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Rahul Dhariwal
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एक जवाब जो मैंने सबके मुँह से सुना है वह यह कि कुछ न कुछ चलता ही रहता है। हमारी जिन्दगी की शांति इस रोजाना के नए घटने ने छीन रखी है। कई बार तो ऐसा लगता है की हमारी जिन्दगी कोई कम्प्यूटर गेम है, हम उसके हीरो और हमारा टास्क है, चारों ओर से हो रहे हमलों से खुद को बचाना। क्या प्रतिपल इन बदलती परिस्थितियों से लड़ना ही व्यक्ति की नियति है और शांत जीवन एक मृग-मरीचिका। ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन यह भी सत्य है कि हम सब महसूस तो ऐसा ही कुछ करते है।
सोचते-सोचते जिस जगह आकर विचारों की रेल रुकी वह था कि यदि ऐसा सभी के साथ हो रहा है तो निश्चित ही इसकी कोई न कोई सार्थक वजह होगी क्योंकि प्रकृति में कुछ भी निरुद्देश्य नहीं। 'क्यों सबके जीवन में कुछ न कुछ चलता रहता है? का जवाब ही शायद हमें बदलती परिस्थितियों से सहज होने में मदद कर सके। हमारे मन में संतुष्टि और जीवन में शान्ति ला सके।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हम सब अपने जीवन को प्रतिक्षण बेहतर बनाने की कोशिश में लगे है, यही पुरुषार्थ है और यही अपेक्षित भी। मुझे लगता है इस बात को थोडा उधेड़ने की जरुरत है। बेहतर जीवन तो तब ही सम्भव है ना, जब वो पहले से बदले और बदलाव होगा तब निश्चित ही जिन्दगी की सतह पर ऐसी चीजें उभरेंगी जिनसे हमें मुक्त होना होगा। यह ठीक वैसे ही है जैसे हम अपने कमरे की सफाई कर रहे हों। कमरे की झाड़ू लगाएंगे तो कोनों में दबा कचरा एक बार तो फर्श के बीचों-बीच आएगा ही, जिसे इकट्ठा कर बाहर फेंकना होगा। कचरे से परहेज करेंगे तो सफाई कैसे होगी। कमरे की सभी चीजों को अपनी जगह से सरकाना और कचरे का फर्श के बीचों-बीच आना, कमरे को साफ़-सुंदर बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है और यही दृष्टिकोण हमें जिन्दगी की प्रतिपल बदलती परिस्थितियों के प्रति रखना होगा। रोजमर्रा में आने वाले असहज क्षण बेहतर जिन्दगी को पाने की प्रक्रिया का हिस्सा भर है। जिन्दगी में कुछ न कुछ चलते रहना तो बदलाव का शुभ-संकेत है क्योंकि हर बदलाव जीवन को पहले से बेहतर बनाने को ही आता है।
आपसे यह बात करते हुए मुझे तितली का जीवन-चक्र याद आ रहा है। मुझे नहीं लगता बदलाव और बेहतरी का इससे सुन्दर कोई और जीता-जागता उदाहरण हो सकता है। एक केटेपिलर धीरे-धीरे अपने ही भोजन के कारण फूलने लगता है। एक दिन इतना फूल जाता है कि उसकी चमड़ी ही तड़कने लगती है और अपने ही द्रव्य में कैद हो जाता है। इस कैद केटेपिलर को हम केकून कहते है लेकिन कुछ ही दिनों बाद वह केटेपिलर अपने द्रव्य को काम में ले एक सुंदर तितली बन उस कैद से बाहर निकलता है। हो सकता है कई बार बदलाव ज्यादा तकलीफदेह हो लेकिन यदि हमारी दृष्टि एक केटेपिलर की है तो वह निश्चित ही हमारे जीवन को कहीं अधिक सुन्दर बनाएगा।
इन सारी अच्छी-अच्छी बातों के बीच जो मन में बात रह-रहकर उठती है वह यह कि हमारी जिन्दगी में कई बदलाव ऐसे आए है जिनके परिणाम सुखद नहीं रहे। क्या कहेंगे हम उनके बारे में? अनुभवों को कैसे झुठलाएँ? मैंने जब अपने ही जीवन में आई ऐसी घटनाओं का विश्लेषण किया तो पाया कि ये बदलाव या तो मेरी बुद्धि से या किसी ओर व्यक्ति से निर्देशित थे न कि सहज प्राकृतिक। दोनों ही स्थितियाँ निरपेक्ष नहीं होती इसलिए इस तरह लाए बदलाव सुखद नहीं होते। बुद्धि और सलाह का उपयोग बदलती परिस्थितियों को समझने और अर्थपूर्ण इस्तेमाल में हों न कि जबरदस्ती बदलाव में।
बदलाव एक सहज प्राकृतिक घटना है जैसे समुद्र में उठती हुई लहरें। लहरों की दिशा में सर्फिंग कीजिए, सर्फिंग का आनन्द भी आएगा और बड़ी आसानी से किनारे पर पहुँच भी जाएँगे। ये कुछ न कुछ चलते रहना जिन्दगी के समुद्र में उठती हुई लहरें ही तो है, जरुरत है तो इनके साथ सर्फिंग करने की, फिर देखना जिन्दगी वैसे ही संतुष्ट और शांत हो जाएगी जैसे लहरों के नीचे समुद्र।
(दैनिक नवज्योति में रविवार, 9 जून को प्रकाशित) आपका राहुल ............
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Rahul Dhariwal
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यह बात सिद्ध हो चुकी है कि पौधे अपनों पत्तियों से माइक्रोस्कोपिक ध्वनियाँ निकालते है और ये ध्वनि तरंगे आस-पास लगे पौधों को प्रभावित करती है। यदि तुलसी के पौधे के बिल्कुल पास हम सौंफ का पौधा लगा दें, तो तुलसी के पौधे का विकास अवरुद्ध हो जाएगा। इसके विपरीत यदि दो पूरक ध्वनियों के पौधों को पास-पास लगा दिया जाए तो दोनों ही सामान्य से जल्दी और बेहतर फलने-फूलने लगेंगे।
अब ये तो हुई पौधों की बात। आइए, इस सन्दर्भ में कुछ हमारी बात भी कर लें। हम सब क्या है, ऊर्जा-पुंज ही तो है। हमारा जीवित होना ही हमारे ऊर्जा-पुंज होने का प्रमाण है। ऊर्जा, हमारे या किसी के भी सक्रिय होने की वजह और यह भी निश्चित है कि जो सक्रिय है उसकी एक तरंगीय आवृति यानी वाइबरेशनल फ्रीक्वेंसी भी होगी। जिसकी जितनी और जैसी सक्रियता उसकी उतनी और वैसी फ्रीक्वेंसी, और वैसा ही उसका प्रभाव। आपने देखा, किस तरह और किस हद तक हम एक-दूसरे को प्रभावित करते है और प्रभावित होते है। निश्चित ही, हम सब जानते है कि हम किन लोगों के बीच रहते है यह बहुत मायने रखता है लेकिन क्या हमने कभी समझा है कि यह मामला इतना गंभीर है?
कुछ लोग तर्क देते है कि, आप दुनिया को नहीं बदल सकते, आपको अपना ध्यान रखना है। आप अपना काम कीजिए और निकल लीजिए, कोई क्या करता है इससे आपको क्या लेना-देना। व्यावहारिक जगत में इस बात की अपनी अहमियत है और कुछ हद तक ऐसा करना भी पड़ता है लेकिन याद रखने की जरुरत यह है कि ये सिर्फ उन स्थितियों के लिए है जिन्हें हम टाल नहीं सकते। इसका कतई ये मतलब नहीं है कि हम चाहे जैसे लोगों के बीच रहें, हमारा तो बस काम होना चाहिए। आप चाहे जितना सतर्क रह लें, यदि आप लगातार ऐसे लोगों के साथ है जैसा होना आप नहीं चाहते तो आप कभी सफल नहीं हो पाएँगे। हो सकता है आप उन जैसे होने से बच जाएँ परन्तु वैसे तो निश्चित ही नहीं बन पाएँगे जैसा आप बनना चाहते थे और इसमें आपकी कोई गलती भी नहीं होगी क्योंकि ये उनकी, हमारी सोच पर जबरदस्ती है, हमारी इच्छा नहीं। रहीम इसे यूँ कहते है,- काजर की कोठरी में, कैसो हू सयानो जाए एक लीक काजर की, लागिहै पे लागि है।
यदि आप अपनी सोहबत को लेकर सजग है, ऐसी स्थितियाँ आपको बेचैन करती है जहाँ आपको मन मारकर ऐसे लोगों के साथ व्यवहार करना पड़ता है जिनकी ' वेव-लेन्थ' आपसे नहीं मिलती और आप अपने स्तर पर उन्हें बदलने के लिए थोड़े भी प्रयासरत है तो समझ लीजिए आपका काम हो गया। ये प्रकृति का 'आकर्षण-नियम' है कि सामान गुणों वाली चीजें एक-दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करती है। इस तरह, धीरे-धीरे स्वतः ही स्थितियाँ बदलने लगेंगी और आप अपने आपको सही लोगों के बीच पाएँगे।
आप जब ऐसे लोगों के बीच होंगे तो उनका जीवन आपको प्रेरित ही नहीं करेगा, दुविधा की स्थिति में आपको रास्ता भी दिखाएगा। ऐसे लोग आपको सही अर्थों में समझेंगे तो सही ही, हर अच्छे प्रयास पर उनकी हौसला अफजाई ईधन का काम करेगी। जिस तरह काजल की कोठरी में कालिख से नहीं बचा जा सकता वैसे ही पारस के पास रखे लोहे को सोने बनने से नहीं रोका जा सकता। अच्छी सोहबत से आपके व्यक्तित्व में कई सुंदर गुण स्वतः ही चले आएँगे जिनके बारे में न तो आपने कभी सोचा था और न ही कभी कोई प्रयास किया था। अपनी सोहबत को सम्भालिए आपकी सीरत स्वतः ही निखरती चली जाएगी।
(जैसा की नवज्योति में रविवार, 2 जून को प्रकाशित) आपका राहुल ..........
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Wednesday, June 12, 2013
12:53:43 PM
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Rahul Dhariwal
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Wednesday, June 12, 2013
12:32:08 PM
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Nani Manna
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Rahul Dhariwal
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........ और आख़िरकार संजय दत्त को जेल जाना पड़ा। जब ये फैसला आया था कि उन्हें अपनी बाकि बची सज़ा भी काटनी पड़ेगी; सारे अखबारों, न्यूज़ चैनल्स पर ये खबर सुर्ख़ियों में छाई थी। कहीं उनके इंटरव्यू तो कहीं उस घटना से लेकर आज तक का सिलसिलेवार विवरण तो कहीं आमजन की प्रतिक्रियाएँ, फिर उनकी दया याचिका और फिर उसका खारिज होना। मैं इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता कि उन्हें 'दया' मिलनी चाहिए थी या नहीं। हाँ, एक बात जो उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कही, का जिक्र जरुर करना चाहूँगा।
जब उनसे पूछा कि आप ऐसी कोई बात श्रोताओं के साथ बाँटना चाहेंगे जो आपने अपनी पिछली डेढ़ साल की सजा के दौरान शिद्दत से महसूस की हो तो वे बोले, 'फ्रीडम'। जिन्दगी में सबसे महत्वपूर्ण कोई चीज है तो वह है - आज़ादी। आज़ादी, अपने तरीके से हक़ के साथ जीने की। उस डेढ़ साल में अहसास हुआ कि आज़ादी से बढ़कर कुछ नहीं।
वास्तव में, सच ही तो है हम अपनी जिन्दगी के, इस आज़ादी के इतने अभ्यस्त हो जाते है कि इसकी सही क़द्र नहीं कर पाते। पता तब चलता है जब ये हमारे पास नहीं होती। कहीं भी आ-जा सकना, किसी से भी मिलना, अपने विचारों को जस के तस प्रकट कर पाना, यहाँ तक कि अपनी पसंद के कपडे पहनना या अपनी पसंद और सुविधा से खा पाना और न जाने क्या-क्या, अनगनित। ये सब भूल जाते है और फिर करने लगते है इस आज़ादी का दुरूपयोग। वैसे इस आज़ादी के बदले हमें देना ही क्या होता है, सिर्फ एक अच्छा नागरिक आचरण किन्तु न जाने क्यूँ हम वो सीमा भी लाँघ जाते है। शायद छोटे-मोटे लालच या ये सिद्ध करने का अहं कि मैं इस व्यवस्था से ऊपर हूँ।
ये सारी बात हमारी इसी मनोवृति को उजागर करती है कि जो कुछ हमें प्राप्त है हम उसकी इज्ज़त नहीं करते। मन में कृतज्ञता का भाव हो तो निश्चित ही वो हमें गलत रास्तों पर जाने से रोके। अपने तरीके से जीने की आज़ादी ही की तरह जिन्दगी की न जाने कितनी नियामतें है जिनकी हम वाज़िब क़द्र नहीं करते।क़द्र नहीं करते वहाँ तक तो ठीक है, कभी-कभी बेइज्जती भी कर बैठते है तब वे रूठ कर चली जाती है। अब भला प्रकृति क्यूँ अपमान सहन करेगी और तब हमें अहसास होता है कि हमारे पास क्या था और हमने क्या खोया है? शायद संजय दत्त भी कुछ ऐसे ही अहसास साझा कर रहे थे।
आज देश और समाज की जो हालत है उसके पीछे, आपको नहीं लगता, आज़ादी की बेकद्री ही अहम् वजह है। जो कुछ आज हमें सहज-सुलभ है पहले उसकी कल्पना कर पाना ही मुश्किल था। हम सबने इस आज़ादी का दुरूपयोग अपने-अपने छोटे फायदों के लिए किया, ये सोचकर की मेरे अकेले के कुछ करने या न करने से क्या फर्क पड़ता है। ऐसा सभी ने सोचा और आज फर्क हमारे सामने है। आज जो कुछ हम झेल रहे हैं, उसके जिम्मेवार हम सब हैं।
इन सब के बीच एक बात जो मन में उम्मीद की लौ जलाए है वो ये कि यदि एक अकेला व्यक्ति व्यवस्था बिगाड़ सकता है तो सुधार भी सकता है। अपने निजी-स्वार्थों के लिए आज़ादी का दुरूपयोग करते समय क्या हमने चिंता की थी कि कोई और हमारा साथ देगा या नहीं। अब उसका तो परिणाम अच्छा निकला नहीं। आज जब अपनी जिन्दगी की बेहतरी के लिए एक अच्छे नागरिक धर्म को निभाने की दरकार है तो हमें किसी और का साथ क्यूँ चाहिए? अरे! लोग तो जैसे पहले जुड़े थे अब भी जुड़ जाएँगे।
आज जरुरत है अपनी क्षमताओं को आँकने की। इस बात को सोचने औए समझने की, कि मेरे अकेले के कुछ करने या न करने से ही सारा फर्क पड़ता है। मैं अपने जीवन की बेहतरी चाहता हूँ तो बेहतर आचरण की शुरुआत मुझे ही करनी होगी, मुझे किस की प्रतीक्षा है और क्यों? फिर शायद कोई किसी से नहीं कहेगा 'ये सिस्टम ही ऐसा है'।
(दैनिक नवज्योति में रविवार, 26 मई को प्रकाशित ) आपका राहुल ..............
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Rahul Dhariwal
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कई सालों पहले 'श्रद्धांजलि' के नाम से लता जी का दो भागों में संगीत-संकलन आया था। इसमें उन्होंने अतीत के महान गायकों का परिचय देते हुए अपनी पसंद का उनका एक-एक गाना अपनी आवाज़ में गाया था। बहुत सुंदर और अदभुत संकलन था वो। उसी में लता जी जोहरा बाई का परिचय देते हुए एक वाकया सुनाती है, "मैं एक गाने की रिहर्सल कर रही थी। जोहरा बाई वहाँ बैठी थी। उन्होंने कहा, लता बेटी माशा अल्लाह बहुत अच्छा गा रही हो।" मैंने कहा, "नहीं-नहीं, मैं क्या ........ आप ऐसे ही कह रही है. तब वो बोलीं, नहीं बेटी, जब कोई तुम्हारे गाने की तारीफ़ करे तो कहना चाहिए, अल्लाह की मेहरबानी है। उसका करम है।"
इतनी जहीन और महीन बात जोहरा बाई जैसी महान गायिका ही कह सकती थी और अरसा बीत जाने के बाद 'ऐसे लोग अब कहाँ' कहते हुए लता जी जैसे लोग ही ऐसी मर्मस्पर्शी बात को याद रख सकते है। मर्मस्पर्शी इसलिए क्योंकि मुझे लगता है ये सीख मात्र किसी भी व्यक्ति की पात्रता या काबिलियत बढ़ा सकती है।
अपनी तारीफ़ के जवाब में यह कहना कि ईश्वर की कृपा है या अल्लाह का करम है, में दो महत्वपूर्ण बातों का समावेश है। पहली, अपनी प्रशंसा को स्वीकार करना यानि पूरे विश्वास के साथ अपने आपको उस लायक समझना और दूसरी, इस बात का ध्यान रखना कि ये स्वीकारोक्ति मन में कृतज्ञता का भाव लाए न कि अहंकार का। आज मुझे फिर मौका मिला है अपनी पसंदीदा पंक्ति को दोहराने का और मैं इसे बिल्कुल नहीं छोडूँगा। ' हम ईश्वर की स्वतन्त्र भौतिक अभिव्यक्ति हैं '- और जब हम इस बात को आत्मसात कर लेते है तो बड़ी आसानी से एक हाथ से अपनी प्रशंसा को ले दूसरे हाथ से उसे परमात्मा के चरणों में समर्पित कर पाते है।
प्रशंसा की विनम्र स्वीकारोक्ति हमारी ग्रहण करने की शक्ति को बढाती है और हम वह सब और बेहतर करने में समर्थ एवम सहज पाते है जिस कारण हमारी प्रशंसा हुई है। तरह हम अपने क्षेत्र में निपुण होते चले जाते है और एक दिन अपने-अपने क्षेत्र में लता मंगेशकर बनने की राह पर होते है। समस्या तो तब पैदा होती है जब हमारी प्रशंसा हमारा अहंकार तुष्ट करने लगती है। हमें ये ग़लतफ़हमी हो जाती है कि मेरे बिना तो ये सम्भव नहीं । मैं नहीं होता तो ये कौन कर पाता? इस तरह हम स्वयं ही अपनी बेहतरी के रास्ते में खड़े हो जाते है और फिर तो ईश्वर भी चाहे तो हमारी मदद नहीं कर सकता।
आपकी प्रशंसा आपकी पहचान है, आप में ईश्वर होने का प्रमाण-पत्र। इसे स्वीकार कीजिए और धन्यवाद दीजिए उस ईश्वर को जिसने आपको इस लायक समझा। आप साज़ है, साजिन्दे नहीं। साजिन्दे को साज़ बजाने की खुली छूट दीजिए, फिर देखिए ये मधुर-संगीत किस तरह आपके जीवन में रस घोल देता है।
(दैनिक नवज्योति में रविवार, 19 मई को प्रकाशित ) आपका, राहुल ..............
