ एक ही व्यक्ति प्रधान था जिसकी बुद्धि कुबुद्धि पर सब निर्भर था किसी को कुछ कहने या विरोध करने का अवसर ना था।
4 प्रजातंत्र : यहाँ जनता अपने प्रतिनिधि /शासक सीधे चुनती है और प्रतिनिधि संख्या बल पर सरकार बनाते है। जन गण मन अधिनायक होता है ,जन साधारण गणमान्य चुनिन्दा व्यक्ति को चुन कर अधिनायक /शासन प्रमुख बनाती है। यदि अधिनायक जनमानस की अवधारनाओं पर खरा उतरा तो जय है वर्ना फिर
नया चुनाव नया अधिनायक।
प्रजातंत्र हमारे देश समाज के लिए नया नहीं है ,सदियों पूर्व आज के बिहार प्रदेश में एक लिच्छवी वंश का शासन था जिसमे कोई एक राजा ,शासक नहीं था ,जन प्रतिनिधियों का चुनाव होता था और राजवंश से राज प्रमुख चुना जाता था जनमानस द्वारा निर्धारित मापदंडों एवं नीतियों के अनुसार राजवंश द्वारा शासन होता था। आज कोई राज वंश नहीं होता अतः परोक्ष रूप से हम अपना राष्ट्र प्रमुख "राष्ट्रपति " चुनते है।
इस विषय चर्चा का आशय आजके सन्दर्भ में यह है कि हम जो आज इस देश के जन गण है हमें अपनी जनशक्ति का आभास होना चाहिए। हमारे जन गण की त्रासदी यह है की हम मुसलमान है, हिन्दू है सिख ईसाई है ;पंजाबी ,बंगाली ,मराठी ,मद्रासी है पर शायद भारतीय नहीं है हम हिंदी सिन्धी तमिल तेलगु सब बोलते हैं पर राष्ट्र हित ,एकता की भाषा नहीं भाष बोलते। बंटवारे की भाषा ने हमें बाँटा ही है। सदियों से हम बंटते रहे है वृहत आर्यावर्त से बंटते बंटते सिर्फ भारत रह गये हैं पर बंटवारे की भाषा आज भी हमारी परिभाषा है।
गर्व का विषय है की हम सैनिक इस घाट घाट के घटकवाद से परे हैं। हम सब सैनिक हैं भारतीय हैं और एक धरती एक ध्वज के लिए जान तक देने का मददा रखते हैं। हमारे लिए ब-वर्दी (इन यूनिफार्म ) या बे-वर्दी (आउट ऑफ़ यूनिफार्म ) या कहें तो सैनिक अथवा पूर्व सैनिक अधिक मायने नहीं रखता "" सिपाही हमेशा सिपाही ही रहता है "" once a soldier always a soldier. अब समय आ गया है जब हमारी नयी पौध देश की रक्षा में पंक्ति बद्ध है तो हमें बतौर पूर्व सैनिक संगठित हो कर देश को ह्रास दायी त्रास दायी विघटन कारी सामाजिक ,आन्तरिक राजनैतिक आपदाओं से बचाये। अपनी शक्ति को पहचाने और अपने मताधिकार से देश के राष्ट्र के उत्थान में अपनी भागी भागीदारी निभाए।
आपके शक्तिबोध हेतु मै कहना चाहूँगा की अबतक हम सोचते थे हम थोड़े से फौजी क्या कर सकते है।टुकड़ों टुकड़ों में अकेले दुकेले पड़े हैं ,शायद इसी अकेलेपन की हीनता की भावना के कारण पूर्व सैनिक का हित रक्षण न हो पाया। हम उस देश के वासी हैं जहाँ हमारे गुरु गोबिंद सिंह ने आतताइयों से लड़ने को नारा दिया "सवा लाख तौं इक लडाऊँ तब गुरू गोबिंद सिंह कहाऊं। अंग्रेजों से लड़ कर आज़ादी लेने के लिए हमारे क्रांति कारियों ने दम दिखाया "एकला लो रे ",कहने का मतलब यह की अकेले होना या बिखरे होना हमारी कमज़ोरी नहीं होना चाहिए। यहाँ कुछ आंकड़े काबिले गौर हैं i
रक्षा मंत्रालय के पूर्व सैनिक कल्याण निदेशालय एवं पूर्व सैनिक पुनर्वास निदेशालय से प्राप्त ताज़ा अनुमान /आंकड़ो के अनुसार लगभग 23,00,000 पूर्व सैनिक हैं और लगभग 60,000 से अधिक सैनिक (तीनों सेनाओं से) हर साल )सेवा निवृत होते हैं यानी इस बिरादरी में शामिल होते हैं। 35 वर्ष से 62 वर्ष की विभिन्न आयु वर्गों में सेवा निवृत होने वाले पूर्व सैनिकों पर ग़ौर करें तो प्रत्येक सैनिक के आश्रित /प्रभावित /सम्बंधितों की संख्या 1 : 6 के अनुपात में बैठती है ;यानी पत्नी ,संतान ,डिपेंडेंट पेरेंट्स /भाई -बहन जो इस दायरे में आते हैं जो किसी न किसी तरह सैन्य जीवन की आपा धापी प्रभावित हुए होंगे,अवश्य सैन्य हित में सोचते होंगे एवं देश प्रेम से ओतप्रोत होंगे। इस प्रकार 23,00,000 x 6 = 1,38,00,000 अर्थात लगभग एक करोड़ चालीस लाख की आबादी है जो हमारे हक़ में है।
