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Rameshwar   Sharma 's Blogs
Rameshwar Sharma : My expressions as Poet, Author
Posts - 17    Comments - 8
 
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Rameshwar Sharma
Academic/Science/Research
Nagaur ,
Rajasthan ,
INDIA
 

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जय श्री कृष्णा (0 Comments)
इण माटी रो माथे पे तिलक लगाणों है। (1 Comments)
??अनमोल वचन?? (0 Comments)
मेरी कविता (0 Comments)
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इंसानियत (1 Comments)
तो अच्छा है.... (0 Comments)
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My expressions as Poet, Author (17)
Archive
August, 2010 ( 6 ) >>
July, 2010 ( 10 ) >>
Posted on
Sep
1
2010
Wed
3:10
PM
जय श्री कृष्णा
From Rameshwar Sharma




जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा

श्री कृष्णजन्माष्ठमी की आप पाठकों को मेरी ओर सेे ढैर सारी बधाई।
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Posted on
Aug
20
2010
Fri
10:54
AM
इण माटी रो माथे पे तिलक लगाणों है।
From Rameshwar Sharma
राजस्थान री धरती ने नमन करो,
इण माटी रो माथे पे तिलक लगाणों है।
आ धरती वीर सपूतां री,
इण माटी में महक राणाप्रताप री,
ओर किण-किण रो नाम लेवां,

इण धरती ने तो
कई लाल अपणी गोदी में खिलाया
बड़ा प्रेम सूं बाने राख्या
अब आपां की बारी आई
इण ने स्वर्ग बणाबां को फर्ज निभाणों है।
इण माटी रो माथे पे तिलक लगाणों है।

आज इण धरा रे माथे,
कई बुरा लोगां री,
नजरां गढी है,
आ दुशमणा री नजरां रे साथे ही,
बां खुद ने भी जमीं दोज कर देणों है।
इण माटी रो माथे पे तिलक लगाणों है।

आ रही आज पुकार थाने,
इण रो करज चुकाणों है।
आपां ही सब इण धरती सूं,
अन्न-धन पा कर मोटा हुइ्या
पाछो भी कुछ फरज निभाणों है
इण माटी रो माथे पे तिलक लगाणों है।

बंजर होती धरां पर,
हरियाली ने लाणी है,
पग पग पर पेड़ लगाणा है
इण ने सिंचण रे खातिर
दुश्मणा रो रक्त बहाणों है,
इण माटी रो माथे पे तिलक लगाणों है।
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1 Comment
Posted on Tuesday, August 31, 2010 1:50:33 PM
Modified on Tuesday, August 31, 2010 1:51:30 PM
From Mahendra Kumar Kumawat
Very Nice
 
Posted on
Aug
12
2010
Thu
11:11
AM
??अनमोल वचन??
From Rameshwar Sharma

1. खुबसुरती और प्यार का एक पल एक सदी के बराबर होती है।
2. समय सबसे बड़ा अनमोल रत्न है।
3. ‘‘मैं’’ व्यक्ति के पतन का कारण है।
4. कार्य करने से पहले उसके परिणाम पर नजर डालें तो सफलता निश्चित है।
5. व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान समाज में रहने से होती है।
6. गुरू की दृष्टि में ही शिक्षा दीक्षा लेनी चाहिए।
7. नींद में भी चेतना रहनी चाहिए।
8. फूल से खुशबू लो, फूल नहीं।
9. सेवा करके उसका प्रतिफल चाहने वाला सबसे बड़ा भिखारी होता है।
10. फूल से कांटे अच्छे, जो मुर्झाते नहीं।
11. किसी के दर्द को समझना हो तो पहले स्वयं चोट खाओ।
12. चिराग जलाने से ही तम का नाश होगा।
13. शुद्ध एवं पौष्टिक आहार के लिए शुद्ध पात्र की अपेक्षा है।
14. भिक्षा लेने वाला ही नहीं, देने वाला भी भिखारी होती है।
15. जो गिर कर संभल जाता है उसे इन्सान कहते हैं
और जो संभल कर गिर जाता है उसे ......... (आप दें संज्ञा)।
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Posted on
Aug
10
2010
Tue
1:52
PM
मेरी कविता
Modified on
Aug
10
2010
Tue
1:53
PM
From Rameshwar Sharma