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Thursday, May 30, 2013
12:13:35 PM
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Rahul Dhariwal
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Thursday, May 30, 2013
11:42:10 AM
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Nani Manna
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From
Rahul Dhariwal
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'ज्ञानी से कहिए कहा, कहत कबीर लजाए अन्धे आगे नाचते कला अकारथ जाए।' - कबीर
आप कहना चाहे पर जरुरी है कि अगला सुनना भी चाहे। आप की नज़र में आप जो कह रहे है वह कितना ही महत्वपूर्ण या अच्छा क्यूँ न हो, वह तब तक निरर्थक है जब तक सुनने वाला भी ऐसा ही नहीं सोचता हो। कबीर यही तो कह रहे है कि, अन्यथा सारा ज्ञान व्यर्थ जाएगा।
कौन नहीं चाहता कि उसकी बात को गम्भीरता से लिया जाए? लेकिन ऐसा होता बहुत कम बार, बहुत कम लोगों के साथ है। आइए, सबसे पहले पड़ताल करते है कि व्यक्ति बोलता ही क्यूँ है? क्योंकि इसे जाने बिना ये नहीं समझा जा सकता कि व्यक्ति को कब, किसे और कितना कहना है? व्यक्ति के बोलने की मोटा-मोटी तीन वजहें होती है। पहली, जब भावनाओं का अतिरेक अभिव्यक्ति चाहे; दूसरी, किसी को राह दिखाना आपका दायित्व हो और तीसरी, जरुरी सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए।
भावनाओं का अतिरेक, चाहे वे ख़ुशी की हों या दुःख की, उनके साथ साझा कीजिए जिन्हें आपके सुख-दुःख से सरोकार हो। हो सकता है ऐसे लोग आपसे सहमत न हो, लेकिन इनका इरादा नेक होता है। इनकी असहमति में भी आपके भले की सोच ही छिपी है परन्तु हम चुनते है ऐसे लोगों को जो हमारी हाँ में हाँ मिलाते है क्योंकि इनसे हमें अपनी भावनाओं की तयशुदा स्वीकृति मिलती है। ऐसे लोग हमें क्षणिक ख़ुशी जरुर दे सकते है लेकिन हमारे जीवन को कभी उन्नत नहीं बना सकते। ऐसे लोगों, जिन्हें आपके सुख-दुःख से सरोकार है, से भी तब बात कीजिए जब वे स्वयं भावनात्मक स्तर पर आप से जुड़ पाने की स्थिति में हों, सम-स्थिति में हों और तब तक कीजिए जब तक उन्हें भी रस आए। यदि आप ध्यान रखेंगे तो उनका चेहरा आपको इशारा कर देगा।
सबसे नाजुक है ऐसे लोगों तक अपनी बात सही अर्थों में पहुँचा पाना जिन्हें राह दिखाना हमारा कर्त्तव्य हो। नाजुक इसलिए क्योंकि यहाँ हमारे कहे शब्द आपसी रिश्तों को खट्ठा या मीठा बना सकते है, खास तौर से हमारे बच्चों से हमारे रिश्तों को। मैंने अनुभव किया कि एक तरफ तो कुछ कहना नितांत जरुरी होता है तो दूसरी तरफ उन्हें ऐसी बातें सुनना कतई गवारा नहीं होता। इस तरह बात हमेशा नाराजगी पर ख़त्म हो जाया करती थी। मैंने जो पाया वह यह कि यदि ऐसी स्थिति है तो सबसे पहले हमें हमारे कहे कि जरुरत पैदा करनी होगी, फिर चाहे वो हमारे बात करने के तरीके से हो या हमारे आचरण से। उनके स्तर पर जाकर उनके मन के दरवाजों को खोलना होगा, शब्दों की बजाए उनके छिपे अर्थों को पकड़ने की कोशिश करनी होगी और यह सब तब ही होगा जब उन्हें पक्का विश्वास हो की उनकी बात आपकी नज़र में गलत हो या सही, बात नकारी जा सकती है वे नहीं। आपका प्रेम अखंडित रहेगा। मैंने कोशिश शुरू कर दी है और मजा आने लगा है।
बोलने की आखिरी वजह, सूचनाओं का आदान-प्रदान। वैसे तो यह जीने की जरुरत है लेकिन 'फर्स्ट-इनफॉर्मर' नाम की बीमारी से तो, तो भी बचना होगा। इस बीमारी में हम लोगों को कोई बात सिर्फ इसलिए बताते फिरते है जिससे हम सिद्ध कर सकें कि सबसे पहले ये हमें मालूम चली है। ऐसी हालत हमें सिर्फ हँसी का पात्र ही बनाती है।
मेरे सबसे प्रिय लेखक श्री कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' अपनी पुस्तक 'बाजे पायलिया के घुंघरू' के प्राक्कथन में लिखते है कि जो कहें, ह्रदय से कहें न कि बुद्धि से। ह्रदय विश्वासी और बुद्धि अविश्वासी। ह्रदय से कही बात ह्रदय में उतरती है जबकि बुद्धि से कही बात बुद्धि से टकराकर लौट आती है। वे आगे लिखते है कि आपके शब्द किसी को निरुत्तर करने के लिए नहीं बल्कि एक-दूसरे के मन को शांत करने के लिए हों। मुझे नहीं लगता की अपनी बात को प्रभावी बनाने का इससे सहज-सुन्दर कोई और गुरु-मंत्र हो सकता है।
(जैसा कि नवज्योति में रविवार, 12 मई को प्रकाशित) आपका राहुल.......
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Rahul Dhariwal
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यदि मैं आपसे कहूँ कि आज मैं आपको एक ऐसा नुस्खा बताने वाला हूँ जिससे सारी अच्छी बातें आप बिना किसी अभ्यास के ही सीख जाएँगे तो आप जरुर इसे मेरी वाक्-पटुता समझेंगे, लेकिन विश्वास मानिए, ऐसा नुस्खा मेरे पास है। अरे भाई! बताता हूँ, थोडा धीरज रखिए। नुस्खा सीधा-सा है, 'अंदर से बच्चे बने रहिये'। अरे! पहले मेरी बात सुनिए, फिर आपको ठीक न लगे तो नकार देना।
आपको नहीं लगता, बच्चों में वे सारे गुण होते है जिन्हें पहले तो हम दुनियादारी के नाम पर भुला देते है फिर उन्हें ही आध्यात्मिकता के नाम पर बाकि की जिन्दगी सीखने की कोशिश करते है। चलिए, मैं आपको कुछ एक गिनवाता हूँ,- वे 'लोग क्या कहेंगे' की परवाह नहीं करते, खुश रहना उनकी पहली प्राथमिकता होती है, वर्तमान में जीते है, दूसरों को माफ़ कर देने की उनमें अदभूत शक्ति होती है, वे आपकी किसी एक बात से नाराज़ है तो उसका आपकी किसी दूसरी बात पर कोई प्रभाव नहीं होता; मुझे नहीं लगता ये सूची आसानी से ख़त्म हो सकती है। मजे की बात तो यह है कि ये सारी बातें हम में थी, इन सारे गुणों के साथ हम पैदा हुए थे लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते गए व्यक्तित्व के इस खुलेपन से हमें डर लगने लगा। हमें हमारी सफलता, समृद्धि, वर्चस्व के खो जाने का डर सताने लगा। इस डर से बचने के लिए हमने अपने चारों ओर दीवार खींच ली। पर हुआ क्या, जितनी ऊँची हम दीवार खींचते, उतना डर बढ़ता गया और इस दीवार ने किया क्या, डर तो भगाया नहीं अलबत्ता खुशियों को जीवन में आने से जरुर रोक दिया।
अब हुआ सो हुआ, बस इस दीवार को गिरा दीजिए, अपने अंदर के बच्चे को जगाइए। बच्चों की नज़र से देखिये, कभी बचकानी हरकतें भी कीजिए। आपकी सफलता, आपकी समृद्धि, आपका वर्चस्व आपसे कोई नहीं छीन सकता चाहे इसके चारों ओर दीवार हो या न हो। हाँ, दीवार नहीं होगी तो आपकी सफलता, समृद्धि और वर्चस्व; खुशियों को अपनी ओर आकर्षित जरुर कर पाएँगी।
हम सब के जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ जरुर आती है जब हमें लगता है 'ये नहीं हुआ तो क्या होगा'। हम इतने घबरा जाते है कि जैसे ये काम नहीं हुआ तो दुनिया ही लुट जाएगी। यहाँ तक कि कई बार अंध-विश्वासों में फँस जाते है या ईश्वर के सामने गिडगिडाने लगते है। हम इतने घबराये होते है कि हमें दूसरी संभावनाएँ नज़र ही नहीं आती। हो सकता है प्रकृति चाहती हो कि हम दूसरी संभावनाओं को भी तलाशें। हम अपने होने न होने को उन परिस्थितियों से जोड़कर देखने लगते है। ऐसे मुश्किल दौर में एक मिनट के लिए ठिठक कर सोचिए कि आपकी जगह कोई और बच्चा होता तो क्या करता? मेरा विश्वास है कि आपको अपने अधिकाँश सवालों के जवाब मिल जाएँगे और आप कहीं अधिक जोश के साथ जिन्दगी जीने को प्रस्तुत होंगे।
बस इतना कीजिए, रोज़ाना थोडा समय बच्चों के साथ गुजारिए, ऐसा समय जब आप उनके बराबर हो जाएँ। कुछ उनके जैसा कीजिए, जिन्दगी जीना आ जाएगा। आपको आपके लौट आए बचपन की दिल से मुबारकबाद।
(दैनिक नवज्योति में रविवार, 5 मई को प्रकाशित) आपका राहुल...........
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Rahul Dhariwal
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एक दिन शाम को मैं अपने दोस्त के साथ बैठा था। बात चली कि शहर में एक बहुत अच्छा कवि-सम्मेलन होने वाला है लेकिन चूँकि प्रवेश निःशुल्क है इसलिए सुबह जल्दी आठ बजे ही 'पासेज' ले लेने होंगे वरना बाद में तो लम्बी लाईन लग जाएगी। तय हुआ कि वो साढ़े सात बजे मेरे यहाँ आएगा और आठ बजे से पहले ही हम वहाँ पहुँच जाएँगे। हमेशा की तरह मुझे उसके कहे पर विश्वास तो नहीं था लेकिन चूँकि कवि-सम्मेलन का उसे जबरदस्त शौक था इसलिए इस बार मुझे भरोसा था। मैं नियत समय पर तैयार था और भाई साहब हिलते-हिलते सवा-आठ बजे के करीब मेरे पास पहुँचे। न जाने क्यूँ इस बार मुझे झुंझलाहट नहीं हुई बल्कि सोचने लगा ये हमेशा ऐसा क्यूँ करता है?
एक बारगी तो लगा कि उसमें समय की पाबंदगी और अनुशासन की कमी है लेकिन जैसे-जैसे सोच गहरी उतरने लगी, कुछ और ही नज़र आने लगा। जो नज़र आने लगा वो यह था कि उसे अपने कहे शब्दों पर ही विश्वास नहीं था। जब आपको अपने पर ही विश्वास नहीं तो भला दूसरा कोई आप पर कैसे विश्वास करेगा?
जब उसने मुझे साढ़े सात बजे आने को कहा तब निश्चित रूप से उसकी जल्दी पहुँचने की मंशा थी और उसने कोशिश भी की होगी लेकिन वो समय पर नहीं पहुँच पाया क्योंकि उसकी अपने शब्दों के प्रति प्रतिबद्धता नहीं थी। चाहे वो कोई हो, जब व्यक्ति अपने शब्दों के प्रति प्रतिबद्ध नहीं होता है तब वह अपने कर्मों के प्रति भी प्रतिबद्ध नहीं हो पाता और फिर न तो उसे संतुष्टि मिलती है और न ही सफलता; यही मलाल जिन्दगी भर बना रहता ही कि वो जिसका हकदार था वह उसे कभी नहीं मिल पाया। हमारी प्रतिबद्धता हमारी क्षमताओं को बढ़ा देती है। हम वो कर गुजरते है जिसका शायद हमें भी विश्वास न था, जैसे ढेरों शक्तियाँ हमारे अन्तःकरण में सोई पड़ी थी और हमारी प्रतिबद्धता ने उन्हें जगा दिया हो।
यदि गायक बनना है तो रियाज़ से प्रतिबद्ध होना होगा, यदि लेखक बनना है तो लेखन से प्रतिबद्ध होना होगा, यदि विशेषज्ञ बनना है तो अध्ययन से प्रतिबद्ध होना होगा। रास्तों से प्रतिबद्ध हुए बिना मंजिल को पाना सम्भव नहीं लेकिन ख्याल रहे, रास्तों की भी अपनी माँग होती है। यदि आप जो करना चाहते है उसके बीच आने वाली मानवीय संवेदनाओं के प्रति असंवेदनशील है तो समझ लीजिए आपकी प्रतिबद्धता को आपके अहं ने हर लिया है। आपने जो कहा वैसा ही करना आपने अहं का विषय बना लिया है। याद है आपको 'थ्री इडियट्स' के डीन वीरू सहस्त्रबुद्धि। वे जब कहते है कि उन्होंने अपने बेटे की मौत के दूसरे दिन भी क्लास ली थी तो ये उनका अहं था जो प्रतिबद्धता का लिबास पहने था। कोई भी चारित्रिक गुण कितना ही अच्छा क्यूँ न हो जब उसमें अहं का कीड़ा लग जाता है तो वह सड़ांध ही फैलाता है।
अपने कहे को निभाइए और जो निभा पाएँ वही कहिए। विश्वास रखिए, अंतर्मन में उपजा विचार जो शब्दों का रूप लेना चाहता है, उसे निभा पाने की क्षमता आप में है तभी तो वह आपके मन में उपजा है। एक शेर के मन में उड़ने का विचार कभी नहीं आता लेकिन एक कबूतर को अपनी पहली उड़ान से भी पहले पता होता है कि वो उड़ सकता है।
अपने कहे को निभाइए, सफलता के इस रास्ते पर संतुष्टि आपकी संगिनी होगी जो आपके और आपके अपनों के जीवन में सुन्दरता की रचना करेगी।
(नवज्योति में रविवार, 28 अप्रैल को प्रकाशित) आपका राहुल..........
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Rahul Dhariwal
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एक था राजा, गुणों का पारखी। एक से बढ़कर एक रत्न थे उसके दरबार में। उनमें भी एक उनका बिल्कुल खास जिसे वे हमेशा अपने साथ रखते थे क्योंकि उसके पास हर दुविधा का जवाब होता था। हर मुश्किल को देखने का अलग नजरिया। इसके बावजूद राजा उसकी एक आदत से बहुत परेशान था। वो थी, बुरी से बुरी बात में भी बहुत अच्छा देखने की कोशिश करना। कई बार तो हद ही हो जाती थी।
ऐसा ही हुआ जब एक बार राजा उसे शिकार पर अपने साथ ले गए। मचान पर बैठने और अपनी स्थिति लेने से ठीक पहले राजा अपने हथियार सम्भाल रहे थे। क्या मालूम क्या हुआ कि उनके हाथ से अचानक ही तलवार छिटक गई और जा गिरी सीधे पैर के अंगूठे पर और अंगूठा अलग। राजा दर्द से कराह उठे। उनका वो मित्र दरबारी लपका लेकिन पट्टी बाँधते हुए बोलने लगा, 'चलो! अच्छा ही हुआ, इसमें भी कुछ अच्छा ही होगा।' इस बार राजा अपने गुस्से को नहीं सम्भाल पाए। उन्होंने उसे सूखे कुएँ में धकेल, मरने के लिए छोड़ दिया और स्वयं वापस लौटने लगे। इधर जंगल के आदिवासी अपनी पूजा-अर्चना के लिए नर-बलि ढूंढ़ रहे थे। उन्होंने लौटते हुए राजा को धर लिया। राजा को तैयार करके बलि के लिए लाया गया। अचानक उनके पुरोहित की नज़र राजा के नदारद पैर के अंगूठे पर पड़ी। उसने सारा उत्सव वहीं रुकवा दिया। अंग-भंग वाले नर की बलि नहीं दी जा सकती थी और राजा उनके चंगुल से छूट गया।
राजा को अपनी गलती का अहसास हो रहा था, वो तेजी से उस सूखे कुएँ के पास पहुँचे। अपने मित्र को सही-सलामत देख उनके जान में जान आयी। उसे बाहर निकाला और उससे माफ़ी माँगने लगे। मित्र बोला, 'कोई बात नहीं राजन, माफ़ी की कोई जरुरत नहीं। ये भी अच्छा ही हुआ।' इस बार राजा को गुस्सा नहीं आया पर उसने पूछा जरुर कि अब इसमें तुम्हें क्या अच्छा नज़र आ रहा है? मित्र बोला, सोचो राजन! यदि मैं आपके साथ होता तो मेरी बलि चढ़ जाती। राजा अवाक रह गए।
हमें पूरी बात कहाँ मालूम? इस कहानी की ही तरह कितनी बार नहीं होता कि जो बात हमें घटते समय दुर्भाग्यपूर्ण लगती है वही आगे चलकर हमारे लिए फायदेमंद साबित होती है। कई बार तो वे हमारे जीवन का निर्णायक मोड़ होती है। हम खामखाँ ही परेशान होते है। हमारा काम तो महज इतना है कि अनचाही परिस्थितियों में भी जितना हो सके शांत मन एवम पूर्ण विवेक के साथ जो उचित हो वो करते चले जाएँ। जीवन के प्रति यह दृष्टी कुछ ही समय में यह अहसास करवा देगी कि स्थिति कोई भी अच्छी या बुरी नहीं होती, वे सिर्फ स्थितियाँ होती है। ये क्षण बीते क्षणों का नतीजा जरुर होता है लेकिन इस क्षण को कैसे और कितना सुन्दर बनाना हमेशा हमारे हाथ होता है।
जिस तरह हम स्थितियों के अच्छी या बुरी होने की धारणा बना लेते है वैसे है हम अपनी आधारभूत प्रकृति के बारे में भी धारणा बना लेते है। कोई कम बोलता है तो कोई ज्यादा, किसी को अकेला रहना पसंद है तो कोई लोगों से घिरा रहता है और ऐसे ही न जाने कितने भिन्न स्वभाव। जिस में जो है उस पर ही वो अवगुण का लेबल चस्पा कर देता है और अपने मन में ग्लानि और हीन-भावना के लिए जगह खाली कर देता है। क्या सच हमें पक्का मालूम है कि ये जिन्दगी हमें कहाँ ले जाना चाहती है, उनके लिए किन विशेषताओं की जरुरत है?
आप जैसे है ठीक है, स्थितियाँ जैसी है ठीक है। यदि आपका अंतर्मन कहता है कि आप अपने में या स्थितियों को बदलिए तो ऐसा जरुर कीजिए लेकिन उन्हें गुण-अवगुण या अच्छी-बुरी के कठघरे में खड़ी मत कीजिए। जी है वो अच्छा है तभी जो होगा वो भी अच्छा होगा।
(जैसा की नवज्योति में रविवार, 14 अप्रैल को प्रकाशित) आपका राहुल .............
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Rahul Dhariwal
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यह सच है कि हमारे कुछ करने या न करने से कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई रास्ता कहीं नहीं पहुँचाता। आप चाहे जितने विवेकी हों, आप कुछ पा नहीं सकते, कोई आपसे कुछ छीन नहीं सकता। आप सम्पूर्ण है, थे और रहेंगे। ये सारी बातें सुनी सबने है पर अध्यात्म हमें इसका अनुभव कराता है। जब हम स्वयं को जानने-समझने की कोशिश में लगे होते है तब एक जगह आकर ऐसा लगने लगता है कि कुछ करने की जरुरत नहीं। अगर यह सब निरर्थक है तो कुछ नहीं करना ही अच्छा। शायद यही कारण है कि हम में से अधिकांश लोग अध्यात्म से कतराते है या इसे उन लोगों के लिए ठीक समझते है जिन्होंने अपनी जिन्दगी को भरपूर जी लिया हो।
यह सत्य की गलत व्याख्या है, अर्थ का अनर्थ है। आत्म को जानना कभी आत्मिक सुख से दूर नहीं कर सकता वैसे ही जैसे अपनी पसंद को जानना कभी आपको नाखुश नहीं कर सकता। अरे! जब परमात्मा ही प्रतिक्षण सृजन में लिप्त है तो अध्यात्म हमें निष्क्रिय कैसे बना सकता है? यह ज्ञान कि 'हम ईश्वर की स्वतंत्र भौतिक अभिव्यक्ति है' और 'विशुद्ध प्रेम हमारी ऊर्जा है', तो हमें समर्थ बनाता है कि हम वो करें जिसे सोचने मात्र से हम अपने आपको अधिक जीवित महसूस करते हों, जिसे करना हमें अपनी सम्पूर्णता और सार्थकता का अहसास कराता हो। जब हम कुछ भी करें और कोई फर्क नहीं पड़ता तो वो क्यूँ करें जो मन कचोटता हो। हम वो करें और वैसे करें कि हमारी सुगन्ध उसमें हमेशा ताजा कायम रहे। हमारा कुछ भी किया हमारी उपस्थिति दर्ज कराए।
अपनी बात को और ढंग से कहने के लिए माँ के हाथ की बनी रोटी से बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है। रोटी बनाने में कोई बड़ी विद्या नहीं, पर माँ के हाथ की रोटी का स्वाद हो कुछ और होता है। माँ खाना खिला रही हो, और बीच में किसी और के हाथ की बनी रोटी आ जाए तो फट से मालूम हो जाता है क्योंकि वह रोटी प्रेम की आँच पर सीकी होती है। हम भी तो अपने किए और न किए के सृजक है, माँ है।
इन सारी बातों का निचोड़ सिर्फ इतना ही कि आप अपने जीवन की नींव उन मूल्यों पर रखें जिन्हें आपका अंतर्मन सहज स्वीकार करता हो। याद रखें, आप ईश्वर की स्वतंत्र भौतिक अभिव्यक्ति है और आपकी अद्वितीयता से ही इस संसार की सुन्दरता है। अपने जीवन का वो रास्ता चुनें जो आपको ख़ुशी देता हो। आपके कुछ करने या न करने का प्रथम आधार उससे मिलने वाला आत्मिक आनन्द हों। जिस काम से आपको आत्मिक आनन्द मिलेगा उसे ही तो आप विशुद्ध प्रेम की उष्मा दे पाएँगे। विशुद्ध प्रेम, जो हमारे वज़ूद की वजह है। यदि कोई काम आप प्रेम से नहीं कर सकते तो बेहतर है उसे न करें, चाहे बात रोजमर्रा के छोटे-मोटे कामों की हो या जीवन के महत्ती कामों की।
सार-संक्षेप यही कि आत्म की दृष्टी से कुछ भी करने योग्य नहीं फिर भी कर्म हमारा स्वभाव है अतः अपने जीवन में आत्मिक आनन्द का सृजन करते चलिए और शेष उस सृजक पर छोड़ दीजिए जिसकी हम सृजना है। खलील जिब्रान गागर में सागर यूँ भरते है, " अपने कर्मों की बाँसुरी बन जाएँ। बाँसुरी, जिसके ह्रदय में घंटों फूंकने का जतन संगीत बनकर निकलता है। जिन्दगी का गूढ़ रहस्य है उसे मेहनत के जरिये प्रेम करना। हमारे कर्म अन्तरम प्रेम के इज़हार का जरिया हों, वे ही आत्मिक आनन्द देंगे।"
(दैनिक नवज्योति में रविवार, 7 अप्रैल को प्रकाशित) आपका राहुल .............