यहाँ बिखराव में बसे होने के आलावा एक दूसरा पक्ष और भी है। जब तक सैन्य सेवा में रहते है एक सूत्र में बंधे होते हैं। ब-वर्दी से बे-वर्दी होने पर अपने पुनर्वास अथवा गृहनगर के आधार पर बस जाने के कारण बिखर जाते हैं। एक तथ्य और,सैनिक आम तौर पर प्रोफेशनल आचार विचार का व्यक्तित्व होता है ;कच्चा कुनबा लिए रोज़ी रोटी में फंस जाता है। राजनीती और कौटिल्य यूँ तो हमारा प्रकार नहीं होता,और जो होता भी है तो विभिन्न दलों में बंट जाता है इस कारण हमें अपना शक्ति बोध नहीं हो पाता। पूर्व सैनिको के रूप में भी हम बंटे हुए हैं। हमारा कोई एक शक्तिशाली संगठन नहीं है;किसी संगठन नाम लिए बिना कहूँगा ,व्यक्ति परिचायक राजनैतिक दलों के सामान पूर्व सैनिको के भी बहुत सारे अनगिनत अस्तित्वहीन व्यक्ति प्रधान छोटे बड़े संगठन खड़े हो गए है जिससे हमारी शक्ति नगण्य हो जाती है बंट जाती है। मैं नहीं कहता राजनैतिक दलों में कोई बुराई है,ना कहूँगा ये दल अच्छा या वो दल बुरा है । सबके अपने अपने विचार सिद्धांत नीतियां हैं ,परन्तु यह अवश्य कहूँगा -एक सच्चे सैनिक के अनुरूप देश हित ,सैन्य हित और सैनिकों/पूर्व सैनिकों के हित रक्षण का मुद्दा आने पर सभी पूर्व सैनिकों को व्यक्तिगत,जातिगत , दलगत अथवा क्षेत्रीय आदि मुद्दों से ऊपर उठ कर सामने आना चाहिए। हमारे इस शक्तिबोध से सेवारत सैनिकों का भी मनोबल बढ़ेगा क्यों नहीं "वो वो है जो कलतक हम थे ;हम वो है जो उन्हें कल होना है "सैनिक के रूप मे हमारी अगली पीढ़ी निश्चित रूप से पूर्व सैनिक के रूप मैं भी हमारी अगली पीढ़ी।
सारांश में यह की पूर्व सैनिक एक शक्तिहीन अस्तित्व हीन दयनीय हेय जैसी वस्तुस्थिति नहीं है , आवश्यकता है शक्तिबोध की ,एकात्मकता की। देश ,समाज हमें सैनिक के रूप में जानता है। आन्तरिक हो या बाहरी ,आतंकवादी हो या अन्यथा , प्राकृतिक हो या मनुकृत हमारा सौभाग्य है कि देश हम पर विश्वास करता है हर समस्या के निदान के तौर पर याद करता है। अपने पूर्व स्वरुप के अनुरूप राष्ट्रीय परिवेश में पूर्व सैनिक एकात्मकता ,रचनात्मकता और देश हित का , पूर्व सैनिक पर्याय बन सकता है। अंतिम वाक्य जो भी हो जैसा भी हो अपने सोच और समझदारी मुताबिक़ अपने मताधिकार का प्रयोग अवश्य करना होगा ,प्रजातंत्र में यही हमारा शस्त्र है यही हमारी शक्ति है।
II जयहिन्द II वंदेमातरम II

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Dr.girijesh Saxena

Corporate/Business/Professional

Madhya Pradesh ,  INDIA

I am a born bhopali,Medical graduate of Gandhi Medical College Bhopal(1966batch),did Post graduation in Hospital Administration From ISSR,Christian University foundation Vellore{TN},MDBA(MBA)from Symbiosis Pune,PG in medico legal Systems from Symbiosis Pune,and Latest NABH standards implimentation program training.

Served Indian Army(Army Medical Corps) for 33 yrs,Medical Officer Incharge ECHS PolyClinic Bhopal 4-1/2 yrs,Medical Supdt JK Hospital Bhopal and now working independent Hospital planning and management councellor.

By hobby a hindi poet,and a free launce hindi/english writer in news papers/magazines

publications:1: Kamyab Safarnama:A monograph book with 16 biographies   of successfull sildiers sepoy to general who set examplary courrage and vellore after hanging uniforms to fight their resettlement/second carriers and gave their best to the society. 2. Prateekshalaya: hindi poems about 40 dipicting the agony of separation .

          

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