मेरे दिल की भावनाओं के अनुरूप हो तुम
मस्तिष्क से निकले शब्दों का प्रतिरूप हो तुम।

दिल में जो बसी थी, कल्पना तुम,
शब्दों के रंगों में अल्पना हो तुम।

तन्हाई में मेरी एक सहेली हो तुम,
कभी लगता है बस एक पहेली हो तुम।

कोई अधखिंची तस्वीर हो तुम,
या दिल में चुभा, कोई तीर हो तुम।

मैं तो समझ नहीं पाया और न तुमने बताया,
मुझसे जुड़ी, कैसी जंजीर हो तुम।

अब तो हारकर बस यही कहता हूं,
हां कविता, मेरी कविता हो तुम।
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Posted on
Aug
10
2010
Tue
1:42
PM
खोज
From Rameshwar Sharma

मैं सदा फलक में,
खोजता सा रहता हूं,
पर मेरी खोज
रहती है सदा अधुरी
शायद खोज रहा हूं मैं
गलत जगह पर
जैसे मरूस्थल का पानी
होता है दरअसल, मृग मरीचिका
अब मैंने जाना है,
संसार भ्रम है, माया है,
एक ऐसा जंगल है यह
जिसमें हर राही भटका है,
हर पथिक ने तोड़ा है दम
पथ की तलाश में
बिल्कुल कस्तुरी मृग की तरह
चाहिए यदि सुनहरा भविष्य
जो जरुरी है
जीना यर्थाथ में।
...........
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1 Comment
Posted on Tuesday, August 31, 2010 1:52:46 PM
From Mahendra Kumar Kumawat
I Like it
 
Posted on
Aug
9
2010
Mon
11:48
AM
कसक
From Rameshwar Sharma

तुम जो रहे न अपने, सब हो गये पराये।
अब तो अपने ही साये लगते नये -नये से।।

आकर तो देख लो, हम जी रहे हैं कैसे।
जान न सकोगे तुम, यों चले गये थे जैसे।।

आ भी जाओं, कि जिन्दगी में आ जाये बहार।
अब दिल धड़क कर, तुमको रहा पुकार।।
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Posted on
Aug
6
2010
Fri
4:26
PM
इंसानियत
From Rameshwar Sharma

उस रात कब्रिस्तान में अनोखी बात हो रही थी,
दो भूतों में इंसानियत पर चर्चा हो रही थी।
एक ने पूछा दूसरे से,
‘‘क्या तू कभी किसी इंसान से मिला है?
दूसरे ने कहा ना बाबा ना,
मुझे तो इन अंधविश्वासों से गिला है।
पहले ने फिर पुछा,
‘‘तुझे इन्सान बना दिया जाए तो कैसा रहे?’’
दूसरे ने कहा -
‘‘मुर्दा हूंँ पहले से ही,
क्यों मरे को मारता है।
इंसान न मिल जाये मुझे,
सोचकर हनुमान चालीसा पढ़ लेता हँू,
गर काट जाये रास्ता इँसा,
तो वो रास्ता बदल लेता हँू।
पहले था इंसान मैं,
तो अच्छा समझता था,
लेकिन लगता है, अब हम अच्छे हैं।
अरे, पशुता में तो शैतान भी,
इँसा के आगे बच्चे हैं।
बंटी है इंसानियत रिश्तों में, जाति में,
सम्प्रदायों में, शहरों में, गावों में।
मगर है एक शैतानियत, रहते हैं सब
एक ही अंधेरे की छांव में।।
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1 Comment
Posted on Tuesday, August 31, 2010 1:54:44 PM
From Mahendra Kumar Kumawat
its true
 
Posted on
Jul
31
2010
Sat
4:45
PM
तो अच्छा है....
From Rameshwar Sharma

इस बदनाम शहर की गलियों के साथ में,
मुझे अकेला ही रहने दो तो अच्छा है।

जला दो इस सारी बेवफा दुनिया को मगर,
मेरे गरीब दिल को न जलाओ तो अच्छा है।

कौन कहता है कि यहां ‘बैवफाई’ नहीं होती है,
मुझे सब मालूम है तूम ना पूछो तो अच्छा है।