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Rahul Dhariwal
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जीवन एक उत्सव है तो दुनिया एक सैर और हम सब यहाँ इकट्ठा हुए है जिन्दगी नाम की पिकनिक को मनाने। पिकनिक, जहाँ हमख्याल दोस्त कुछ समय के लिए ही सही, साथ मिलकर जिन्दगी का आनन्द उठाते है। आप भी कई बार पिकनिक गए होंगे। आपने नहीं देखा, वहाँ आपकी कुछ बातें दूसरे मान लेते है तो कुछ दूसरों की बातें आपको माननी पड़ती है। हमारा जीवन भी कुछ ऐसा ही है क्योंकि उत्सव मनाने का यही सही तरीका है और दुनिया शब्द का तो अर्थ ही 'दो' से है।
आप कहेंगे एक तरफ तो, व्यक्ति ईश्वर की स्वतंत्र अभिव्यक्ति है अतः वह अपना जीवन कैसे जिएगा यह सिर्फ और सिर्फ वह ही तय करेगा। व्यक्ति के जीवन की दिशा वह हो जिस ओर से अन्तर्मन पुकारे। दूसरी तरफ आज मैं जिन्दगी का लुत्फ़ उठाने के लिए एक दूसरे की बात मानने की वकालात कर रहा हूँ। एक दुसरे का साथ निभाने की बात कर रहा हूँ।
देखिए, जीवन की कुछ बातें होती है सैद्वान्तिक जिनका सम्बन्ध व्यक्ति की छोटी-मोटी आदतों से होता है। निस्संदेह व्यक्ति को किसी के लिए भी अपने जीवन मूल्यों से समझोता नहीं करना चाहिए। श्रेष्ठ जीवन वही है जिसका आधार मूल्य हों। साथ ही आपको यह छूट अपने प्रियजनों और परिजनों को भी देनी होगी, उनकी अद्वितीयता को स्वीकारना होगा और यह तब ही संभव होगा जब हम अपनी छोटी-मोती आदतों को बदलने को तैयार हों। अपने आराम को छोड़ने के लिए तत्पर हों। शायद इसीलिए रहन के साथ सहन जुड़ा होता है। साथ रहना है तो थोडा सहना भी होगा।
इस तरह जब आप दूसरों की बात समझने को तैयार होंगे, उनकी बात उन्ही की भाषा में सुनने को तैयार होंगे तो निश्चित ही वे अपने आपको आपके साथ सहज महसूस करेंगे। वे आपकी बात खुले मन से सुनेगें और तब ही आप अपनों के जीवन में किसी सुन्दर बदलाव का कारण बन पाएँगे। ये आपके जीवन को भी स्वतः ही सुंदर बना देगा क्योंकि प्रत्युत्तर में आप भी तो वैसा ही व्यवहार पाएँगे।
क्या मालूम हम सबकी यह प्रवृति है कि कोई माँगे तो दूँ , शायद यह भी अहं का ही एक राग है। हम इंतज़ार करते है कि कोई हमें कहे तो हम उसके लिए कुछ करें। मैं सोचता हूँ, क्यों नहीं हम अपना जीवन सुखद बनाने के लिए ऐसा सोच कर देखें कि वे मेरी कौनसी आदतें है जो मेरे अपने मुझमें बदलना चाहेंगे। आपको भी मालूम है और मुझे भी, कि जानते तो हम सब है पर उन्हें सतह पर नहीं आने देना चाहते क्योंकि इससे हमारे आराम में खलल पड़ता है, बेचारे अहं को चोट पहुँचती है। जिन्दगी को बुहारना है तो ये कष्ट को पाना ही पड़ेगा। अपनों के लिए अपने को थोडा सा बदलकर देखिए, आप अंदाजा ही नहीं सकते कि एवज में आपको कितना मिल सकता है। निदा फाज़ली ठीक ही फरमाते है.............
मुम्किन है सफ़र हो आसाँ, अब साथ भी चल कर देखें कुछ तुम भी बदल कर देखो कुछ हम भी बदल कर देखें
(नवज्योति में रविवार, 31मार्च को प्रकाशित) आपका राहुल……
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Rahul Dhariwal
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हमारे बच्चों के भारी स्कूल बैगों की हमारी चिंता बिल्कुल जायज और प्रशंसनीय है। नन्ही जानें और इतना बोझ, ठीक से चल पाना मुश्किल। रोज-रोज की तरह-तरह की परीक्षाएँ और अनुशासन के नाम पर इतने कायदे-कानून। ख़ुशी की बात है कि इस दौर में अधिकांश स्कूलें और अभिभावक दोनों ही इस समस्या के प्रति जागरूक हो रहे हैं। मन किया इस विचार को थोडा और विस्तार दें, तो पाया हम सभी कितना अनावश्यक बोझ अपने पर लादे है और फ़ालतू ही हांफ रहे है। कोई अनावश्यक वस्तुओं का, कोई विचारों का तो कोई दायित्वों का।
जगह कितनी ही सुंदर क्यों न हो, यदि आप थके हुए है तो घूमने का मज़ा नहीं आ सकता, ठीक उसी तरह इस खुबसूरत जिन्दगी का आनन्द भी दिमाग़ में इन फ़ालतू बोझों के साथ नहीं आ सकता। आप ही बताइए, क्या एक यात्री नदी पार कर लेने के बाद चप्पू-पतवार साथ लिए चल पड़ता है? कभी नहीं, चाहे उसे अहसास हो कि इसके बिना यात्रा संभव ही नहीं थी। हमने भी कितनी ही ऐसी वस्तुएँ इकट्ठी कर रखी है जिसका अब कोई उपयोग नहीं। कुछ चीजें हमें बहुत पसंद है इसलिए, तो कुछ चीजें हमें नापसंद है लेकिन हमें सिखाया है कि बिना काम लिए किसी चीज को हटाना बरबादी है इसलिए। एक रास्ता है, इन चीजों को उन लोगों तक पहुँचाइए जिन्हें इनकी ज्यादा जरुरत है और शुरुआत कम पसंद की वस्तुओं से कीजिए।
मानता हूँ, ये कोई इतनी बड़ी बात नहीं है, लेकिन आपका यह दृष्टिकोण आपकी मनोदशा बदल अनावश्यक विचारों और दायित्वों से पीछा छुड़ाने में मदद करेगा। आपका घर स्वतः ही सुंदर और दैनिक जीवन अधिक व्यवस्थित होने लगेगा।
ऐसे विचारों का बोझ जिनका सम्बन्ध भूतकाल से है। किसी के आहत करने की पीड़ा घर कर गई है या आपको किसी बात का अफ़सोस है। दोनों ही स्थितियों में, आपको यह बात समझनी और स्वीकारनी पड़ेगी कि जो बीत गया उसे बदला नहीं जा सकता। हाँ, यदि हम इस क्षण को पूरे विवेक के साथ जिएँ तो, स्थितियाँ कैसी भी हों, हम उनका उपयोग अपने हित में जरुर कर सकते हैं। टेक्नॉलोजी के इस युग में उन जानकारियों का बोझ भी कम नहीं जो अनजाने ही हमने अपने दिमाग में ठूंस ली है। आवश्यक जानकारियों का विवेकपूर्ण इस्तेमाल तो निश्चित ही व्यक्ति की मदद करता है लेकिन इंटरनेट और मीडिया द्वारा जानकारियों की बमबारी ने तो व्यक्ति के मस्तिष्क की उर्वरा का ही नाश कर दिया है।
इसी तरह वे औपचारिकताएँ, तारीखें और दायित्व जो हमने बिना सोचे-समझे या सभी ऐसा करते है इसलिए या किसी और ने हमारे लिए तय कर ली है। इन सब के चलते हमने अपने दैनिक जीवन को अत्यधिक व्यस्त, तनाव भरा और उबाऊ बना लिया है। यहाँ तक कि हम अपनी प्राथमिकताओं को लेकर भी पूरी तरह भ्रमित हो चुके है।
एक मिनट ठिठक कर सोचिये, क्या आपके लिए है और क्या नहीं फिर चाहे वे वस्तुएँ हों, विचार हों या दायित्व। अपने जीवन से फ़ालतू चीजों की सफाई कीजिए, आपके पास अपनी प्राथमिकताओं को ढंग से निभा पाने के लिए पर्याप्त समय और पर्याप्त ऊर्जा होगी । जिन्दगी को देखने और आनंद लेने का धीरज होगा। मैं तो यही कहूँगा, 'कम सामान, सफ़र आसान'।
(दैनिक नवज्योति में रविवार, 24 मार्च को प्रकाशित) आपका, राहुल ..........
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Rahul Dhariwal
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कुछ दिनों पहले एक टी.वी. प्रोग्राम में पण्डित शिवकुमार शर्मा का इंटरव्यू देखने का अवसर मिला। जब बोमन ईरानी, जो उनका इंटरव्यू ले रहे थे, ने उनकी उपलब्धियाँ बतानी शुरू की तो अंत में पण्डित जी ने यही कहा, 'मैं आज भी संगीत का विद्यार्थी हूँ।' मैं रियाज करता हूँ तब तो सीखता ही हूँ, जब कॉन्सर्ट दे रहा होता हूँ तब भी सीख रहा होता हूँ और जब अपने शिष्यों को सीखा रहा होता हूँ तब भी।
ये बातें वो व्यक्ति कर रहा था जिसे भारत सरकार ने पदम् श्री और पदम् विभूषण से नवाजा, जिसे सयुंक्त राज्य की मानद नागरिकता प्राप्त है, जिसने लोक-संगीत में काम आने वाले वाद्य को शास्त्रीय संगीत बजा सकने के लिए परिष्कृत कर दिया, जो स्वयं आज संतूर का पर्याय है। इसके बाद भी वे अपनी कला में और निपुण होना चाहते है, तो क्या पण्डित जी संतुष्ट नहीं है? कितना बेतुका सवाल है, लेकिन हाँ, यहाँ यह प्रश्न हमें संतुष्टि को समझने में मदद जरुर कर सकता है।
'और की चाह' हमें प्रकृति से मिली है। एक बीज, वृक्ष होने तक हर क्षण उन्नत होना चाहता है और यही हम सब के साथ भी है, आखिर हम भी तो उस विराट प्रकृति का ही तो हिस्सा है। यदि अपने आपको रोक लेना संतुष्टि है तब तो यह हमारे नैसर्गिक गुणों के विपरीत है। अर्जुन से ज्यादा कृष्ण का सामीप्य किसे मिला होगा पर उसे भी कृष्ण के विराट स्वरुप और फिर चतुर्भुज स्वरुप की चाह है।
संतुष्टि का मतलब 'और की चाह' न होना कतई नहीं है वरन जो कुछ है उसके लिए प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का एवम स्वयं के प्रति सराहना का भाव होना। अपनी कमियों को, जिसे मैं विशिष्टताएँ कहूँगा, स्वीकारना। इन भावों के साथ हर क्षण अपने आपको और बेहतर अभिव्यक्त करने की चाह, यही संतुष्टि है। संतुष्टि अकर्मण्यता नहीं, जीवन को बेहतर बनाने का मंत्र है।
वास्तव में, 'और की चाह' हमारी बेचैनी और तनाव का कारण नहीं होती वरन हमारी यह सोच कि उन सब के बिना हमारा काम नहीं चल सकता, एक अच्छी जिन्दगी वो सब हासिल किए बिना सम्भव नहीं। हम अपनी उपलब्धियों को अपने जीवन की सार्थकता और अपना परिचय समझने लगते है। हमारी इसी सोच के चलते हम अपनी जिन्दगी को बेचैनी और तनाव से भर लेते है जो हमें अधीर तो बनाती ही है हमारी दृष्टी को भी धुंधला कर देती है। कई बार लगता है कि सीधे तरीकों से यह सब कर पाना सम्भव नहीं तो कई बार सामने पड़े अवसर भी दिखाई नहीं देते।
ऐसा नहीं है, एक खुशहाल जिन्दगी न तो आपकी उपलब्धियों की मोहताज है न ये आपका परिचय न ही आपके होने का प्रमाण। ये महज आपकी अभिव्यक्ति है, वृक्ष पर आये फल और फूलों की तरह । उपलब्धियाँ जिन्दगी का श्रृंगार हो सकती है प्राण नहीं। जिन्दगी की यही उलटबाँसी है कि यदि हमारा रवैया यह रहे कि 'मिले तो ठीक, न मिले तो ठीक' तो ज्यादा मिलता है क्योंकि तब दृष्टी साफ़ और मन शांत होता है।
मेरी मानिए, संतुष्टि को सफलता की सीढी बनाइए और जिन्दगी का लुत्फ़ उठाइए।
(दैनिक नवज्योति में रविवार,17 मार्च को प्रकाशित) आपका, राहुल .............
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Rahul Dhariwal
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दिल की सुनें-दिल की सुनें, सुन-सुनकर कई बार झुंझलाहट होने लगती है, वाजिब भी है। कितनी सारी बातें होती है जो तय करती है की हम अपनी जिन्दगी को कैसे जिएँगे। जिन्दगी के हर क्षण की कुछ जरूरतें होती है। अपने परिवार और प्रियजनों के प्रति हमारे कुछ जरुरी फर्ज होते है। इन्हें निभाने के ज़ज्बे के साथ जरुरी होता है पर्याप्त धन। दिल की आवाज के साथ इस बात का भी उतना ही ध्यान रखना होता है। यहाँ आकर जिन्दगी खट्ठी-मिट्ठी हो जाती है। आप खुश तो होते है कि आप वो सब कर पाए जो आपको करना चाहिए था लेकिन अपने मन की न कर पाने के कारण संतुष्टि का भाव नदारद होता है।
आप खुश है पर संतुष्ट नहीं। आप जैसे दिखते है वैसे है नहीं। समय के साथ-साथ जैसे-जैसे इनमें दूरियाँ बढती है, मन का खालीपन गहराता चला जाता है। इस खाई को पाटने के लिए जरुरी है यह समझना कि आपने अपने दायित्वों के चलते अपने दिल की आवाज को मुल्तवी किया था, नकारा नहीं था। होता यह है कि हम अपनी जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते दूसरों की अपेक्षाओं पर जीने लगते है। हमारे परिवार और प्रियजन जो निस्संदेह हमसे प्रेम करते है, हमारा भला चाहते है, हमें अपने तरह से जीने के लिए मजबूर करने लगते है। वे समझते है, जीने का उनका तरीका ही ठीक है और ऐसा करना उनका नैतिक कर्त्तव्य है। और हम, उनकी अपेक्षाओं पर खरे उतरने को अपना दायित्व समझ लेते है।
आपका फर्ज क्या है, यह आप तय करेंगे। कई बार ऐसा भी होता है कि जो व्यक्ति अपने दायित्वों के प्रति सचेत होता है उससे सबकी अपेक्षाएँ तो अधिक होती ही है, लोग अपने काम भी उसकी झोली में डाल देते है। आप उसे भी अपना दायित्व लेते है और लगे रहते है। उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतर पाने की आपको ख़ुशी तो होती है पर मन के किसी कोने में लगता है आपका उपयोग किया गया और एक असंतुष्टि का भाव तैर जाता है। अपने दायित्व निभाना धर्म है लेकिन अपने आपको उपयोग में लिए जाने की अनुमति देना, अपने प्रति दुर्व्यवहार। इन दोनों के बीच आपको स्पष्ट सीमा-रेखा खींचनी होगी।
हो सकता है आपने अपने काम के साथ समझौते किए हों, करने भी पड़ते है। व्यावहारिक जीवन में धन के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता लेकिन आप इन समझौतों से अपनी जिम्मेदारियों के पूरा होते ही बाहर आ सकते है। आपको आना ही चाहिए, पर यह तब ही सम्भव होगा जब आप जिस काम में आज है उसे बेहतर से बेहतर करने की कोशिश करें। आपकी यही कोशिश आपके पसंद के काम की सीढ़ी बनेगी। आपकी पात्रता, आपकी लायकियत बढ़ाएगी। अवसरों और आशीर्वादों की तो बारिश हो रही है, हमें तो बस समेटने की क्षमता बढ़ानी है।
यदि आप अपने काम में बदलाव को उम्र से जोड़कर देखते है तो मैं कहूँगा, यह बिल्कुल बेमानी है। कितने ही उदाहरण हमारे आस-पास बिखरे पड़े है जो इसे झुठलाते है। बोमन ईरानी को हो लीजिए, चालीस की उम्र में अभिनय शुरू किया और आज वे फिल्म जगत के मंजे हुए चरित्र अभिनेता है।
दिल और दिमाग का सही संतुलन ही ख़ुशी और संतुष्टि को एकरूप करेगा । जिन्हें आपने अपनी जिम्मेदारी समझा और निभाया वह भी आपके ही दिल की आवाज थी और आज आप अपने जीवन को किसी और तरह जीना चाहते है तो यह भी आपकी अपने प्रति जिम्मेदारी और आपके दिल की आवाज ही है। यदि खुश होने का कारण संतुष्टि नहीं है तो निश्चित है कि आपने अपनी जिन्दगी को दुसरे खुश लोगों के पैमाने पर कसा है। संतुष्टि अनुभूति है तो ख़ुशी अभिव्यक्ति, पर है दोनों निजी। आप तो जिन्दगी की गाड़ी को संतुष्टि की राह पर मोड़ दीजिए, खुशियाँ अपने आप पीछे खींची चली आएँगी।
(जैसा कि नवज्योति में रविवार, 10 मार्च को प्रकाशित) आपका राहुल ..........
