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हंगामा है क्यो बरपा


व्यंग
हंगामा है क्यो बरपा !

इंजी विवेक रंजन श्रीवास्तव
ए १ , विद्युत मण्डल कालोनी , शिला कुन्ज हर भाषा में
जबलपुर
मो ९४२५८०६२५२ , vivek1959@yahoo.co.in

हमारी लोक संस्कृति में गालियो का बड़ा महत्व रहा है . विवाह जैसे समारोहो में सुमधुर महिला कंठ से गाली गीत सुनने को मिलते थे . इन गालियों को सुनने के लिए बारात के भोजन की अवधि घंटो तक चलने की परंपरा विशेष रूप से नेपाल सहित भोजपुरी और बुंदेलखण्ड आदि क्षेत्रो में रही है . सभ्यता और व्यस्तता के चलते अब विवाह समारोह ही एक रात्रि के आयोजन तक सिमट रहे हैं और गाली की यह परम्परा भी लुप्त हो रही है .लगता है ऐसे समय में देश की आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान देने वाली कांग्रेस को गालियो की मधुर परम्परा को अक्षुण्य बनाये रखने का दायित्व बोध हुआ है और उसके दिक विजयी नेताओ ने भारतीय राजनीति में गालियो को शामिल करने का बीड़ा उठाया है . लोकसंस्कृति में शामिल हास परिहास की पारम्परिक गालियो में मनोविज्ञान के अनुसार स्‍नेह और क्रोध के भाव एक साथ ही प्रदर्शित होते थे . अभी यह विवेचना बाकी है कि ट्वीट के वैश्विक प्लेटफार्म पर दी गई चर्चित गालियां कथित नेता जी का क्रोध भाव प्रगट कर रही हैं या स्नेह भाव , या फिर केवल खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंच रही है . वैसे हर भाषा में स्नेह भाव से गाली देना संभव भी नही है , यह तो भोजपुरी , बुंदेली , मैथिली, अवधी आदि कुछ लोक भाषाओं की बोली की मिठास और रस माधुर्य का सामर्थ्य ही है कि महिलायें तक लखनवी , मखमली जूती मार लेती हैं वह भी गा बजाकर . यदि ट्वीट वाले नेताजी लोग चाहें तो अभी उनके अधोपतन की और भी संभावनायें बाकी हैं . भोजपुरी लोकगीतों को गर्त में मिलाने के लिए वे गीतकार और फिल्मकार ही जबाबदार माने जाते हैं जिन्होनें लोकसंस्कृति की मधुरता को बिना समझे इसे अश्लीलता परोसने का माध्यम बना लिया है . मतलब अभी ट्वीटी नेताओ को भी भाषाई गालियो के साथ साथ इलेक्ट्रानिक मीडिया के स्वसंपादित इस नवयुग में सचित्र करने को बहुत कुछ बाकी है .
पुलिस तहकीकात में , ठेकेदार द्वारा मजदूरो से काम करवाने में और तो और सैक्स में भी गालियो का मनोवैज्ञानिक महत्व सर्वविदित है . होली में वर्ष भर की कुंठायें सारी वर्जनायें भांग के एक गिलास के नशे के साथ गाली गलौच करके बहा देना , मन को गालियो के ड्राईवाश से धोकर संबंधो को पुनर्जीवित कर लेना हमारी संस्कृति का विरोधाभासी सामर्थ्य है .गाली देकर, मन की भड़ास निकाल कर हाथापाई से बचा जा सकता है , अतः गालियो की सामाजिक मान्यता सदियो से यथावत बनी हुई है . पितृवादी समाज ने कम से कम एक मामले में नारी शक्ति का लोहा माना है , गाली किसी को कोई भी दी जाये , घूम फिर कर वह स्त्री तक ही पहुंचती है . यहां तक कि " साला मैं तो साहब बन गया " जैसे फिल्मी गीत सरे आम घोषणा करते हैं कि साहब बनने की अकड़ भरी सूचना भी गा बजाकर सब को साला बनाकर ही दी जाती है . बालीवुड में बिग बास के घर से गाली गलौच के कारण बाहर की गई प्रियंका जग्गा ने गाली कांट्रावर्सी का सकारात्मक उपयोग कर लोकप्रियता हासिल कर ली है और जल्दी ही वे बड़े पर्दे पर नजर आ सकती हैं . गालियो की चर्चा हो और पंजाबी कल्चर की बात न हो , ऐसा कैसे हो सकता है , दिल्ली में तो बाप बेटे भी अपने तकिया कलाम के साथ ही बातें करते पाये जाते हैं , जिनमें वे अपनी बहन का स्मरण करते सुनाई पड़ते हैं . उनके लिये वे शब्द गाली न होकर, अभिव्यक्ति के लिये भाषा का हिस्सा मात्र बन चुके हैं , जिन्हें वे तबसे सुनते आये हैं जब से वे होश सम्भालते हैं .दरअसल गालियां वे हथियार हैं जिनका इस्तेमाल तब होता है जब स्थितियो पर हमारा वश नही होता , सिस्टम पर , बास पर , या और कुछ नही तो भगवान पर गालियां बरसाकर हमारा मन कुछ हल्का हो जाता है . तो नेताई ट्वीट्स की गालियो पर हंगामा बरपाने की अपेक्षा उन्हें इसी परिप्रेक्ष्य में हंसकर अस्वीकार करना ही उचित है , क्योकि जो कुछ अस्वीकार किया जाता है , वह उसी के पास रह जाता है जो उन्हें देता है .यूं इस विवाद पर हाथी चला बाजार कुत्ते भौंके हजार वाली कहावत न जाने क्यो याद आ रही है .

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Vivek Ranjan Shrivastava

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Madhya Pradesh ,  INDIA

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