सच कहती है दुनिया दोस्तों इश्क.... करना बहुत बड़ा जूर्म है
अरे इनकी सजा न पुछो तो अच्छा है।

मिले थे कुछ लोग इस दुनिया में यारों,
जो वक्त का तकाजा देखकर बदल गये।

सब हो गये हैं बरबाद इस दुनिया में इनके मारे,
मुझको तुम बरबाद न करो तो अच्छा है।
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Posted on
Jul
28
2010
Wed
11:31
AM
जिन्दगी
From Rameshwar Sharma


एक लम्बी कहानी है लिन्दगी

कोई पढ़ता है, एक पल ही सांस में,
कोई सारी उम्र खत्म नहीं कर पाता।

एक जिज्ञासा है जिन्दगी

कोई इसे जानने की कोशिक करता है
कोई पुरानी कहानी की तरह,
दुहराने की जहमत नहीं करता।

एक परम्परा है जिन्दगी

कोई एक झटकेे में तोड़ता है इसे,
कोई लकीर का फकीर ही बना रहता है।
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Posted on
Jul
27
2010
Tue
11:27
AM
?? दोस्ती ??
Modified on
Jul
27
2010
Tue
11:29
AM
From Rameshwar Sharma
दोस्ती की थी मैंने दोस्तों से,
जो कभी पराये थे।
लेकिन अब अपने से
लगते हैं।

स्मैक, हिरोईन,गांजा, अफिम,
वाह! कभी सोचा था ख्यालों में,
मगर आज ये मेरे पास हैं,

मैं अकेला ही नहीं,
दोस्तो की कतार लम्बी है।
इन्होंने गम में सहारा दिया,
मैं मर रहा था,
कि बचा लिया मुझे।

धीरे-धीरे दोस्ती बढ़ती गई,
पता ही नहीं चला कि,
दोस्ती कब रिश्तों में बदल गई।
मैं इनके बिना, न ये मेरे बिना,
इक दूजे के बिना,
जीना ही मुश्किल हो गया।

फिर पता ही नहीं चला,
कि कब सवेरे से सांझ हो गई,
दिन प्रतिदिन दोस्तों की
संख्या बढ़ती गई।

हर एक आशिक मिजाज
जवानी में धोखा खाए,
आ गये इन दोस्तों के बीच,
और अपनों को भूला बैठे।

क्या मस्त रहने लगे,
अपनो से दूर होने लगे,
धीरे-धीरे इनकी भी दोस्ती,
रिश्तों में बदल गई,
ओर एक युवा पीढ़ी
इस नरक में चली गई।

मेरे यारों ऐसे दोस्तों से,
तो दुश्मन भले,
जो एक ही वार में काट दे गले,
इन दोस्तों के वार से तो,
सड़-सड़ कर मरने के लिए,
डाल देते है, गटर तले।।
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Posted on
Jul
27
2010
Tue
10:13
AM
???? खिलते फूल ????
From Rameshwar Sharma
हंसते ओर खिलते फूल, झूमते रहें लहराते फूल।
गीत खुशी के गाते रहें, दिल को रिझाते फूल।।

सर्दी गर्मी वर्षा सहते, सदा सहज मुस्काते फूल।
तितली के संग हंसते रहते, भंवरों के संग गाते फूल।।

होकर श्री चरणों में अर्पित, जीवन को सफल बनाते फूल।
हर पल बगीय की सुन्दरता में, चार चांद लगाते फूल।।

जग को सदा महकाते रहें, सब को खूब लुभाते फूल।
नई उमगं बांट रहे हैं, ये लाल-पीले गुलाबी फूल।।

अपना सब कुछ लुटाकर भी, रोज नये खिल जाते फूल।।
कांटों में भी खिलना सिखो, खिलते खिलाते हमें सिखलाते फूल।।