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Rahul Dhariwal
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आज एक वर्ष हो जाएगा मेरे लेखन की शुरुआत को, समय कैसे गुजर जाता है, मालुम ही नहीं चलता। 2004 से जब इस विषय को पढना-गुणना शुरू किया था तब कहाँ मालुम था कि यात्रा में एक पड़ाव यह भी आएगा। इस यात्रा ने मुझे सिखाया कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए तीन बातें जरुरी होती है,-
1.काम की शुरुआत 2.लगे रहें 3.सपनों को हमेशा जेहन में बनाए रखें
- प्रत्येक व्यक्ति के मन में एक 'शुरूआती हिचक' होती है। इस हिचक का कारण चाहे जो हो लेकिन इससे पार पा लेने भर में काम की आधी सफलता छुपी होती है। हेनरी फोर्ड जब अपनी कार की वी-8 श्रन्खला निकालने की सोच रहे थे, जिसमें एक ही ब्लॉक में आठ सिलेंडर होने थे और ऐसा उस समय एक भी कार में नहीं था, तब उनका एक भी इंजीनियर उनके इस विचार से सहमत नहीं था। यहाँ तक कि इस मॉडल के नक़्शे तक बन गए पर इंजीनियर्स का मत था कि ऐसा मॉडल सड़क पर सफल नहीं हो पायेगा। उनके तर्क सुन-सुनकर वे परेशान हो चले थे, आख़िरकार एक दिन वे फैक्ट्री पहुंचे और एक कार मंगवायी। खड़े रह कर वहाँ से उसे काटने को कहा जहां से उसमें बदलाव लाने थे और फिर इंजीनियर्स से बोले, बातें करना बंद कीजिए और नए मॉडल पर काम शुरू कीजिए। आचरण की यही बेबाकी व्यक्ति से आश्चर्यचकित कर देने वाले काम करवा देती है।
- काम की शुरुआत में तो सभी का मन उत्साह और उमंग से भरा होता है लेकिन फिर धीरे-धीरे बोरियत होने लगती है। हम परिणामों को लेकर अधीर होने लगते है और मन की यही अधीरता व्यक्ति को यह सोचने पर मजबूर करने लगती है कि शायद उससे यह काम संभव ही नहीं। मन की इसी चंचलता की वजह से व्यक्ति का टिक कर एक ही काम में 'लगे रहना' मुश्किल होता है। 'लगे रहने' का यह ज़ज्बा अव्वल दर्जे का संयम मांगता है इसीलिए यह सबसे अहम् हो जाता है। आपने देखा होगा, जब हम किसी वृक्ष को काट रहे होते है तब कुल्हाड़ियों की कितनी चोटों तक वो तस से मस नहीं होता और फिर एक आखिरी चोट और वो धराशायी। वृक्ष पर की गई हर चोट उतनी ही अहमियत रखती है जितनी आखिरी। इसका श्रेष्ठ उदाहरण है थॉमस एल्वा एडिसन। सफल बल्ब बनाने के लिए उन्होंने 900 से अधिक बार कोशिशें की। वे लगे रहे और आखिर बल्ब को जलना पड़ा।
- शुरूआती हिचकक से पार पाना और फिर उसमें लगे रहने की ऊर्जा के लिए जरुरी है कि हमारा ध्येय हमेशा हमारी आखों के सामने बना रहे। काम की शुरुआत से अंत तक चाहे जैसी परिस्थितियाँ आएँ, चाहे जैसी मनःस्थिति बने, हम हर हाल में अपने सपनों को जिन्दा रखें। आचार्य चाणक्य ने जो अखण्ड आर्यावृत का सपना देखा था वो उन्होंने लक्ष्य प्राप्ति तक अक्षु०ण रखा। कैसी-कैसी परिस्थितियाँ और कितना लम्बा अंतराल, लेकिन उनके जेहन में अपने सपने की तस्वीर बिल्कुल साफ़ और स्पष्ट थी और वे उसे रूप देते चले गए। व्यक्ति के मन में अपने लक्ष्य की छवि स्पष्ट हो तो कोई प्रलोभन या परिस्थिति उसे विचलित नहीं कर सकती।
ये तीनों गुण हर इन्सान को मिले हैं; आपको, मुझको, हम सभी को इसलिए बेहिचक सपने देखिए। देखेंगे तब ही तो पूरे ।सपने क्या है?, प्रकृति का आपको दिया जॉब-कार्ड ही तो है। प्रकृति को आप पर भरोसा है, वो आपके साथ है फिर आप अपने सपनों पर प्रश्न-चिन्ह लगाए बैठे है? अपनी बात को विराम देने के लिए सपनों की अहमियत को उकेरती कॉलरिज की इन सुंदर पंक्तियों से बेहतर क्या होगा ......
क्या हुआ जो तुम सो गए और तुमने एक सपना देखा, तुम स्वर्ग में थे जहाँ तुमने, एक अनदेखा खुबसूरत फुल तोड़ लिया, तुम्हे कहाँ मालुम था जब उठोगे वो फुल तुम्हारे हाथ में होगा।
( नवज्योति में रविवार, 3 मार्च को प्रकाशित) आपका राहुल ...........
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Rahul Dhariwal
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आज हर कोई व्यक्ति भीड़ में अकेला नज़र आता है; डरा हुआ, सहमा हुआ। ख़ुशी है तो बाँटे किसके साथ और दुखी है तो सम्बल कौन दे? बस, हर बार बिखरे हुए स्वयं को इकट्ठा करके आगे चलता हुआ, हर क्षण अपने अकेलेपन से जुझता हुआ। मुझे लगता है अकेलेपन से बड़ा कोई श्राप नहीं। व्यक्ति में आ सकने वाली सारी शारीरिक बीमारियों और मानसिक कमजोरियों की जड़ है उसका अकेलापन। यदि हम सब एकाकी महसूस करते है तो फिर एक-दूसरे का हाथ क्यों नहीं थाम लेते? स्वाभाविक है यहाँ इस प्रश्न का उठना, पर ये भी सत्य है कि हम ऐसा नहीं कर पा रहे है? क्या वजह हो सकती है? व्यक्ति इतना संकीर्ण कैसे हो गया?
'डर'- एकमात्र वजह है और यह डर देन है हमारे सामाजिक वातावरण की, उन मूल्यों की जिस पर हमारी सामाजिक व्यवस्था टिकी है। आज व्यक्ति डरा हुआ है अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर, पग-पग पर व्याप्त गला-काट प्रतिस्पर्धा को लेकर, बच्चों के भविष्य और उसके लिए आवश्यक धन को लेकर, जीवन के संध्याकाल के सुकून से गुजर पाने को लेकर और ऐसी ना मालूम कितनी चिंताएँ। साधारण सी बात है जब व्यक्ति डरा हुआ होता है तब उसे अपने अलावा किसी का ख्याल नहीं आता। फ़र्ज़ कीजिए, आप किसी जंगल से गुजर रहे है और आपके सामने शेर आकर खड़ा हो गया, ऐसे समय आपको क्या किसी को भी अपनी जान बचाने के अलावा कुछ और याद नहीं आएगा। बस, ये डर ही है जिसने हमको इतना संकीर्ण बना दिया है।
डर ने व्यक्ति को संकीर्ण बना दिया और व्यक्ति ने अपनी चिंताओं का उपाय पैसे में ढूंढ़ लिया। उसने अपने आपको बचाने के लिए अपने चारों ओर पैसे की चारदीवारी खींच ली और व्यक्ति, व्यक्ति से कटता गया। पैसे की दौड़ में हम एक-दूसरे के डर को ही तो भुना रहे है और एक-दूसरे के जीवन में चिंताएँ पैदा कर रहे है। हमारे यही सामाजिक मूल्य हमारे अकेलेपन की वजह है।
जिन मूल्यों में आप विश्वास नहीं करते उन्हें क्यूँ समाज से उधार लें? इसका मतलब यह भी नहीं कि आप बिला वजह विरोध करें जैसे किसी दिन आप बिना कपड़ों के ही घर से निकलने की सोचने लगें। सामाजिक मर्यादाओं का पालन करना ओर बात है और जीवन मूल्यों का चुनाव और बात। आप किस तरह जिएँगे, ये आप और सिर्फ आप तय करेंगे। आप किन बातों को अपने जीवन में तरजीह देंगे इसका फैसला सिर्फ आप करेंगे, न कि समाज और रीती-रिवाज।
आप जब ऐसा करने लगेंगे तो स्वतः ही आप जिन्दगी में ऐसे लोगों को उपस्थित पाएँगे जिनके जीवन-मूल्य आपसे मेल खाते हों। हाँ, इतना अवश्य है कि हाथ आपको बढ़ाना होगा। धीरे-धीरे आपके चारों ओर अपना एक संसार बनने लगेगा। ऐसा संसार जिसमें लोग आपके दुःख-सुख बाँटने को आतुर होंगे। जिन्दगी की मुश्किल घड़ियों में, जब आप थक हुआ महसूस कर रहे होंगे, वे घने वृक्ष की तरह छाया तो देंगे ही, जरुरत पड़ी तो देर के लिए आपका सामान भी उठा लेंगे। ऐसे मित्रों के जीवन को आसन बनाने के लिए आप भी हमेशा तत्पर होंगे क्योंकि आप एक-दूसरे को बखूबी समझते है। आप के रिश्ते समान जीवन-मूल्यों की डोर से बंधे है। एक-दूसरे पर ये भरोसा ही आपको सच्ची ख़ुशी देगा। आप संकीर्णताओं के केंचुल से मुक्त हो जिंदादिल जिन्दगी जी पाएँगे। जीवन एक उत्सव होगा। तो आइए, कहीं ओर निवेश करने की बजाए इंसानों में निवेश करें, अपने संसार की रचना स्वयं करें।
(नवज्योति में रविवार, 24 फरवरी को प्रकाशित) आपका राहुल..........
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Rahul Dhariwal
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व्यक्ति को उसका काम नहीं, स्थितियाँ थकाती है आज जब हमारे सामने विकल्पों का ढेर है तब स्थितियाँ ज्यादा थका रही है। आप शहर के किसी भीड़-भाड़ वाली जगह पर दो मिनट के लिए खड़े हो जाइए, शायद ही आपको कोई शांत चेहरा नज़र आएगा। एक दुविधा नज़र आती है, ऐसा लगता है व्यक्ति जो कर रहा है वह पूरे मन से नहीं और जो नहीं कर रहा है वह पूरे विश्वास से नहीं।
यह दुविधा ही तनाव का कारण है। एक डर है मन में कि जिस रास्ते को पकड़ा है वह ठीक तो है और जिसे छोड़ा है वह भविष्य में अफ़सोस का कारण तो नहीं बन जाएगा। डर वास्तव में भूत की कोख से जन्म लेता है और भविष्य में निवास करता है। हो सकता है भूतकाल में आपके लिए कुछ निर्णय गलत सिद्ध हुए हों लेकिन क्या वे सही निर्णयों तक पहुँचने का एकमात्र उपलब्ध रास्ता नहीं थे? आपने जो भी निर्णय लिए वे उस दिन की आपकी समझ और समय-परिस्थिति के हिस़ाब से बिल्कुल सही थे। आज आप कहीं समझदार और परिपक्व है, और बेहतर निर्णय लेने की स्थिति में है तो उन कम ठीक निर्णयों की ही बदौलत। जीवन का कोई अनुभव फ़ालतू नहीं होता। अपने निर्णयों पर मजबूत रहिए और आगे बढिए, आगे का रास्ता अपने आप बनता चला जाएगा।
रही बात जिस रास्ते को छोड़ा है भविष्य में उसे नहीं चुनने का अफ़सोस रह जाने का, तो निश्चिन्त रहिए, यदि ऐसा हुआ भी है तो प्रकृति पुनः नये तरीके से विकल्पों के साथ आपके सामने प्रस्तुत होगी। आपको फिर-फिर मौका देगी। प्रकृति को आपसे कोई अहंकार नहीं, ये तो वो शिक्षक है जो विद्यार्थी को तब तक मौका देती है जब तक विद्यार्थी उत्तीर्ण न हो जाए। मुझे याद आ रही है पूर्व सेनाध्यक्ष श्री वी.के.सिंह की वो उक्ति जो उन्होंने अपने हाल ही के जयपुर आगमन पर एक आख्यान में उद्धृत की थी, 'जीवन हौसलों से चलता है, हौसले निर्णयों से पैदा होते है, सही निर्णय अनुभवों की देन होते है लेकिन अनुभव, गलत निर्णयों की वजह से ही होते है।'
जीवन में कुछ स्थितियाँ ऐसी भी होती है जहाँ विकल्प हमारी भावनाओं से, हमारे दिल से जुड़े होते है। एक दूसरी तरफ जाने से रोकता है तो दूसरा पहली तरफ। दुविधा की ऐसी विकट घड़ी में आप अपने आपको उस स्थिति से अलग कर देखने की कोशिश करें। आप की जगह कोई और होता तो क्या करता? इस तरह निरपेक्ष भाव से देखने पर आपको सारे पहलू साफ़-साफ़ नज़र आने लगेंगे और तब आपके लिए तय कर पाना कहीं आसान होगा।
सारी दुविधाओं की वजह हमारे गलत पैमाने है जिन पर हम अपने निर्णयों को कसते है। हम उपलब्ध विकल्पों को लाभ-हानि या हार-जीत के तराजू में तौलते है और इसलिए हमेशा मन में हारने का, खोने का एक डर समाया रहता है। निर्णय का पैमाना सिर्फ विकल्प की उपयुक्तता होनी चाहिए। जो देश, काल, समय और परिस्थिति में उपयुक्त हो। जो हमारा कर्त्तव्य है। जिसमें हम सब का भला निहित है। यही निरपेक्ष भाव है जहाँ आपको विकल्पों और परिणामों से मोह नहीं, आपके लिए क्या उचित है, सिर्फ इसका ख्याल है।
सुन-पढ़कर निश्चित रूप से आपको लगेगा कि ऐसे तो इस तरह तो दुनिया में जी पाना सम्भव ही नहीं, लेकिन यही तो मजे की बात है। निरपेक्ष भाव से लिए निर्णय ही हमारे लिए लाभदायक और हमें विजयी बनाते है। सच ही है, हम सभी इस कर्म-भूमि के अर्जुन है तो सारथी कृष्ण भी हमारे ही भीतर मौजूद है, बस जरुरत है हम निर्णय की रासें उस निर्लिप्त कृष्ण के हाथों सौंप दें।
( नवज्योति में रविवार, 17 फरवरी को प्रकाशित) आपका राहुल .............
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Rahul Dhariwal
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हजारों साल पुरानी बात है जब ईसाई धर्म अपने शैशव काल में था। इन दिनों उन लोगों को तरह-तरह से कुचला और रौंदा जा रहा था जो ईसाई धर्म की शिक्षाओं में विश्वास करने लगे थे। ऐसे ही एक व्यक्ति थे वेलेन्टीनस, जिन्हें ईश्वर के प्रेम पर अटूट विश्वास था। उन्हें लोगो को भड़काने के जुर्म में कैद कर लिया गया, उन पर मुकदमा चला और पहले से तय फाँसी की सजा सुना दी गई।
कैद के दौरान जेल के चौकीदार ने भांप लिया था कि यह व्यक्ति साधारण नहीं है। वह रोज अपनी अंधी बेटी जूलिया को शिक्षा-संस्कार के लिए उनके पास लाने लगा एक दिन जूलिया ने वेलेन्टीनस से पूछा, " क्या मैं कभी देख पाऊँगी?" वेलेन्टीनस ने जवाब दिया "बेटा ! दिल में प्रेम और परमात्मा में विश्वास हो तो सब कुछ संभव है।" वेलेन्टीनस की प्रेरणा पाकर उस क्षण जूलिया का ह्रदय परम और विश्वास से लबालब हो गया, जहां किसी आशंका की कोई गुंजाईश नहीं थी। उसी क्षण कुछ हुआ, और जूलिया के आँखों की रोशनी वापस लौट आयी।
दूसरे दिन जब जूलिया वापस अपने गुरु से मिलने पहुँची तब तक उन्हें फाँसी के लिए ले जाया जा चुका था। हाँ, उसे अपने नाम एक पत्र जरुर मिला,-
मेरी प्रिय जूलिया,
शायद हम वापस कभी न मिलें लेकिन एक बात हमेशा ध्यान रखना, मैं तुम्हें हमेशा प्रेम करता रहूँगा। तुम मुझे बहुत प्रिय हो। मैं हमेशा तुम्हारे पास हूँ, तुम्हारे दिल में ही तो रहता हूँ। मुझे तुम में पूरा विश्वास है।
तुम्हारा, वेलेन्टाईन
.......... और ह्रदय के असीमित प्रेम ने वेलेन्टीनस को 'सेंट वेलेन्टाईन' बना दिया और जिस तरह उन्होंने अपने प्रेम और विश्वास का इज़हार जूलिया से किया वही याद रखने और उन्हें आदरांजलि देने के लिए हम हर साल यह दिन 'वेलेन्टाईन डे' के रूप में मनाने लगे।
यह दिन है एक-दूसरे को याद दिलाने का कि आपका प्रेम बिना शर्त है, यह विश्वास दिलाने का कि हर स्थिति में आप उनके साथ है और यह भरोसा दिलाने का कि आपको उनमें पूरा विश्वास है। आपको नहीं लगता यह अहसास ही काफी है व्यक्ति के लिए वह सब कर गुजरने के लिए जो साधारण स्थितियों में उसके लिए सम्भव ही नहीं। इसीलिए इस दिन की महत्ता और बढ़ जाती है। यह दिन उन लोगों को स्वयं से परिचय कराने का है जिनसे आप प्रेम करते है। आप अपनी भावनाओं का इजहार कर अपने प्रिय की मुलाकात उसकी असाधारणता से करवाते है।
अनाश्रित प्रेम और अखंडित विश्वास से अधिक पवित्र इस दुनिया में और कुछ नहीं। परमात्मा के प्रति इसी प्रेम और विश्वास ने जूलिया के आँखों की रोशनी लौटा दी। यदि हम अपने जीवन में अपने प्रियजनों को इसी प्रेम और विश्वास के लिए प्रेरित कर सकें, तो यह दुनिया निश्चित ही स्वर्ग से बेहतर होगी।
(दैनिक नवज्योति में रविवार, 10 फरवरी को प्रकाशित) आपका राहुल .............
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Rahul Dhariwal
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वॉरेन बफ़ेट, दुनिया के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति, 2012 में 'टाइम' मैग्जीन द्वारा प्रमाणित दुनिया के सबसे प्रभावशाली व्यक्ति। जिनकी कुल सम्पत्ति 46 बिलियन डॉलर यानि करीब 2,53,000 करोड़ रुपये। जिन्होंने अपनी सम्पति का 99% भाग 'बिल एंड मेलिंदा फाउंडेशन' को दान कर दिया। जिन्होंने दुनिया के 20 सबसे अमीर व्यक्तियों को इकट्ठा कर यह समझाने की कोशिश की, कि उन्हें अपनी सम्पति का आधा हिस्सा परोपकार में लगा देना चाहिए। जो आज भी अपने उसी पुराने घर में रहते है जो उन्होंने आज से 50 साल पहले ख़रीदा था। अमेरिका के नेबरस्का के पास ओहामा में उनका तीन कमरों का निवास बिल्कुल सामान्य पड़ोस की तरह जान पड़ता है। इन सारी बातों में यही वो बात थी जिसने मेरे मन को आन्दोलित किया। उनके रहन-सहन के बारे में और जानकारी जुटाने की कोशिश की तो आश्चर्य हुआ कि न तो वे अपने साथ मोबाइल रखते है और न ही उनकी ऑफिस टेबल पर कोई कम्प्यूटर ही है।
वॉरेन बफेट मुझे जीता-जागता उदाहरण लगे जो धन का उपयोग कर रहे है धन उनका उपयोग नहीं कर रहा। चीजें हमारे जीवन को नहीं चलाए, जीवन को चलाने के लिए हम चीजों को उपयोग में लें। आजकल हमारी हालत तो ऐसी है कि किसी कारण से कुछ घंटों मोबाइल न बजे तो बेचैनी-सी होने लगती है। लगता है हमारी कहीं जरुरत ही नहीं या हमारे पास कोई काम ही नहीं। बच्चे कहीं ऐसी जगह चले जाएँ जहां टी.वी. नहीं हो तो उन्हें ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगती है और महिलाएँ यदि फैशन या चलन की जानकारी न रख पाएँ तो उन्हें लगता है, वे पिछड़ गयी है, कहीं उनका आकर्षण कम न हो जाएँ।
ये छोटी-छोटी बातें यहीं तक सीमित नहीं है, ये हमारी पूरी मनोदशा को रेखांकित करती है। आप कहेंगे, हमने मेहनत से पैसा कमाया है तो हमारा हक़ बनता है कि हम उसका भरपूर आनन्द लें। दूसरी तरफ, ये भी ठीक है कि कम और ज्यादा का कोई मापदण्ड नहीं होता जो आपके लिए कम है वही किसी के लिए बहुत ज्यादा है। अनावश्यक है, फिजूल है। आपकी दोनों बातें बिल्कुल ठीक है लेकिन जरुरत है इन दोनों को उधेड़ने की। पहली बात तो 'धन का आनंद', वो तब ही संभव है जब तक धन, आप जैसी जिन्दगी चाहते है उसे पाने में आपका सहयोग करें न कि उसकी मात्रा यह निश्चित करे कि आप कैसा जीवन जिएँगे। दूसरी बात, 'कम या ज्यादा', तो ये पैमाना सिर्फ आपका अपना होगा आप जिन और जितनी चीजों के साथ सहज है वही आपके लिए बिल्कुल ठीक है, उचित है, न कम न ज्यादा।
जीवन की आधारभूत जरूरतें हमारे कर्म की प्रेरणा हो सकती है लेकिन उसके बाद यह हमारी रचनात्मकता की अभिव्यक्ति ही है। हमारा पुरुषार्थ, हमारी उद्यमशीलता ही है। आप कितना कमाते है और आप कैसे रहते है, ये दोनों अलग-अलग बातें है। आपकी रचनात्मकता आपको अधिक से पुरुस्कृत करती है तो यह ख़ुशी और संतुष्टि का प्रसंग है। यह प्रकृति ओर से दी आपको दी गई शाबासी है, लेकिन यहाँ एक अहम् प्रश्न स्वतः पैदा होता है कि फिर व्यक्ति सहज जीवन से अतिरक्त धन का क्या करें? इसका उत्तर चाणक्य देते है। वे कहते है, धन की केवल तीन गतियाँ होती है; उपभोग, दान एवं विनाश। उचित उपभोग के बाद शेष बचे धन को दान, यानि परोपकार में लगाना ही श्रेष्ठ है वरन उसका विनाश निश्चित है। आप इस सृष्टि के ताने-बाने का एक तागा है, और वस्त्र की सुन्दरता भी आप ही की जिम्मेदारी है।
यही वॉरेन बफेट ने किया। जीवन के साथ अपनी सहजता को बनाए रखा वरना क्या जरुरत थी कि एक प्राइवेट विमान कम्पनी का मालिक, यात्री विमान के इकॉनोमी क्लास में सफ़र करें। आप भी उस बिन्दु को तलाशें जहां आपका रहन-सहन और सहज-जीवन आपस में मिलते हों। यहाँ जिन्दगी की डोर आपके हाथ में होगी और आपकी समृद्धि आपके जीवन में आनन्द की सहायक होगी।
( रविवार, 3फरवरी को नवज्योति में प्रकाशित) आपका राहुल ..........
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Monday, February 18, 2013
6:12:22 PM
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Rahul Dhariwal
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Thursday, February 14, 2013
6:06:59 PM
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Thursday, February 14, 2013
6:09:26 PM
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Yogeshwar Dubey
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Rahul Dhariwal
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" हम यहाँ दुनिया को बदलने नहीं, अपने-आपको अभिव्यक्त करने आए है। " -गोयथे
आज अपनी बात कहने के लिए मुझे एक पुरानी फिल्म का दृश्य याद आ रहा है जिसमें हीरोईन अच्छे-खासे रोमांटिक मूड में हीरो से पूछती है, 'तुम्हें मेरे चेहरे पर क्या दिखाई देता है।' हीरो तपाक से जवाब देता है, 'हीमोग्लोबिन की कमी।' हीरो डॉक्टर था। तकरीबन हम सब की दृष्टी ऐसी ही तो है। हीरो है हम और हीरोईन है हमारी जिन्दगी। हम जिन्दगी को इसी दृष्टी से देखते है कि इसमें क्या कमी है और मैं इसे कैसे ठीक कर दूँ? हमें लगता है, यही तो मेरा काम है। बस, एक बार जिन्दगी के हर पहलू को अपने हिसाब से ठीक कर लें, फिर आराम से जियेंगे। हम लगे रहते है पर, वो दिन कभी आता नहीं और ऐसा कभी होता नहीं। हम सब कहीं न कहीं यह जानते भी है, फिर ऐसा क्यूँ करते है?
प्राणी-मात्र की बड़ी जरुरत होती है औरों के द्वारा स्वीकार किया जाना और इसके लिए वह अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने की जुगत में लगा रहता है। हर संभव कोशिश में कि, उसके पास हर बात का जवाब है, अपने और अपनों पर आयी हर मुसीबत का हल उसके पास है और और अपने सामने आयी हर स्थिति को वह जीत सकता है। धीरे-धीरे जीतना और अपने आपको दूसरों से श्रेष्ठ सिद्ध करना हमारी लत पड़ जाती है। इसका प्रत्यक्ष छोटा-सा उदाहरण मोबाईल और कम्प्यूटर गेम्स है। बच्चों से लगाकर बड़ों तक इस लत के शिकार है। कारण है, ये दोनों ही 'मैं कर सकता हूँ' और 'जीतने' की भावना को पुष्ट करते है।
हमारी यही आदत हमें 'सब कुछ ठीक कर देने' के प्रयोजन में लगाए रखती है। ऑफिस हो या घर, दोनों ही जगह हमारा सुधार-आंदोलन चलता रहता है। सच तो यह है कि इससे संतुष्टि नहीं अहं की तुष्टि जरुर होती है।
हद तो तब हो जाती है जब हम रिश्तों को भी इसी तरह जीने लगते है। हम अपने रहने-जीने के तरीकों को ही सही मानते है और एक-दूसरे को वैसे ही रहने-जीने के लिए बाध्य करने लगते है। शायद इसीलिए हम सभी को एक ही शिकायत है कि हमें कोई समझता नहीं। हम भूल जाते है कि एक गुलदस्ते की सुन्दरता उसके अलग-अलग रंगों के फूल और पत्तियों के कारण ही है। मज़ा तो तब आयें, जब हम एक-दूसरे की मदद करने को तो तत्पर हों लेकिन अतिक्रमण कभी न करें।
हम सब यहाँ क्या करने आए थे और ये क्या करने लग गए? हमें अपना काम करना है, अपना किरदार निभाना है। यह जिन्दगी उस परमात्मा की है, पहली बात तो हमें वैसी ही मिली है जैसी हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ है, इसके बावजूद उसे ठीक करने की जरुरत है भी तो ये उसका काम है।
इस सबका मतलब आप यह मत निकाल लेना कि मैं व्यावहारिक जगत के दैनिक कार्यों या परिवार में एक-दूसरे की मदद से आँखें मूंद, आलसी और निर्मोही होने के लिए प्रेरित कर रहा हूँ। वे जरुरी भी है और हमारा कर्त्तव्य भी; बस आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि ये सब एक सार्थक और सुन्दर जीवन में सहायक हो सकते है लेकिन यह जीवन नहीं है। जीवन है अपनी अन्तरात्मा की सुनना और वो जो कहे उसमें अपने आपको पूरी शिद्दत से झोंक देना। चिंता मत कीजिए, आगे बढिए, यहाँ सब कुछ ठीक है।
( रविवार, 20 जनवरी को नवज्योति मैं प्रकाशित) आपका, राहुल.........
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Friday, February 08, 2013
6:34:19 PM
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Rahul Dhariwal
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Friday, February 08, 2013
8:06:45 AM
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Friday, February 08, 2013
8:11:02 AM
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From
Yogeshwar Dubey
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Rahul Dhariwal
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दशरथ मांजी का जन्म 1934 में एक गरीब मजदूर परिवार में हुआ था। यह बात है गया, बिहार के पास पहाड़ियों के बीच बसे गाँव गेलोर की। शादी के कुछ वर्षों बाद एक दिन उसकी पत्नी बीमार पड़ गयी। गाँव से अस्पताल की दूरी 70 कि.मी. थी क्योंकि पहाड़ियों से घूमकर जाना पड़ता था। समय पर अस्पताल नहीं पहुँच पाने के कारण वह अपनी पत्नी को नहीं बचा पाया। उसे बहुत बुरा लगा। उसे लगा कि काश! ये पहाड़ियाँ बीच में न होती तो मैं अपनी पत्नी को बचा लेता। क्या मालुम उसे क्या सूझी, उसने पहाड़ काटना शुरू किया ये बात है 1960 की। लगातार 22 वर्षों तक वो अपनी इस धुन में लगा रहा औए 1982 को अरती और वजीरगंज के बीच की दूरी 75 कि.मी. से घटकर 1 कि.मी. रह गयी। ये क्या था, खालिस जुनून।
यह घटना बताती है कि इन्सानी मंसूबों के सामने कुछ भी नामुमकिन नहीं बशर्ते हममें उन्हें पूरा करने का जुनून हो।
अन्तरात्मा की आवाज़ पर अखण्ड विश्वास हो, मन में दृढ़ संकल्प हो तो काम जुनून में तब्दील हो जाता है और फिर उसके नहीं हो पाने की कोई गुंजाइश नहीं बचती। संक्षेप में, पागलपन की हद तक चाहना ही जुनून है। जब आपका अपने ध्येय के प्रति प्रेम आपके जेहन से समय और भूख के भाव को मिटा दे। जब आपको कोई किन्तु-परन्तु सुनाई न दे। जब ऐसा हो जाए तो समझ लीजिए आपको धुन लग गयी, लगन लग गयी और लगन से तो मीरा को गिरधर नागर मिल गए तो बाकी क्या बचा? सच पूछिए तो, जुनून कोई गुण नहीं, जीने का एक तरीका है जहां कोई अफ़सोस नहीं, कोई चिन्ता नहीं, कोई डर नहीं, कोई प्रतिस्पर्धा नहीं; है तो सिर्फ सन्तोष और आनन्द।
आप कहेंगे, फिर तो अपराधी और आतंकवादी सबसे पहले जुनूनी हुए? अपराध और आतंकवाद के इस बुरे दौर में आपका ऐसा सोचना गलत भी नहीं। ये बात भी सही है कि वे जो कुछ भी कर रहे होते है उस पर उन्हें पूरा विश्वास होता है और खैर संकल्प तो उनका दृढ़ होता ही है लेकिन एक बात जो आप भूल रहे है, वह है 'अन्तरात्मा की आवाज़'। किसी को नुकसान पहुँचाना किसी के अन्तरात्मा की आवाज़ नहीं हो सकती। ये विचार अंतर्मन की नहीं बुद्धि की पैदावार होते है। व्यक्ति अपराधी या आतंकवादी बनता है ऐसी संगत के कारण जो उसकी बुद्धि को इतना विकृत कर देती है कि अंततः उसकी विकृत बुद्धि उसके अंतर्मन को हर लेती है। क्या करें इसका फैसला अंतर्मन करे और कैसे करें, ये बुद्धि बताए, ये ही उत्तम है।
शास्त्र भी कहते है प्रकृति त्रिगुणात्मक है यानि सृष्टि की रचना तीन गुणों के विभिन्न संयोगों से हुई है; सत, रज और तम। भौतिकी ने जिन्हें न्यूट्रोन, प्रोटोन और इलेक्ट्रान का नाम दिया है। जिस व्यक्ति के जीवन में सात्विक गुणों की प्रबलता होती है उसका जीवन साधुओं जैसा होता है, जिसमें तामसिक गुणों की प्रबलता होती है उसका जीवन निष्क्रिय यानी आलसी, व्यसनी या व्यभिचारियों जैसा होता है लेकिन जिसमें राजसिक गुणों की प्रबलता होती है उसका जीवन राजाओं जैसा होता है। 'राजा' शब्द ही एक छवि गढ़ता है, ऐसे व्यक्ति की जो अपने दिल की सुनने एवम पूरे विश्वास-संकल्प के साथ आगे बढ़ने के लिए मानसिक रूप से स्वतन्त्र हो। जो अपना जीवन पूरे जुनून के साथ जिएँ। एक गृहस्थ के लिए यही रास्ता उपयुक्त है। यदि आपको अपना राजसिक योग सफल करना है तो जुनून धारण करना होगा।
(रविवार, 13 जनवरी को नवज्योति में प्रकाशित) आपका, राहुल ..............
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Wednesday, January 23, 2013
9:53:03 PM
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Nani Manna
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Rahul Dhariwal
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हमने अपनी जिन्दगी को शिकायतों के पुलिंदे में तब्दील कर दिया है। हमें कोई चाहिए जिसे हम दोषी ठहरा सकें। जो कुछ हमारे जीवन में अच्छा हुआ वह हमारी मेहनत का फल था और बाकी के लिए कोई और जिम्मेदार था। 'अगर उसने ऐसा नहीं किया होता तो आज बात ही कुछ और होती'। 'मुझे उससे ऐसी उम्मीद नहीं थी'। 'उसे तो समझना चाहिए था'। हमारा मन नहीं हो गया 'शिकायत-पेटी' हो गई।
अरे! आप तो नाराज़ हो गए। नाराज़ मत होइए, मैं तहे-दिल से मानने को तैयार हूँ कि हमारी सारी शिकायतें जायज है और उन लोगों के प्रति हमारा गुस्सा भी वाजिब है लेकिन फिर एक बात समझ नहीं आती, अब जब ऐसे लोगों से हमने दूरी बना ली है तब भी वैसी ही घटनाओं की जीवन में पुनरावृति क्यों होती है? जिन्दगी वैसी ही रहती है, बस चेहरे बदल जाते है। एक बात और जो समझ नहीं आती वह यह कि ऐसा किसी एक-दो या कुछ के साथ नहीं बल्कि यह तो हम सब की व्यथा है। जीवन में सभी को कम अच्छे लोग मिलें हो, ऐसा कैसे हो सकता है? इन्हीं दो बातों ने यह सोचने पर मजबूर किया कि हो न हो हमारी शिकायतों की वजह कोई व्यक्ति या स्थिति नहीं, कोई और ही है?
उस 'और' को पकड़ने के लिए हमें बात के उस सिरे को पकड़ना होगा जहाँ से बात शुरू हुई थी। जीवन के अच्छे और कम अच्छे, दोनों तरह के अनुभवों की जिम्मेदारी हमें उठानी होगी। होता यह है कि हम कोई भी काम करते ही इस तरह है कि यदि उसके परिणाम हमारे मन मुताबिक़ न हों तो, हम किसी और को दोषी ठहरा सकें। ऐसा हम अनजाने करते है और ऐसा हमसे हमारा अहं करवाता है। वह सोचता है कि ऐसा कर वह हममें श्रेष्ठ और सही होने की भावना को बरकरार रख पाएगा लेकिन होता ठीक इसका उलटा है। हमारे मन पर शिकायतों और पछतावों का भार बढ़ता चला जाता है।
इस भार से मुक्ति सिर्फ अपने अनुभवों की जिम्मेदारी उठाकर ही संभव है और तब हमारे लिए उन्हें स्वीकारना चाहे वे कैसे भी हों, कहीं आसन होगा। हमारा यह अहसास कि हम अपने निर्णयों को बदल, अपने अनुभवों को बदल सकते है, उन्हें कहीं पैना बनाएगा।
कहीं आप इसका मतलब यह मत निकाल लेना कि जिन्दगी में हम अकेले है। ऐसा कतई नहीं है। एक-दूसरे की मदद करना जिन्दगी की प्रकृति है। सम्पूर्ण सृष्टि इसी तरह चलायमान है, अतः किसी की मदद लेना कमजोरी नहीं और न ही अपने अनुभवों के लिए जिम्मेदार होने से आशय। हाँ, यदि हम जो कुछ भी कर रहे है उसके हो पाने पर हमें पूरा विश्वास नहीं और हम किसी और को अपने प्रयोजन में इसलिए शामिल कर रहे है कि कोई और हमारे लिए लक्ष्य हासिल कर ले, तो यह संभव नहीं। हो सकता है इस तरह हमारे कुछ काम बन जाएँ लेकिन अधिकांशतः ये शिकायतों में ही तब्दील होंगे। एक पुरानी कहावत है, ' मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता'। जिसे स्वर्ग की चाह हो, मरना उसे ही पड़ता है। यदि किसी की मदद लेनी भी पड़े तो यह उस काम का हिस्सा है, आप उस व्यक्ति के प्रति एहसानमंद हो सकते है लेकिन परिणामों के लिए उसे दोषी नहीं ठहरा सकते।
अपने अनुभवों की जिम्मेदारी उठाइए, शिकायतें तो दूर होंगी ही, आत्मविश्वास की अतिरिक्त भेंट मुफ्त मिलेगी। आपके जीवन पर आपका नियंत्रण होगा और जीवन कहीं खुशहाल और हल्का होगा।
( जैसा कि नवज्योति में रविवार, 6 जनवरी को प्रकाशित ) आपका, राहुल ............
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Posted on
Tuesday, January 22, 2013
6:51:26 PM
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Rahul Dhariwal
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Posted on
Friday, January 18, 2013
12:42:34 PM
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Nani Manna
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From
Rahul Dhariwal
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हम सब पुराने मित्र बहुत सालों बाद एक शादी में मिले। हम अपनी यादों को ताज़ा भी कर रहे थे और सभी आश्चर्यमिश्रित ख़ुशी से भरे हुए भी थे, ये देखकर कि हम सब अपनी-अपनी जिन्दगी में कहाँ-कहाँ पहुँच गए। हमारा एक मित्र हम सभी को लुभा रहा था, ऐसा लगता था कि वो बिल्कुल नहीं बदला। उसके बात करने का अंदाज़, उसकी भाव-भंगिमाएँ, सभी कुछ कॉलेज के दिनों की याद दिला रही थी लेकिन थोड़ी ही देर बाद उसकी बातों से सभी को उकताहट होने लगी। खुद ही को अच्छा नहीं लग रहा था कि मुझे ऐसा क्यों हो रहा है? आखिरकार दो दिनों बाद हम अपनी-अपनी जगहों को लौट गए। मैं भी लौट आया लेकिन मन में एक दुःख भरा सवाल लिए।
सवाल होता है तो उसका जवाब भी होता है बस उसे ढूँढना पड़ता है और जो मुझे मिला वह यह था कि मेरे उस दोस्त की बातों का मर्म भी वही था। शायद हम सब को ऐसा लग रहा था जैसे हम कॉलेज के ही किसी लड़के से बात कर रहे है। जैसे उसने अपनी मानसिकता को रोक लिया था, बाँध लिया था। जैसे उसने अपनी उन दिनों की सोच को ही अपना परिचय बना लिया था। इन सारे विचारों से यह सूत्र निकला कि जिस तरह कमरे की घुटन मिटानी हो तो कमरे की खिड़कियाँ खोलनी पड़ेंगी, उसी तरह खिले हुए व्यक्तित्व के लिए अपने दिल और दिमाग के दरवाजे खुले रखने होंगे।
आपको याद है दूसरी कक्षा में जब हमने पहली बार जोड़ लगाना सीखा था तब हम कैसे लगाते थे? जिसको जिससे जोड़ना होता, उतनी ही लाइनें बनाते और फिर उन्हें गिनते। वो सीखने का तरीका था जो हमारी उम्र के लिहाज से बिल्कुल ठीक भी था। धीरे-धीरे हमने अभ्यास किया फिर 'हासिल' लिखने लगे और फिर सीधे ही जोड़ने लगे। व्यक्ति को हर क्षण अपने आपको मांजने की कोशिश करनी चाहिए। जो कल का सच था वो आज का सच नहीं हो सकता। कोई भी साधन साध्य तक पहुँचने का जरिया भर होता है। पहली पायदान चाहे कितनी भी सुंदर हो उसकी उपयोगिता दूसरी पायदान पर पहुँचने तक ही सीमित होती है।
जिन्दगी से अच्छी कोई पाठशाला नहीं बशर्ते हम कक्षा में उपस्थित रहें। व्यक्तित्व निर्माण की पहली सीढ़ी है कि हम जिन्दगी के अनुभवों का प्रेक्षण करें, सोचें और चिंतन-मनन करें। ऐसा कर हम उन अनुभवों में छिपी सीख को जाने और आगे बढ़ जाएँ। नए विचारों को प्रवेश की अनुमति दें, उन्हें जानें और अपने परिप्रेक्ष्य में देखें-समझें फिर यदि ठीक लगे तो उन्हें आत्मसात करें; यही है अपने दिल और दिमाग के दरवाज़ों को खुला रखना।
इस सारे सन्दर्भ में मुझे महात्मा बुद्ध का वो सावधान करने वाला कथन याद आता है, "यदि कोई विचार सावधानीपूर्वक अन्वेषण के बाद उपयोगी लगता है और उसमें सभी का भला निहित है तब ही उसे स्वीकारें एवम अपनाएँ।" कोई भी विचार नया है सिर्फ इससे वह अपनाने लायक नहीं हो जाता। यदि वो जीवन के कारणों को संतुष्ट करता है याने उपयोगी है और जिसको अपनाने से कोई आहत न हो उसे ही थामे अन्यथा जैसे वह आया था वैसे ही उसे जाने दें।
नए वर्ष की शुभ वेला पर मैं कामना करता हूँ कि नए विचारों के झोंके हमारे आत्मिक जगत को समृद्ध करें और हमारे जीवन हमेशा ताज़ा-तरीन और महकता रहे।
( रविवार, 30 दिसम्बर को नवज्योति में प्रकाशित ) आपका, राहुल .........