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Posted on
Jul
26
2010
Mon
2:26
PM
??? मजबूर नहीं, मजदूर बनो ???
From Rameshwar Sharma
मजबूर नहीं, मजदूर बन जाओ।
शिक्षा से तुम दूर मत जाओ।।

अगर बैठे हो बेकार तुम,
तो कोई नया संसार बनाओं।
चीर के मुश्किलों को तुम,
सतपथ में आगे बढ़ते जाओं।।

मिल जायेगी मंजिल तुम्हें,
कठिनाईयों से न घबराओं।
कर दृढ़ निश्चय मन में,
तुम आग में कूद जाओ।।

अंगारे तुम्हें जला न सकेंगे,
तुम तपकर कुन्दन अन जाओगे।
तब न तो किसी के आगे झूको,
न किसी को कदमों में झुकाओ।।

छुआ-छूत का भेद मिटाकर,
सबके दिलों में समा जाओ।
तब श्रीकृष्ण की तरह तुम भी,
हर सुदामा को गले लगा पाओगे।।

किसी काम को छोटा न समझो,
जो मिले उसे करते जाओ ।।
न मजबूरी में किसी के समझ हाथ फैलाओ,
तभी कहता हूं ! मजबूर नहीं, मजदूर बनो।।

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2 Comments
Posted on Tuesday, July 27, 2010 10:55:07 AM
From Mahendra Kumar Kumawat
Posted on Monday, July 26, 2010 4:01:55 PM
From Jyoti
वाह! क्या बात है मजबूर नहीं मजदूर बनो
 
Posted on
Jul
26
2010
Mon
1:36
PM
??? जीवन का सफर ???
Modified on
Jul
26
2010
Mon
1:41
PM
From Rameshwar Sharma
लम्बा है सफर, लम्बी है डगर।
रूक मत जाना ऐ मुसाफिर, चलते ही रहना।।

राह में सभी मिलेगें, दोस्त - दुश्मन।
देख इन्हें मत जाना हार, चलते ही रहना।

तेरे जीवन में आएंगी मुश्किलें हजार।
इनसे मत जाना हार, चलते ही रहना।।

हर दुःख कि पीछे सुख है, और
सुख के पीछे दुःख, इन्ही से बनता है संसार।।

दुखों से घबराकर रूक मत जाना,
चलते ही रहना, चलते ही रहना।

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Posted on
Jul
24
2010
Sat
2:22
PM
? ? हाय रे मंहगाई ? ?
Modified on
Jul
24
2010
Sat
2:27
PM
From Rameshwar Sharma
हाय रे मंहगाई तूझे मौत क्यों न आई,
अमीरों को और अमीर बना दिया।
गरीबों की खोद दी खाई,
हाय रे मंहगाई .........।।

भूखां लोगां की भूख मार दी,
प्यासा की मिटगी प्यास।
जमीं से आसमां तक सरकार से,
रखो नहीं कोई आस।।

नीचे से ऊपर तक,
मूंह फाड़ के बैठा काल।
मनमोहन के राज में,
जनता को बूरो है हाल।।

बूढ़ा मरग्या, खत्म हो गया जवान,
किशोरों का क्या होगा।
जवानी देखे बिना ही,
मर जाऐगें नन्हे-मुन्ने गोपाल।।

समय रहते सरकार ने,
नहीं ली अगर शुद।
सोने चांदी के लिए नहीं,
फिर तो रोटी के लिए होगा युद्ध।।

मोहन की मुरली बजे है,
सोनिया की फूंक से।
ये मंहगाई क्यों करें कम,
क्या लागे इनकी जेब से।।

काली चमड़ी से गम नहीं,
गोरी चमड़ी भेडि़ये से कम नहीं।
इनके जाल से दुनिया का,
बूरा हाल है, ये जात बदजात से कम नहीं।।

नेताओं को भीख में, वोट मांगते देखा है,
बड़ी-बड़ी मिल-कारखानों से नोट मांगते देखा है।
सीट मिलते ही, सरकार बनने के बाद,
आम आदमी को, नेता की लात खाते देखा है।।

अब भी संभल जाओ, मेरे भारत वासियों,
एक-दूसरे से प्रेम करो, जैसे करते भाई-भाई।
हाय रे मंहगाई, तुझे मौत क्यों न आई,
अमीरों को और अमीर बना दिया, गरीबों की खोद दी खाई।।

हाय रे मंहगाई, हाय रे मंहगाई हाय रे मंहगाई .......