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Rahul Dhariwal
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हम सब अपने-अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ एवम सफल होना चाहते हैं और क्यों न हो यही तो जीवन-पुरुषार्थ है। जीने का यही वो ज़ज्बा है जो आत्म-संतुष्टि भी देता है तो जीने को आसान भी बनाता है। यों कहने को हम सब अपने-अपने कामों में इतने व्यस्त है की हमें साँस तक लेने की फुर्सत नहीं, बावजूद इसके न तो हमारा काम हमारी सफलता की कहानी कहता है और न उसमें श्रेष्ठ होने की ललक दिखाई पड़ती है। येन-केन-प्रकारेण भौतिक सुविधाओं का संग्रह सफलता होती तो फिर सहज सरल जीवन और आत्म-संतुष्टि हमारी जिन्दगी से ऐसे गायब न होते जैसे गधे के सिर से सींग।
जीवन की इस क्लिष्टता और मन के इस खालीपन की वजह जो मुझे नज़र आती है वह यह कि हमें अपने सफल होने की उतावली तो बहुत है पर उसकी तैयारी को हम तैयार नहीं। इसके लिए जिम्मेदार एक तरफ तो अहंकार का आवरण लिए हमारी अकर्मण्यता है तो दूसरी ओर अवचेतन में गहरी पैठी हुई मान्यताएँ और आखिर में काम को करने के तरीकों के प्रति हमारा नजरिया।
कोई भी बदलाव तकलीफदेह प्रक्रिया से गुजरे बिना सम्भव नहीं चाहे वह व्यक्ति का हो या स्थिति का। हम अपने सुरक्षा घेरे से बाहर निकल रास्ते की अडचनों से दो-दो हाथ करने से कतराते है और हमारा अहम् इसके लिए इन जुल्मों का सहारा लेता है जैसे, 'मुझे सब मालूम है', 'तक़दीर ही साथ नहीं देती' आदि-आदि। हमें इस छलावे से छुटकारा पाकर यह समझना होगा कि यदि काम हमारे मन का है तो छोटी-छोटी असफलताएँ ये नहीं बताती कि वो काम हम कर सकते है या नहीं या हमारे तक़दीर में है या नहीं बल्कि सिर्फ हमें चेताती है कि अभी हमें और तैयारी की जरुरत है। वास्तव में ये असफलताएँ नहीं रास्ते की अडचनें है जो हमें जीवन के वे पाठ पढ़ने आती है जिसके बिना सफल हो पाना मुमकिन नहीं।
सफल होने की राह का इससे भी बड़ा रोड़ा हमारी वो मान्यता है जो कहती है कि समय से पहले कुछ नहीं मिलता चाहे हम कुछ भी कर लें। इसकी तह तक जाने के लिए मैं आपके साथ एक छोटी सी घटना साझा करना चाहता हूँ। एक राहगीर एक गाँव गुजर रहा था। उसने गाँव ही के एक आदमी से पूछा कि उसे पास के गाँव तक पहुँचने में कितना समय लगेगा। वह कुछ न बोला। उसने वापस पूछा, तब भी वही बात। ऐसा दो-तीन बार हुआ। आखिर झुंझला वह अपनी राह हो लिया। मुश्किल से दस कदम चला होगा कि पीछे से आवाज़ आई, 'दो घंटे लगेंगे'। राहगीर उस ग्रामीण के पास वापस आकर पूछा,'मैं तुम्हें इतनी देर से यही बात पूछ रहा था, तब तो तुमने कोई जवाब नहीं दिया, अब क्यों बता रहे हो?' ग्रामीण बोला, 'जब तक मैं तुम्हारी चाल नहीं देख लेता, कैसे बताता कि कितना लगेगा।' यदि उस राहगीर को जल्दी पहुँचना है तो अपनी बढानी होगी। यदि समय की गणना हम दिन-महिनों-वर्षों से नहीं बल्कि तैयारी से करें तो यह बात सोलह आने सच है कि समय से पहले कुछ नहीं मिलता। अपनी तैयारियों को दुरुस्त कीजिए, समय आपकी मुट्ठी में होगा।
हमारी उतावली तब भी झलकती है जब हम कह होते है कि 'किसी भी तरह मुझे वह करना है'। कोई भी काम कभी किसी तरह नहीं होता सिर्फ और सिर्फ एक तरह से ही हो सकता है। किसी भी काम को गलत करने के हज़ार तरीके हो सकते है, सही करने का सिर्फ एक तरीका होता है। सही तरीका हमेशा लम्बा, मेहनत भरा और थकाऊ होता है पर इस कीमत को चुकाए बिना श्रेष्ठ एवम सफल हो पाना संभव नहीं।
अपने-अपने क्षेत्रों में श्रेष्ठ होने की ललक ही आपको सच्चे अर्थों में सफल बनाएगी क्योंकि ये सफलता, सहज-सरल जीवन और आत्म-संतुष्टि के साथ आएगी। यदि सफलता को जिन्दगी का स्थायी रस बनाना है तो उतावली नहीं तैयारी करें।
(रविवार, 23 दिसम्बर को दैनिक नवज्योति में प्रकाशित) आपका राहुल ..........
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Rahul Dhariwal
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" जो रुकना जानता है वही खतरों से बचता हुआ लम्बा चल पाता है। " -- लाओत्से ( ताओ ते चिंग - सूत्र 44 से )
चढना,उठाना, बढ़ना इंसान की प्रकृति है, यही सिखाया भी जाता है और ठीक भी माना जाता है लेकिन उतरना चूँकि उसकी प्रकृति के विरुद्ध है और लोक-जीवन में इसे असफलता का पर्याय समझा जाता है इसलिए न तो व्यक्ति सीखना चाहता है और न ही इसे ठीक माना जाता है, लेकिन क्या ये सचमुच इतना गैर-जरुरी है? हम अपने चारों ओर नज़र घूमाकर देखें तो ऐसे कई महान खिलाडी, अभिनेता, राजनीतिज्ञ वगैरह मिल जायेंगे जिन्हें रुकना नहीं आया और उनकी विदाई उतने सम्मानजनक ढंग से नहीं हो पाई जिसके वे सचमुच हकदार थे। यहाँ तक कि उनका अपने आपको थोपना उनकी उपलब्धियों को कम कर गया।
एक पर्वतारोही की सफलता पर्वत के शिखर तक पहुँचने में होती है लेकिन क्या तब वो सिर्फ पहाड़ पर चढ़ना ही सीखें। कल्पना कीजिए उसने ऐसा ही किया तो क्या होगा? वह चोटी पर पहुँच तो पाएगा लेकिन वहीँ रह जाएगा, जिन्दगी से बहुत दूर। हकीकत तो यह है कि एक पर्वतारोही को चढ़ने की बजाए उतरने की ज्यादा तैयारी करनी होती है क्यांकि उतरना ज्यादा जोखिम भरा होता है। एक तो चढने की थकान दूसरी लक्ष्य-हीनता और ऊपर से फिसलने का डर।
मेरी ही एक कमजोरी ने इस सच से मेरा वास्ता करवाया; सभी कहते थे कि मैं अच्छा बोलता हूँ लेकिन मुझे दुःख होता था कि फिर मेरी बात उतनी प्रभावी क्यों नहीं होती? धीरे-धीरे समझ आया कि मुझे सही समय पर अपनी बात ख़त्म करना नहीं आता था। आज भी श्रम जारी है। अब लगता है यह बात तो जीवन के हर पहलू पर जस की तस लागू होती है चाहे वह हमारी सफलता-समृद्धि जैसी महत्वपूर्ण बातें हो या फिर रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें जैसे 'पसंद का खाना हो तो भी कितना खाएँ' या 'कितने घंटे काम करें' या फिर 'घूमने ही कितने दिनों के लिए जाएँ' वगैरह-वगैरह। किसी भी चीज का आनन्द भी तभी आता है जब हमें सही समय पर रुकना आता हो।
अब सफलता को ही ले लीजिए। कौन नहीं चाहता कि उसकी सफलता का ग्राफ ऊपर उठता ही चला जाए लेकिन क्या कभी ऐसा हुआ है? हर व्यक्ति का एक दौर और हर विचार का एक समय होता है उसके बाद उसकी जगह नए व्यक्ति और नए विचार लेते है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि वह व्यक्ति चूक गया है। यह तो प्रकृति का आधारभूत नियम है इसलिए वह किसी भी तरह अपने आपको दोषी ठहराए या मन में हताशा का कोई भाव लाए इसका तो कोई कारण ही नहीं बनता। उल्टा वे व्यक्ति जो अपनी असफलता के दौर में ही इस बात को समझ लेते है और अपने थमने की तैयारी रखते है वे ही लम्बे समय तक याद रखे जाते है। अच्छा रहता है, हम जाएँ तो कोई हमें रोके, हमारे जाने के बाद हमारी कमी महसूस करे बनिस्पत इसके कि कोई ये सोचे कि हम जाते क्यूँ नहीं?
इससे दीगर सबसे अहम् बात यह है कि आप सफल ही होते चले गए तो सफलता का आनन्द कब लेंगे। यह तो ठीक वैसी बात है कि स्वादिष्ट खाने को इतने जतन से बनाया कि जब खाने की बारी आई तब थक कर नींद आ गई।
अपनी प्रकृति और अहं के विरुद्ध इस गुण को अपनाने की शुरुआत हम रोजमर्रा की छोटी-छोटी कोशिशों जैसे कितना खाएँ, बोलें या काम करें, से कर सकते है। इस तरह सही समय और सही जगह पर रुक पाना हमारे स्वाभाव में शामिल हो जाएगा और हम सफलता और समृद्धि जैसे जीवन के महत्वपूर्ण एवम नाजुक विषयों को भी कुशलता से संभल पाएँगे। ये उस बड़े खजाने की छोटी सी चाबी है जिसमें प्रभावशाली और आनन्दमय जीवन का राज छुपा है।
( रविवार, 16 दिसम्बर को नवज्योति में प्रकाशित ) आपका राहुल ..........
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Rahul Dhariwal
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आज इस समय जब देश में सबसे अहम् मुददा भ्रष्टाचार बना हुआ है तब सबसे ज्यादा दुविधा में है तो वह है आम-आदमी। उसकी स्थिति बिल्कुल 'एक तरफ कुआँ और एक तरफ खाई' जैसी है। यहाँ तक कि वो ईमानदारी की परिभाषा को लेकर भी भ्रमित है। यह भी सच है कि भ्रष्ट कोई होना और कहलाना नहीं चाहता क्योंकि भ्रष्ट कोई पैदा नहीं होता। हमारी ही व्यवस्था के कुछ नियम-कानून इतने अव्यावहारिक और कुछ इतने अप्रासंगिक हो चले है कि उन्हें निभाते हुए एक आम-आदमी के लिए अपनी जिन्दगी की गाड़ी ढंग से चला पाना लोहे के चने चबाने से कम नहीं, खासतौर से वे नियम-कानून जो उसके जीविकोपार्जन से जुड़े है।
यही उसकी दुविधा है कि यदि वह नियमों की व्यावहारिक अवहेलना करता है तो भी वह बेईमानों की उस श्रेणी में शामिल हो जाता है जो अपने पद और अधिकारों का नाजायज फायदा उठा देश और समाज को खोखला कर रहे है तो उसके लिए अपने पारिवारिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों को सम्मानपूर्वक निभा पाना संभव नहीं। अब हर किसी व्यक्ति का जिन्दगी के प्रति नजरिया एक समाज-सुधारक का हो यह न तो संभव है और न ही उचित, और फिर यह व्यक्ति का मौलिक अधिकार है कि वह स्वयं चुने कि वह अपनी जिन्दगी कैसे जिएगा?
सबसे पहले तो यह विचार करना होगा कि नियम-कानून बनाए ही क्यूँ जाते है? नियम-कानून देश और समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना और रक्षा के लिए बनाए जाते है ठीक उसी तरह जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों में अच्छे संस्कारों के लिए घर में अनुशासन का वातावरण बनाते है। साफ़ जाहिर है कि नियम परक होने से ज्यादा अहम् है नीति-संगत होना। नीति-संगत वही है जिसके कर्म उसके प्राकृतिक गुणों यानी दया, प्रेम, करुणा और समानता के रंगों में रंगे हो या सीधे-सच्चे शब्दों में जो किसी का बुरा न चाहे। व्यक्ति कुछ भी करे तो उसे अपने हित के साथ यह भी ध्यान रहे कि इसमें किसी और का अहित तो नहीं। इस तरह नियमों को नैतिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में समझते हुए हमें ईमानदारी की नई परिभाषा गढ़नी होगी। अपने जीवन में मूल्यों को नियमों के ऊपर रखना होगा। ईमानदार व्यक्ति वह है जिसका आचरण नीति-संगत है चाहे पूरी तरह नियम-परक न हो।
मैं अपने इस दृष्टिकोण के पक्ष में आपसे इतना पूछना चाहता हूँ की क्या नमक कानून तोड़ने वाले गाँधी से, गुलामी प्रथा का विरोध करने वाले अब्राहम लिंकन से और म्यांमार की सरकार को सरकार ही न मानने वाली आन सानं सू की से सद्चरित्र और ईमानदार भला कोई हो सकता है? लेकिन यह भी सच है कि हर व्यक्ति के लिए व्यवस्था के विरोध में खड़े हो पाना सम्भव नहीं इसलिए आपको एक बात विशेष रूप ध्यान रखनी होगी कि आप अपनी मान्यताओं का अनावश्यक प्रचार न करें। ऐसी मान्यताएँ जो नीति-संगत तो है लेकिन पूरी तरह नियम-परक नहीं वरना आप अपने और अपने परिवार के लिए मुसीबतें खड़ी कर लेंगे और आपका जीना दूभर हो जाएगा।
आपका जीवन मूल्यों पर आधारित हों और कर्म प्राकृतिक गुणों से रंगे। यदि आपका आचरण नीति-संगत है चाहे पूरी तरह नियम-परक नहीं तो भी आप शत-प्रतिशत ईमानदार है। कोई कारण नहीं बनता कि आप अपने मन में किसी तरह का ग्लानि-भाव रखें। ऐसा जीवन जी कर आप महापुरुषों के बताए रास्ते पर ही चल रहे होंगे।
( जैसा कि रविवार, 9 दिसम्बर को नवज्योति में प्रकाशित ) आपका राहुल ........
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Rahul Dhariwal
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.......... और कसाब को फाँसी हो गई। पहली बार किसी के मरने पर अच्छा रहा था। हर चेहरे पर एक मुस्कान तैर रही थी कुछ लोगों ने तो पटाखे छोड़े और एक-दूसरे को मिठाइयाँ खिलाई। मुझे भी पक्का विश्वास था कि मेरा खुश होना जायज है लेकिन इस घटना ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर कसाब की फाँसी ने एक आम आदमी को ऐसा क्या लौटा दिया कि पूरा देश एकजुट होकर उसके फाँसी चढ़ जाने का जश्न मना रहा था?
हम आज तक स्वयं के ईश्वर की अभिव्यक्ति, क्षमा के सबसे सुन्दरतम भाव, चेतना के भिन्न स्तरों की बात करते आये है फिर उसका गुनाह अक्षम्य क्यूँ था? क्या उसका गुनाह केवल बेगुनाहों की मौत था या उससे बढ़कर और कुछ था? सवाल है तो जवाब भी होगा और आखिरकार अन्तस में बैठा मिल ही गया और वह है ; आत्म - सम्मान। वह हमला किसी व्यक्ति पर नहीं देश के प्रत्येक व्यक्ति के आत्म-सम्मान पर था। उसने देश के हर नागरिक को लज्जित किया था कि कोई भी ऐरा - गैरा नत्थू - खैरा आएगा और जो चाहेगा करके चला जाएगा। कसाब की फाँसी ने हमारे आत्म - सम्मान को लौटाया।
आइए, थोडा पीछे लौटते है; कृष्ण जब धृतराष्ट्र के पास पाण्डवों के लिए 'पांच गाँव' का संधि-प्रस्ताव लेकर गए और कौरवों ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया था तब क्या उन राजाओं की कमी होगी जो पांच गाँवों के बदले पाण्डवों की मित्रता और कृष्ण का सामीप्य पा लेते? क्या महाभारत पांच गाँवों को हासिल करने के लिए हुआ था? नहीं, कृष्ण के प्रस्ताव को ठुकराना पाण्डवों के आत्म-सम्मान को नकारना था और यही महाभारत की वजह थी। श्री कृष्ण ने हमें बताया कि आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए युद्ध ही अंतिम विकल्प हो तो उसे अपनाने में भी गुरेज नहीं होना चाहिए।
व्यक्ति के आत्म-सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं। इतना अहम् की इसके लिए क्षमा, समानता और जीने के अधिकार जैसे आध्यात्मिक गुणों की अवहेलना भी जायज है। ऐसा इसलिए क्योंकि इस परम सत्य के बावजूद कि हम सब परमात्मा की स्वतंत्र अभिव्यक्ति है यानि हम सब में उस एक ही परमात्मा का अंश है, हम अभिव्यक्ति और अनुभूति के स्तर पर स्वतंत्र एवं भिन्न है और इसलिए हमारा पहला धर्म है अपने स्वयं के सम्मान की रक्षा कर उस परमात्मा का सम्मान करना जिसका हमारे भीतर मौजूद अंश हमारे जीवित होने की वजह है।
यदि हम भी अपने जीवन में किसी के आदर में स्वयं की अवहेलना करते है तो समझ लीजिये हमने आदर को सही अर्थों में समझा ही नहीं। आप ही सोचिये, जिनका हम आदर करते है क्या वे खुश होंगे जब उन्हें पता चलेगा कि हम वह सब कुछ अपना मन मारकर कर रहे है? ऐसा कर हम उलटा उनका दिल ही दुखाएँगे। ऐसे लोग जो चाहते है कि आप अपनी अवहेलना करके भी उनका आदर करें, सच मानिए वे आपसे प्रेम ही नहीं करते। वे या तो आपको अपनी अहं तुष्टि का या अपना काम निकालने का जरिया भर समझते है। ऐसे लोगों को अपनी से खदेड़ निकालना अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करना ही होगा। विश्वास मानिए, जो व्यक्ति आत्म-सम्मान से जीते है वे ही किसी का सच्चा सम्मान कर सकते है और एवज में सच्चा सम्मान पा सकते है।
(रविवार, 2 दिसंबर को नवज्योति में प्रकाशित) आपका राहुल........
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Rahul Dhariwal
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जिन्दगी है, परिवार है तो आवश्यकताएँ भी है और आवश्यकताएँ है तो उन्हें पूरा करने के लिए धन की जरुरत है और उसके लिए किसी ऐसे काम में होना जरुरी है जो हमें जरुरत का धन दिला सके इसलिए हम अपने जीवन में कौन सा काम करें इसका पैमाना उससे मिलने वाला धन होता है। ठीक लगता है लेकिन ये तर्क क्या सचमुच उतना ठीक है जितना लगता है? ठीक लगता है लेकिन ये तर्क क्या सचमुच उतना ठीक है जितना लगता है? दिल की सुनें, अपने सपनों को जिएँ .............ये सब क्या कहने-सुनने की बातें है?
इस कड़ी को थोडा आगे बढ़ाते है। कौन-सा काम हमें कितना धन दिलाएगा ये हम कैसे तय करते है? निश्चित रूप से, औरों को देखकर। फलाँ व्यक्ति ने फलाँ काम कर कितना पैसा कमाया। मुझे लगता है बाकी बातें तो अपनी जगह ठीक है पर बस इस आखिरी पायदान पर आकर हमसे गलती हो जाती है। आपकी समृद्धि सिर्फ और सिर्फ उसी काम से संभव है जो आपके लिए बना है। हो सकता है जिस व्यक्ति की सफलता और समृद्धि को देखकर आप काम चुन रहे हों वो उसके लिए बना हो, आपके लिए नहीं। निस्संदेह आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन की अनिवार्यता को नकारा नहीं जा सकता लेकिन इससे अधिक की तृष्णा वह भी यह सोचकर कि यह जीवन मैं खुशियाँ लाएगा, बिल्कुल बेतुकी है। खुश रहना व्यक्ति का आत्मिक भाव है इसका धन या किसी और बाहरी परिस्थिति से कोई लेना-देना नहीं। तो धूम-फिरकर प्रश्न फिर वहीँ आकर ठहर गया कि हम कौन सा काम चुनें?
खलील जिब्रान कहते है, " बाँसुरी बन कर काम करें जिसके हृदय से घंटों फूँकने का जतन संगीत बनकर निकलता है। जिन्दगी का गूढ़ रहस्य है उसे मेहनत के जरिए प्यार करना। आपका काम आपके आत्मिक प्रेम का इजहार हो, यही संतुष्टि देगा।"
आप अपने जीवन में वो काम करें जिसकी आप बाँसुरी है और फिर एक दिन आपका काम स्वयं संगीत की तरह बोलने लगेगा। हर व्यक्ति हर काम की बाँसुरी नहीं होता। आप उस काम को चुनें जो आपको बजाकर उसमें से संगीत निकाल दें। जिसे आप रियाज की तरह कर सकें, जहाँ न समय का भान हो न भूख का और न ही परिणामों की कोई चिंता, बस इच्छा हो तो सिर्फ मीठी तान की। यही जीवन में खुशियाँ लाएगा, यही संतुष्टि देगा। दूसरी ओर, यदि भीतर झाँकें यानी आत्म का अध्ययन करें यानी अध्यात्म की नज़र से देखें तो पाएँगे कि व्यक्ति का सार-तत्त्व, उसकी मूल-प्रकृति है -- विशुद्ध प्रेम। कोई भी व्यक्ति या तो प्रेममय है और यदि किसी और स्थिति में है तो चाह प्रेम की ही है और यही सबूत है 'विशुद्ध प्रेम' के प्रकृति होने का अतः स्वाभाविक और आवश्यक है कि हमारा काम हमारे प्रेम का इजहार हो। जब ऐसा होगा तब हम अपने काम में सिर्फ सर्वश्रेष्ठ होंगे।
व्यक्ति के साथ उसके काम का जन्म होता है इसलिए आपकी जिन्दगी की आवश्यकताएँ उतनी ही होती है जो उस काम से पूरी हो सकें या यों कह लें कि आपके काम में हमेशा ही उतनी क्षमता होती है कि वो उन्हें पूरा कर सकें। हाँ इतना जरुर है, व्यक्ति को ये स्वयं ही ढूँढना होता है कि वो किस तरह अपने पसंद के काम को अपने जीविकोपार्जन का साधन बना सकता है और यही व्यक्ति का सच्चा पुरुषार्थ है। आपकी बाँसुरी को सुनने वाले आप ही को ढूँढने होंगे।
(जैसा कि रविवार, 25 नवम्बर को नवज्योति में प्रकाशित) आपका, राहुल........
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Rahul Dhariwal
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' जब मृत्यु आये तो आप चिरनिंद्रा के लिए जमीन की बजाय लोगों के दिलों में जगह की चाह रखें।' -- रूमी
दिवाली अभी तक ज़ेहन से गयी नहीं और जो बात रह-रहकर मन में उठ रही है वह है रावण की अमर होने की इच्छा। बात उठी तो उसने सोचने पर मजबूर किया कि क्या अमर होने की इच्छा गलत थी? गलत तो नहीं हो सकती क्योंकि हम सब भी तो कहीं न कहीं चाहते है कि अपने जाने के बाद याद रखे जाएँ और फिर हम सबके जीवन में ऐसे लोग रहे है जिनकी याद आज भी मुश्किल घड़ियों में हमें सम्बल देती है और उनका जीवन प्रेरणा। हमारी ऐसी चाह बिल्कुल निर्दोष है लेकिन रावण ने अमरता को जिन मायनों में समझा और फिर उसके लिए जो रास्ता अपनाया शायद वही गलत था जो अन्ततः उसके सर्वनाश का कारण बना।
रावण अपने शारीर के जरिए अमर होना चाहता था जो संभव ही नहीं। आप अमर हो सकते है किसी की यादों में और किसी को याद आएँगे उसके दिल में जगह बनाकर। आप ऐसा कुछ करें कि आपके जाने के बाद कोई आपके बारे में सोचे और एक विचार बनकर आप उसके जेहन में उपस्थित रहें। किसी के दिल में उतरना है तो सबसे पहले रावण की तरह बनाई अपनी झूठी छवि से मुक्ति पा अपनी मूल प्रकृति को जीना होगा। हम सब अलग-अलग तरह से अपनी एक छवि गढ़ लेते है। कोई अपनी सफलताओं को, कोई अपनी शारीरिक सुन्दरता को तो कोई अपने अर्जित ज्ञान को अपना परिचय बना लेता है। इस परिचय के अनुरूप ही हम व्यवहार करने लगते है; यह भूलकर कि हमारी प्रकृति है विशुद्ध प्रेम और हमारे व्यवहार सिर्फ प्रेम की उपज होने चाहिए। हम जब भी किसी से मिलें परिचय के इस बोझ को उतारकर पूरी आत्मीयता से मिलें। कोई आप से कुछ कह रहा है तो उसे अपना सम्पूर्ण अखंडित ध्यान दें। आप कुछ कहें तो वह खानापूर्ति के लिए नहीं हो बल्कि आप उसमें पूरा विश्वास रखते हों। दुनिया में किसी को भी दी जा सकने वाली इससे कीमती भेंट और कोई हो नहीं सकती।
इस तरह आप लोगों के दिलों में उतर तो गए लेकिन वहाँ अपना पक्का ठौर बनाना है तो कुछ ऐसा कर गुजरना होगा कि उनके जीवन की कुछ खुशियों के कारण आप हों। निस्संदेह व्यावहारिक जीवन की अपनी मजबूरियाँ होती है अतः आपके काम सबसे पहले आपकी जरूरतें और जिम्मेदारियाँ पूरी करें लेकिन उसके एक छोटे से हिस्से का मेहनताना सिर्फ दूसरों की खुशियाँ हो। गीता में इसे लोक-संग्रह के कार्य कहा गया है। ऐसे काम जो दुनिया के पहिए को घुमाने के लिए जरुरी हों। आप भी अपना अंशदान दीजिए। आप जिस भी क्षेत्र में है उसी में रहकर ऐसा कर सकते है, अलग से कुछ भी करने की जरुरत नहीं।
दूसरों की खुशियों के लिए किया छोटा-सा काम भी आपको इतनी आत्म-संतुष्टि देगा कि तब आप महसूस करेंगे कि इसे तो और किसी विधि से हासिल किया ही नहीं जा सकता। अपनी अभिव्यक्ति का आधार अपनी प्रकृति को बनाइए, प्रेम के केनवास पर जिन्दगी के चित्र उकेरिए। जब ऐसा होगा तो दूसरों के चेहरे की उदासी आपके मन को विचलित करने लगेगी और जिस दिन से ऐसा होने लगे समझ लीजिएगा आपने अमरता का रास्ता ढूंढ़ लिया। आपसे बात करते हुए मेरा मन फिल्म 'अनाडी' का वो सुंदर गीत गुनगुनाने लगा है ......
किसी की मुस्कराहटों पे हो निसार किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार जीना इसी का नाम है ................
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Rahul Dhariwal
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इन दिनों हम भारत-वर्ष के सबसे बड़े धार्मिक-उत्सव मनाने में डूबे है। दिवाली पर ढेरों शुभकामनाएँ देते हुए मन कर रहा है कि आज हम तलाशे कि आखिर हम उत्सव मनाते ही क्यूँ है? क्या महज श्रद्धा ही इन परम्पराओं का कारण है या कुछ और भी? और यदि है तो वे किस तरह हमारे जीवन को प्रभावित करती है?
उत्सव चाहे कोई हो उन दिनों एक खास माहौल बनने लगता है जैसे इन दिनों रामायण पर आधारित कई धारावाहिक आ रहे है तो ख़बरों में जगह-जगह होने वाली विशेष रामलीलाओं की चर्चा है, शहर में जगह-जगह रावण के पुतले बनते नज़र आ रहे थे तो घरों में सफ़ाईयाँ चल रही थी। इस खास माहौल की बदौलत हमारे अवचेतन में कहीं न कहीं श्री राम और उनका जीवन रहने लगता है। पिता की आज्ञा-पालन कर राम का राज-पाट छोड़ना, सीता-लक्ष्मण का साथ वनवास जाना, भारत का खडाऊ रख शासन चलाना................. राम की रावण पर विजय। ये सारी घटनाएँ उन मूल्यों की याद दिलाती है जिन्हें अपने जीवन का आधार बना एक राजा ईश्वर बन गया। ये हमें भरोसा दिलाती है कि आखिर विजय उसी की होती है जो सत्य की राह पर चलता है और इस तरह आम जन-जीवन में मूल्यों की पुर्नस्थापना करना किसी भी उत्सव को मनाने की सबसे अहम् वजह होती है।
एक और खास वजह, उत्सव हमें अवकाश देते है अपनी रोजमर्रा की जिन्दगी से। लियानार्डो डी विन्ची लिखते है, 'अवकाश आपके निर्णयों को पक्का और पैना बनाते है।' सच ही तो है, रोजमर्रा की जिन्दगी ने हमें घड़ी से बाँध दिया है। अपने काम को सही समय पर करने के लिए हम समय-प्रबंधन करते है लेकिन धीरे-धीरे काम और उसकी गुणवत्ता कहीं पीछे छूट जाती है वैसे ही जैसे निश्चित समय पर भोजन करने की प्रतिबद्धता के चलते भूख का अहसास द्वितीय हो जाता है। उत्सव इस दुष्चक्र को तो तोड़ते है ही साथ ही हमें अवसर देते है जहाँ से खड़े होकर हम अपने काम को समग्रता से देख सकें। जिस प्रकार पहाड़ की चोटी पर खड़े होकर अपने ही शहर को देखने पर उसकी खूबसूरती और कमियाँ साफ़ नज़र आने लगती है उसी तरह अवकाश के दिनों से अपने काम को समग्रता से देखने पर हमें साफ़ नज़र आएगा कि हमारे काम में कहाँ अनुपात बिगड़ रहा है और कहाँ लय टूट रही है।
एक सबसे छोटा दिखने वाला लेकिन सबसे महत्वपूर्ण लाभ -- उत्सव हमें अपने रिश्तों की मरम्मत करने का अवसर देते है। शायद इसीलिए हर धार्मिक उत्सव के बाद चाहे वह दिवाली हो, होली हो, ईद हो या क्रिसमस ; अपने प्रियजनों से मिल उनका अभिवादन करने की प्रथा है। एक-दूसरे से मिलने और अभिवादन की यह रस्म अदायगी धीरे-धीरे रिश्तों के बीच आई दीवार ढहाने लगती है।
इस तरह उत्सव हमारे जीवन मूल्यों की पुर्नस्थापना करते है, काम की गुणवत्ता लौटते है, हमारे निर्णयों को पहले से ज्यादा पैना बनाते है और सबसे अव्वल हमारे रिश्तों की मिठास को बनाए रखते है। उत्सव श्रद्दा से कहीं अधिक हमारी जिन्दगी की जरुरत है। ईश्वर करें यह दिवाली हमारे जीवन को और बेहतर बनाएँ।
( रविवार 11, नवम्बर को नवज्योति में प्रकाशित ) आपका राहुल................
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Rahul Dhariwal
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प्रकृति से श्रेष्ठ कोई शिक्षक नहीं और इसके आश्चर्यों का आनन्द लेते हुए जीने से बड़ा कोई सुख नहीं। प्रकृति यानि बदलते मौसम। मौसम यानि जो कल था वो आज नहीं और जो आज है वो कल नहीं। निरंतरता की यही प्रवृति है प्रकृति की अद्वितीय सुन्दरता का राज। यही है हर सुबह की नई ताजगी और हर शाम की शीतलता की वजह। हमारे लिए ही गर्मियों के दिनों में सर्दी की कल्पना कर पाना कितना मुश्किल हो जाता है, इसी शिद्दत से जीती है प्रकृति अपने मौसमों को पर फिर धीरे-धीरे सर्दियाँ आने लगती है, कितनी सहजता से स्वीकार कर लेती है इस बदलाव को और उसी रंग-ढंग में ढल जाती है।
हम प्रकृति के इन रंगों के इतने अभ्यस्त हो चुके है कि इनसे सीखना तो दूर यह विविधता हमें आनंद-आश्चर्य भी नहीं देती। प्रकृति तो हर क्षण अपने आचरण से हमें याद दिलाती है कि जो कुछ जिओ उसे उस समय पूरी तरह डूबकर, कोई गिला बाकी न रहे लेकिन साथ ही यह भी याद रहे कि दुनिया में जिस किसी का भी अस्तित्व है तो उसके होने की वजह भी, तो जाने का समय भी। छोटी हो या बड़ी सबकी एक उम्र होती है लेकिन जिन क्षणों को भरपूर जिया हो उनकी विदाई आसान होती है। एक मौसम की सहज विदाई ही तो दुसरे मौसम के स्वागत का द्वार खोलती है और यही वो तरीका है जिससे हमारी जिन्दगी भी प्रकृति की तरह अद्वितीय सुंदर बन सकती है।
जिन्दगी के सबसे अहम् पहलू है हमारा काम और हमारे रिश्ते। दोनों के प्रति हमारा नज़रिया वही होना चाहिए जो प्रकृति का अपने मौसम के प्रति होता है। यह ठीक है कि हम वो करें जिसकी हमें दिल गवाही दे और तब काम, काम नहीं खेल बनकर रह जाएगा लेकिन कई बार हम व्यावहारिक कारणों के चलते अपने मनचाहे काम के अलावा किसी और काम में होते है या समय के साथ हमें अपना काम ही कम भाने लगता है। दोनों ही स्थितियों का जवाब प्रकृति में छुपा है। पहले तो आप जिस भी काम में है उसे पूरे मन से कीजिए। पूरे मन से किया काम ही आपको सफलता देगा और यह सफलता ही आपको एक बार वापस अपने काम के चुनाव का अवसर देगी। मान लीजिए आप इंजिनियर है लेकिन चाहते है पेंटर बनना। सबसे पहले तो अपने मन में पेंटर बनने की इच्छा को जिन्दा रखते हुए इंजीनियरिंग के काम को अपना शत-प्रतिशत दीजिए। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में आपकी सफलता आपको वो सब उपलब्ध करवाएगी जिससे आप अपने पेंटर बनने के सपनों को पूरा कर सकें, ठीक उसी तरह जिस तरह प्रकृति पूरी शिद्दत से हर मौसम को जीती है और यही अगले मौसम के आगमन का कारण बनाता है।
जिन्दगी का दूसरा अहम् पहलू है हमारे रिश्ते। किसी भी रिश्ते को तब भरपूर जियें जब आप उसमें हों, यही खुशियों भरे जीवन का राज है लेकिन हम या तो रिश्ते बनाने से पहले उत्साहित होते है या बाद में उन्हें याद करते है। रिश्तों को वर्तमान में जीते हुए भी जीवन में कई बार ऐसी स्थितियाँ बन जाती है कि उन्हें एक मोड़ दे देना ही एकमात्र विकल्प बचता है, तो इसमें कुछ गलत नहीं। आप ऐसा कर दोनों का भला ही कर रहे है लेकिन याद रहे न तो यह क्षणिक भावावेश हो और न ही बेहतर बेहतर रिश्ते की उम्मीद में उठाया कदम; यह स्थिर मन से अन्तरात्मा की आवाज़ पर किया निर्णय हो। किसी भी रिश्ते को महज इसलिए न निभाए कि यह आपका नैतिक दायित्व है वरना लोग क्या कहेंगे? रिश्ते जब कोरी जिम्मेदारी बन जाते है तो अपनी सुगंध खो देते है लेकिन अपनी जिम्मेदारी को नकारा भी नहीं जा सकता अतः रिश्तों को तब तक सहेजने की कोशिश करें जब तक उसमें आत्मिक ख़ुशी का एक भी रेशा बचा हो। एक बात ध्यान रखें रिश्ते परमात्मा का हमारा जीवन खुशियों से भर देने का साधन है लेकिन उसके पास साधनों की कोई कमी नहीं।
प्रकृति से मिली इसी सीख को श्री हरिवंश राय बच्चन ने बहुत ही सुन्दर और सार्थक शब्दों में पिरोया है, " पाप हो या पुण्य कुछ भी नहीं किया मैंने आधे-अधूरे मन से।"
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Rahul Dhariwal
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' काम को जल्दी में नहीं उसकी सम्पूर्णता के साथ कीजिए, छोटे-छोटे प्रलोभन आपको बड़ी उपलब्धियों से वंचित रख देंगे। '
- कन्फ्यूसियस
आचार्य चाणक्य को कहाँ जरुरत थी कि वे धनानंद से बदला लेने के लिए इतना प्रपंच करते। वे किसी तरह धनानंद को मरवा देते और उनका बदला पूरा हो जाता लेकिन क्या तब हम उन्हें इसी श्रद्धा और सम्मान से याद करते? निश्चित रूप से, नहीं। उन्होंने अपने अपमान को उस समय के समाज में गिरते हुए मूल्यों और देश की बदहाल कानून-व्यवस्था के प्रतीक के रूप में देखा और जुट गए नव-भारत निर्माण में। यही है काम को उसकी सम्पूर्णता के साथ करना।
आपकी बात बिलकुल सही है कि सभी महापुरुष तो नहीं हो सकते लेकिन विश्वास मानिए ये बात हमारे जीवन के नव-निर्माण पर भी उतनी ही शिद्दत से लागू होती है। आज हमें किसी भी काम को करने के बाद ठीक वैसा ही लगता है जैसा अपने विद्यार्थी जीवन में परीक्षा परिणाम के दिन लगता था कि काश मैं थोडा वो भी कर लेता कितना छोटा सा हिस्सा था और मेरे लिए मुश्किल भी नहीं। वास्तव में ' शॉर्ट-कट ' हमारी जीवन शैली बन गई है और अफ़सोस मानना हमारी आदत।
हमें लगता है कि ये सब इसलिए हुआ क्योंकि आज की तेज-रफ़्तार जिन्दगी में हमें कितना कुछ करना होता है और समय है कम। 'एक जान, हज़ार अरमान' वाली उक्ति शायद हम जैसों के लिए ही बनी है पर मैं आपको बता दूँ कि शॉर्ट-कट अपनाने का हमारा यह तर्क बिलकुल सतही है। यदि हम सब अपना-अपना काम ढंग से करें तो आत्म-संतुष्टि के प्रतिफल के साथ हमारी वाजिब इच्छाएँ स्वतः पूरी होंगी। सारी समस्या यह है कि हम कर्म की बजाय परिणामों को अपना ध्येय बना लेते है। आपस की बातचीत में आपने कई बार सुना होगा; अभी तो एक ढंग की कार खरीदनी है, बच्चों को पढ़ाना है, घर बनाना है और फिर बच्चों की शादियाँ भी तो करनी है और फिर लग जाते है इन सब के ' जुगाड़ ' में। हम अपने काम को पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ करने और उस पर एतबार करने की बजाय इधर-उधर हाथ मरने लगते है और अपनी सुंदर जिन्दगी को 'तनाव', 'भाग-दौड़', 'तेज-रफ़्तार', जैसे विशेषणों से सजा देते है। अपने काम पर विश्वास और उसके प्रति हमारी ईमानदारी और निष्ठा आत्म-संतुष्टि के साथ हमारी अभिलाषाएँ तो पूरी करेंगी ही, समाज में प्रतिष्ठा का अतिरिक्त लाभ भी देगी।
टेक्नोलोजी के इस युग की इन्सान को सबसे कीमती भेंट है तो वह है ' समय की बचत '। आज हर चीज को बनाते समय सबसे अहम् यही बात ध्यान रखी जाती है कि ये उपयोग करने वाले का कितना समय बचाएगी। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया कि इस बचे हुए समय का हम करते क्या है? यह समय बचाया था इसलिए कि हम अपना काम ढंग से कर लें लेकिन इन चीजों के बीच रहते-रहते हम अपने काम को भी इन उपकरणों की शैली में करने लग गए।
जिन्दगी में धीरे होना और अपने काम को सम्पूर्णता से करना एक कला है। धीरे-धीरे स्वाद लेकर थोडा भी खाया हुआ संतुष्टि देता है। मैं शर्तिया कह सकता हूँ कि आपकी जिन्दगी के दस यादगार अनुभव वे ही होंगे जिनमें आपने अपना शत-प्रतिशत दिया होगा। धीरे होने में स्मृति है तो तेज होने में विस्मृति। काम की सम्पूर्णता ही जीवन में संतुष्टि की संजीवनी है।
( रविवार, 28 अक्टुबर को नवज्योति में प्रकाशित ) आपका राहुल......