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1 Comment
Posted on Saturday, July 24, 2010 3:58:48 PM
From Ashish Chaudha
बहुत ही अच्छा लिखा है आपने महगाई के बारे में. इसके लिए जल्द ही कुछ न किया गया तो आम आदमी को बहुत से परेशानियों का सामना करना पद सकता है.
 
Posted on
Jul
24
2010
Sat
11:11
AM
??? ओ अन्तर्मन के पुष्प ???
From Rameshwar Sharma

ओ अन्तर्मन के पुष्प ! सदा तुम खिलते ही रहना।
चुभ जाये कांटे यदि उर में, शांत भाव से तुम सहना।।
ओ अन्तर्मन के पुष्प...........।।
दुर्गम पथ की जीवन घाटी, पग-पग पर है चिकनी माटी,
अवरोधों की भीड़ लगी है, कोशिशें नाकाम पड़ी है।
चाहे जैसी भी स्थिति आये, दृग जल से आनन मत धोना।।
ओ अन्तर्मन के पुष्प...........।।
स्वार्थवश साथी बहुतेरे, दिल से दूर सभी के डेरे,
कौन प्रतीक्षा करता किसकी, किश्ती अलग-अलग है सबकी।
अपने गम की आहों को, तुम केवल मुझसे ही कहना।।
ओ अन्तर्मन के पुष्प...........।।
ठेस लगे अंतर्भावों को, या ठोकर लगती पांवों को,
धोखा खा जाओ तो मग में, सावधान रहना पग-पग में।
कड़वे-मीठे अनुभव जो हों, स्मृतियों को मत ढहने देना।।
ओ अन्तर्मन के पुष्प...........।।

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Posted on
Jul
7
2010
Wed
1:50
PM
गजल
From Rameshwar Sharma

तुझे देखते ही ये क्या हो गया मुझे।
कुछ सूझता नहीं है तेरे सीवा मुझे।।

रानी है रूप की तू या कोई हूर है।
तू कौन है? क्या है? तू ही बता मुझे।।

तेरी निगाहें लुत का ऐसा हुआ असर।
मैं दिल ढँूढता हूँ दिल ढँूढता मुझे।।

मजबूर हो गया हूँ अब सोचने पे ये।
दीवाना कर दे न कहीं तेरी अदा मुझे।।

रखते ही पांव ऐ ‘राज’ राहें इश्क में।
सब कुछ नया-नया सा लगने लगा मुझे।।
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1 Comment
Posted on Thursday, July 08, 2010 7:16:42 AM
From Prof. Prem Mohan Lakhotia
पहली नज़्म में जोश और दूसरी में पिलपिलापन!
अच्छी नज्में और ग़ज़लें पढ़ते रहिये और फिर, पूरी तन्मयता के साथ अच्छी कवितायें लिखते भी रहिये.
शुभ कामनाएं!
 
Posted on
Jul
6
2010
Tue
2:33
PM
जिन्दगी एक जंग है
From Rameshwar Sharma
जिन्दगी एक जंग है,
सिपाही की तरह लड़े जा।
मत हट पीछे, तू आगे बढ़े जा,
आसियां, मिलेगा तुझे जरूर,
कि बस तू, सबसे आगे निकल जा।।
जिदन्गी एक ..........।।1।।

कांटों भरी राह मिलेगी तुझे,
इन पे भी तू फूल खिलाये जा।
बे सहारों का सहारा बनकर,
तू दुनियां में नाम कमाए जा।।
जिन्दगी एक.........।।2।।

आहें भरी है जिन्दगी,
आहों को तू, बाहों में उठाये जा।
हर गम को सीने लगा,
तू प्यार की गंगा बहाये जा।।
जिन्दगी एक.....।।3।।
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1 Comment
Posted on Tuesday, July 27, 2010 5:33:32 PM
From Ratna Mandad
its true
 
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