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Rahul Dhariwal
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विचारों के बीज से ही तो शब्दों का जन्म होता है और फिर शब्द हमारी दुनिया बनाते है। शब्द अपने जन्म से पहले मस्तिष्क में उठा विचार ही तो है। जिन शब्दों को हमारी इच्छा-शक्ति का बल मिल जाता है वे हमारे कर्म और धीरे-धीरे आदतें बन जाती है। हमारी आदतें हमारा चरित्र बनाती है और आदमी का चरित्र ही उसकी जीवन-परिस्थितियों यानि भाग्य के लिए जिम्मेदार होता है और इस तरह हमारी जिन्दगी का पहिया घूमता है। विचारों की पहली सीढ़ी शब्द तो अंतिम परिणिति भाग्य है। जीवन को सुंदर बनाना है तो अपने विचारों को दुरुस्त करना होगा।
लेकिन क्या विचारों को बदल पाना इतना आसान है? एक रोचक तथ्य के अनुसार एक औसत व्यक्ति के मस्तिष्क में रोजाना लगभग 60,000 विचार आते है। विचारों के इस हडकम्प में इन्हें बदलना तो बहुत दूर इन्हें पकड़ना ही बहुत मुश्किल हो जाता है। ध्यान लगाना विचारों को दुरुस्त करने का सबसे सुन्दर और प्रामाणिक तरीका है लेकिन सबके लिए सुगम भी तो नहीं। विचारों की गति इतनी तेज होती है कि ध्यान के शुरूआती दिनों में तो ऐसा है जैसे हम अपने जीवन की समस्याओं पर बनी फिल्म देख रहे है।
ऐसे समय हम अपने शब्दों के जरिए अपने विचारों को जान-समझ सकते है। सामान्यतया हम जिस सूक्ष्मता से दूसरों की कही बात सुनते है अपनी नहीं सुनते। आप जब भी बोलें सजग रहकर स्वयं भी सुनें। मेरा विश्वास है कि कई बार आपको स्वयं आश्चर्य होगा कि 'मैं ऐसे कैसे बोल सकता हूँ।' यही सजगता यही आश्चर्य आपको अपने कहने के पीछे की सोच और नजरिए को समझने में मदद करेगी। आपके शब्द आपको उस विचार तक पहुँचाएगे जो आपकी आज की परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी है और तब उसे ठीक करना कहीं आसान होगा।
यदि हमारे लिए विचारों तक पहुँचना फिर भी मुश्किल है तो एक आसान तरीका है जिसे अपना आप अपने विचारों को बिना उन तक पहुँचे-जाने उन्हें सकारात्मक बना सकते है और वह है ' स्व-वार्ता '। स्व-वार्ता यानि बातें जो हम अपने आप से करते है। हमारे विचारों और शब्दों के बीच की एक सूक्ष्म कड़ी। आप गौर करेंगे तो पायेगें कि हम हर समय अपने आप से कुछ न कुछ बात कर रहे होते है। जैसी हमारी सोच होगी वैसी ही बातें हम अपने आप से करेगें, उदाहरण के तौर पर यदि हर छोटी-बड़ी घटना के लिए हम अपने आपको जिम्मेदार मानते है तो हम अपने आपको हमेशा ही डाँटता-धिक्कारता पाएँगे। जिस तरह हम अपने आप से बात करते है उससे हमारा मानसिक वातावरण बनता है और जैसा हमारा मानसिक वातावरण होता है वैसे ही हम औरों से बात करते है, शब्दों का प्रयोग करते है। इस पहलू का महत्व एवम उपयोगिता इसलिए भी ज्यादा हो जाती है क्योंकि अपने प्रति अपनी भाषा को सुधारना कहीं आसान है औरों के प्रति अपनी भाषा सुधारने से।
आपका मन चाहे कुछ भी कहे, ध्यान रखिये कि आप हमेशा अपने आप से प्यार से ही बात करेंगे। आपके लगातार ऐसा करने से आप औरों पर स्नेह तो बरसाएँगे ही, एक स्वस्थ मानसिक वातावरण के चलते एक तरफ तो आपके विचार स्वतः ही दुरुस्त हो जायेंगे तो दूसरी तरफ आप अच्छे कर्मों की ओर उद्दृत होंगे।
अपनी कही को हवा में मत उड़ाइए, आपके शब्द आपकी सोच और नजरिया भी बदल देंगे तो आपका जीवन और भाग्य भी। आपको नहीं लगता कितना आसान है वह काम जो हमारी बोली मात्र से सुधर जाएँ ?
( रविवार 21, अक्टूबर को नवज्योति में प्रकाशित ) आपका राहुल........
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Rahul Dhariwal
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एक अखबार के स्तम्भ में खुशवंत सिंह जी लिखते है कि उम्र के इस पड़ाव पर जब मैं पीछे मुड़कर हूँ तो अहसास होता है कि मैंने किस तरह अपना कीमती समय जाया किया वह भी जवानी के उन ऊर्जावान दिनों में जब मेरे पास करने के कई बेहतर विकल्प थे। वे आगे लिखते है कि उन दिनों मुझे अख़बार में छपने वाली ' क्रासवर्ड पजल्स ' को हल करने की लत पड़ गई थी. सुबह के खाने से पहले का समय जो सामान्यतया मेरी पढाई - लिखाई का होता था, उसे कई बार मैं इन पहेलियों को हल करने में ही व्यर्थ कर देता था।
वे सिर्फ अपने बारे में नहीं बता रहे थे बल्कि याद दिला रहे थे कि किस तरह हम सब अपनी जिन्दगी का एक बहुत बड़ा हिस्सा बेहोशी में गवां देते है। क्षणिक आनन्द जो बाद में अफ़सोस में बदल जाता है। सबसे कीमती है ये क्षण क्योंकि इसे कभी लौटाया नहीं जा सकता। यही सब सोचते - सोचते मुझे जॉर्ज बनार्ड शॉ की वे पंक्तियाँ याद आने लगी जिनमें उन्होंने होशपूर्ण जीवन को बहुत ही खूबसूरती से बयाँ किया है। वे लिखते है, " मैं मरने से पहले पूरी तरह काम में आ जाना हूँ - क्योंकि जितना काम आऊँगा उतना ही जिऊँगा। जिन्दगी अपने आप में ही मुझे आनन्दित करती है।"
प्रत्येक व्यक्ति की अपने जीवन से कोई न कोई महत्वाकाँक्षा होती है। किसी को डॉक्टर बनना है, किसी को खेल-जगत में नाम कमाना है, किसी को समाज-सेवा करनी है तो किसी को अच्छा व्यापारी। जीवन का हर क्षण हमें मौका देता है इनकी तरफ कदम बढ़ने का लेकिन हम रोजमर्रा की बातों और परिवार के गैर-जरुरी बातों पर मतभेद मैं उलझ अपने वृहत्तर उद्देश्यों से भटक जाते है। सबसे मजे की बात यह कि कुछ दिनों बाद ये बातें हमें ही याद नहीं रहती। जीवन की इन अडचनों की तुलना हम गाडी में आने वाली उन गड़बड़ियों से कर सकते है जो उसके रख-रखाव की श्रेणी में आती है। गाडी हम अपनी सुविधा से आने-जाने के लिए रखते है न कि रख-रखाव के लिए। रख-रखाव जरुरी है जिससे गाडी वक्त पर हमारे काम आ सके लेकिन इसी में उलझे रहे तो गाडी होने का आनंद ही क्या? दैनिक जीवन की छोटी-मोटी परेशानियों के प्रति हमारा यही दृष्टिकोण होना चाहिए। जिन्दगी जीने के लिए इन्हें सुलझाना है, इन्हें सुलझाना जिन्दगी नहीं है। इस तरह हर गुजरते क्षण को अपने जीवन उद्देश्यों को पूरा करने का साधन बना लेना ही ' मरने से पहले पूरी तरह काम आ जाना ' हो सकता है।
फिर हमारा होना ही किसी आश्चर्य से कम है? जीवन का मतलब ही महसूस करना और व्यक्त करना है और ऐसा कर पाना ही जीवन का सच्चा आनन्द है। इस आनन्द को अपना स्थायी भाव बना लेना, स्वतः ही मन में कृतज्ञता के भाव लाएगा। अब जहाँ कृतज्ञता होंगी वहाँ शिकायतें कैसे रहेंगी। ' जिन्दगी अपने आप में मुझे आनन्दित करती है ' से बनार्ड शॉ का शायद यही आशय है। जब किसी से कोई शिकायत नहीं तब स्वतः ही आप अपनी जिन्दगी के मालिक होंगे और फिर आपको अपने लक्ष्यों से कोई नहीं भटका सकता। आपके लिए अपनी तरह से जी पाना और हो पाना कहीं आसान होगा।
बचपन में सुनी कछुए और खरगोश की कहानी तो आपको जरुर याद होगी। कछुए को हर क्षण अपना लक्ष्य ध्यान था और खरगोश को कभी पेड़ की छावं रोक रही थी तो कभी अपने अपने तेज दौड़ पाने का दम्भ। बस इतनी सी बात ध्यान रखनी है फिर देखना कछुए की तरह जीत हमारी ही होगी।
आपका, राहुल ....... ( रविवार, 14 अक्टुबर को नवज्योति में प्रकाशित )
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Rahul Dhariwal
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जब हम अपने बच्चों को कह रहे होते है कि ' बेटा ! अच्छे बच्चे ऐसे नहीं करते' तब हमें कहाँ अंदाजा होता है कि एक अच्छी आदत सिखाने की कोशिश के साथ -साथ हम उनके कन्धों पर कितना बड़ा बोझ लाद रहे है। आप कहेंगे, अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देना ही तो माता-पिता का कर्त्तव्य है और फिर इसके लिए बच्चों को थोडी-बहुत तकलीफ भी हो तो, क्या गलत है? सोना तपकर ही तो निखरता है।
आप की बात सोलह आने सच है लेकिन क्या अनजाने ही आपने यह नहीं कह दिया कि वह अच्छा बच्चा नहीं है और अच्छा बनने के लिए कुछ अलग से करने की जरुरत है। हम अपने बच्चों को अच्छा बनाने के लिए अपने प्रेम को हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगते है। बच्चे जो सिर्फ प्रेम की भाषा समझते है हर संभव कोशिश में जुट जाते है कि वे हमारे प्रेम के काबिल बन सकें। समय के साथ-साथ उन्हें अच्छे से अच्छा बनाने की जुगत में हमारे मानदण्ड ऊँचे उठते चले जाते है। धीरे-धीरे बच्चे उन मानदण्डों को छू पाने में असफल होने लगते है लेकिन एक बात अनजाने ही सही उनके अवचेतन में गहरे पैठ जाती है कि वे जैसे है वैसे ही तो प्रेम के काबिल नहीं। यदि वे सबके द्वारा स्वीकार किया जाना चाहते है तो उन्हें हमेशा ही कुछ अतिरिक्त कर अपने आपको सिद्ध करना होगा।
बच्चों के मन में पैठी यही बात लगता है आज पूरे समाज में व्याप्त हो गई है। जहां व्यवस्था का आधार यह होना चाहिए कि ' प्रत्येक व्यक्ति ईमानदार है जब तक कि वह बेईमान सिद्ध न हो जाएँ ' वहाँ हो इसका बिलकुल उलट रहा है। आज की समाज-व्यवस्था ऐसी हो गई है कि ' प्रत्येक व्यक्ति बेईमान है जब तक कि वो ईमानदार सिद्ध न हो जाएँ'। पग-पग पर हम पर अपने आपको सिद्ध करने का बोझ है। दैनिक जीवन का कोई काम यदि बिना किसी प्रक्रिया से गुजरे सम्मानपूर्वक हो जाएँ तो हमें ही शक होने लगता है कि जरुर कुछ गड़बड़ है। शायद मुझसे ही कहीं कोई कमी रह गई है मुझे लग रहा है पर काम ढंग से हुआ नहीं है।
बचपन से लगाकर आज तक व्यक्ति के साथ यह जो कुछ भी हुआ उसने व्यक्ति के मन को अपराध-बोध से भर दिया है। अपराध-बोध कमतर होने का, सबसे हीन होने का। इसी भावना के चलते हम हमेशा ही किसी और की तरह होने और दिखने की कोशिश मैं लगे रहते है, कभी खुलकर नहीं जी पाते। चेहरों की पारदर्शिता तो न कहाँ खो गई है?
समय के साथ हम सब यह तो मानने लगे है कि हर बच्चे में कोई न कोई एक विशेष गुण होता है बस जरुरत होती है उसे ढूंढ़ने की, तराशने की। बावजूद इसके न जाने क्यों यही बात हम अपने बारे में समझने और मानने से झिझकते है। हम स्वयं दूसरे के जैसा और हमारे अपनों को हमारे जैसा बनाने के युद्ध में लगे है। स्वयं तो लहू-लूहान है ही उन्हें भी किए बठे है जिनसे हम प्रेम करते है।
जीवन में शांति और आनंद लौटाने है तो इस युद्ध को रोकना होगा। यह समझना और मानना होगा कि हम सब 'अच्छे' है, एक-दुसरे के प्रेम के काबिल। एक-दूसरे की पूर्णता को उनकी विशिष्टताओं के साथ स्वीकार करना होगा। हमारी यही समझ हमें खुलकर जीने का मैदान देगी। आज मैं फिर अपनी पसंदीदा पंक्ति की पुनरावृति को नहीं रोक पा रहा हूँ कि ' हम सब ईश्वर की स्वतंत्र भौतिक अभिव्यक्ति है'। अपनी और अपनों के अद्वितीय होने की स्वीकारोक्ति ही हमें अपराध-बोध की बेड़ियों से मुक्त कराएगी।
आपका राहुल...... ( रविवार 7 अक्टूबर को नवज्योति में प्रकाशित )
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Rahul Dhariwal
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बहुत कम लोग ऐसे होंगे जिन्हें अपनी जिन्दगी से यह शिकायत न हो कि फलाँ-फलाँ कारणों से इन्हें वो जिन्दगी नहीं मिल पायी जिसके ये हक़दार थे और हैं. इनके ढेर सारे कारणों में ये कहीं नहीं होते. कोई और, चाहे वो कोई भी हो इनके आज के लिए जिम्मेवार होता है. आप जब भी इनसे मिलेंगे या तो किसी न किसी को कोसता या किसी न किसी से उलझता पायेंगे.
एक मिनट के लिए रूककर इनके दैनिक जीवन पर नज़र डालें तो माजरा बिल्कुल साफ़ नज़र आ जायेगा. ये वे लोग है जो दिल्ली की ट्रेन पकड़कर मुंबई पहुँचना चाहते है. ये जिस तरह अपना दिन बिताते है और एवज में जैसी जिन्दगी चाहते है, इन दोनों का आपस में कोई मिलान नहीं होता. वैसे ही जैसे एक व्यक्ति अच्छा गायक तो बनना चाहें लेकिन रियाज़ से कतराए और दोष दे जिन्दगी को. कर्म-व्यवहार और सपनों का यही असंतुलन हमारी शिकायतों की असली वजह है.
ये कोई ऐसी बात नहीं जो आपको पहले से मालूम नहीं, तो फिर बात आकर ठहरती है कि सब कुछ मालूम होते हुए भी हम अपना दिन अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश में क्यों नहीं गुजारते? क्यों हम उचित और अनुचित के नाम पर उन कामों में जुटे रहते है जिन्हें करने को हमारा दिल गवारा नहीं करता और उन्हें हमेशा ही आगे टालते रहते है जिनसे हमारा मन भरता है? जवाब तो सवाल में छुपा है -' विश्वास '. हमें अपने सपनों पर विश्वास नहीं.
मैं आपको याद दिला दूँ , ये वे सपने नहीं जो हम रात को सोते हुए देख लेते है बल्कि हमारे अन्तर्मन की पुकार है जो सोते-जागते हर क्षण हमारे साथ रहती है, जैसे कोई किधर खींच रहा हो. जिस तरह एक बीज में पेड़ बन पाने की हमेशा ही क्षमता होती है बस जरुरत होती है उसे बोने की, खाद-पानी देने की, रखवाली करने की; उसी तरह हम में भी अपने सपनों को पूरा कर पाने की हमेशा ही क्षमता होती है जरुरत होती है उन पर विश्वास करने की, उन्हें जिन्दा रखने की, उन्हें जीने की. हमारे सपने हमारे होने की वजहें है और इन पर विश्वास करने की इससे पुख्ता क्या वजह हो सकती है?
आप कहेंगे, 'ये बातें कहने-सुनने में ही अच्छी लगती है'. ठीक भी है, व्यावहारिक जीवन में सपनों के आर्थिक पक्ष को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता विशेषकर जब वे हमारे काम-काज से जुड़ें हों. कुछ क्षेत्र ऐसे है जिनके बलबूते आप अपना जीवन और गृहस्थी सहजता से चला पायें, इस स्थिति तक पहुँचने में समय लग सकता है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अपने सपनों को पूरा करने की कोशिशों के साथ-साथ किसी ऐसे अतिरिक्त काम से भी जुड़ जाना चाहिए जो उसके जीवन की सहजता को बरक़रार रखते हुए उसके सपनों को जिन्दा रख सकें. यह सपनो से समझौता नहीं उन्हें पूरा करने की प्रक्रिया का हिस्सा भर है. आपके सपने, चाहे जो भी हो, उनमें निस्संदेह इतना माद्दा होता है कि वे आपको वैसा जीवन दे सकें जो आपके लिए अनुकूल हों; बात सिर्फ समय के अन्तराल की है.
हमारा यही विश्वास दैनिक जीवन में कर्म-व्यवहार और सपनों के संतुलन को लौटाएगा. प्रकृति तो चाहती है कि हम अपने सपनों को जिएँ, पूरा करें; जरुरत है तो बस हाथ थामने भर की.
आपका, राहुल...... ( रविवार, ३० सितम्बर को नवज्योति में प्रकाशित )
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Rahul Dhariwal
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किसी भी काम को अच्छे से अच्छा करने कि कोशिश करने से सुंदर कोई बात नहीं हो सकती. एक सच्चा जीवन-साधक वही है जो हर बार पहले से बेहतर करने की कोशिश करें. यही जीवन की प्रेरणा-शक्ति भी है और ऊर्जा-स्रोत भी. अपने काम में परफेक्ट यानि बिल्कुल सही होने की प्यास ही हमें सर्वश्रेष्ठ बनाती है. यही हमारे सफल और अंततः खुशहाल जीवन का मूल-मंत्र है.
आप सोच रहे होंगे कि हर बार जिस तरह मैं अपनी बात ख़त्म करता हूँ, आज शुरू कैसे कर रहा हूँ. आप ठीक सोच रहे हैं. मैं आज 'काम को और बेहतर' करने की बात नहीं कर रहा वरन यह विचार साझा करना चाहता हूँ कि किस तरह शक्कर कि अधिकता चाशनी को कड़वा बना देती है. किस तरह इतना सुंदर गुण जूनून कि हद तक बढ़ हमारे जीवन की सुख-शांति छीन लेता है.
कुछ जीवन-साधक अपने काम को इस तरह मांजते चले जाते है कि उनका काम उनका परिचय बन जाता है. किसी काम से उनका जुड़ा होना ही काम के स्तर कि घोषणा होती है. ठीक वैसे ही जैसे आजकल हम आमिर खान के किसी कार्यक्रम या फिल्म के बारे में सोचते है. किसी व्यक्ति के लिए इससे बड़ा पुरस्कार और क्या हो सकता है?
आपका काम आपका परिचय बने, लोग उसमें आपकी सुगंध पायें लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब हम उसे अपना पर्याय समझने लगते है. आपका पर्याय हो सकता है तो सिर्फ काम के प्रति आपकी ईमानदारी एवम निष्ठा और कोई नहीं. गुड अपनी मिठास से पहचाना जाता है न कि हलवे के स्वाद से. हलवे का बहुत या कम अच्छा बनना सिर्फ एक अनुभव है लेकिन व्यक्ति जब अपने काम या अनुभव को अपना पर्याय बना लेता है तो फिर उसमें छोटी-सी चूक भी बर्दाश्त नहीं कर पाता. उसे लगता है जैसे उसका अस्तित्व ही खतरे में पड गया हो और इस तरह अपने काम में परफेक्ट होने जैसा सुंदर गुण भी अति के कारण जीवन में कुंठा और नैराश्य का कारण बन जाता है.
हो गई ना चाशनी कडवी ? सच तो यह है कि आपका काम आपका बच्चा है. जिस तरह आप अपने बच्चे को सारी अच्छाईयों और कमियों के बावजूद प्यार करते है लेकिन साथ ही जिन्दगी भर उसकी कमियों को दूर करने कि कोशिश करते है उसी तरह आप अपने काम को सम्पूर्णता से स्वीकारें, उसमें भी गलतियों के लिए जगह छोड़ें. गलतियों की स्वाभाविकता को सह्रदयता और सहजता से लें. ये ही वे क्षेत्र है जिन पर आप काम कर अपने जीवन को अधिक बेहतर बना सकते है. किसी भी व्यक्ति या वस्तु का मूल्यांकन उसकी समग्रता के आधार पर करें.
असम्पूर्णता सम्पूर्णता की सुन्दरता तो है ही उसका अटूट हिस्सा भी. प्रकृति की ओर नज़र घुमाकर देखें, यह बात सहज ही समझ आ जाएगी. प्रकृति का कोई घटक ऐसा नहीं जिसमें बाँकपन न हो. सूर्य ठीक पूर्व मैं नहीं उगता, पृथ्वी पूरी गोल नहीं और चन्द्रमा बेदाग़ नहीं लेकिन क्या प्रकृति से पूर्ण और सुंदर कुछ हो सकता है?
सोचिए पेड़-पौधे और फल-फुल यदि रूप-रंग, स्वाद-सुगंध में एक से होते, यहाँ तक कि हमारी शक्लो-सूरत भी एक सी होती; ठीक वैसी जिसे हम परफेक्ट कहते है तो हमारा जीवन कितना बेजान और नीरस होता. परफेक्शन किसी वस्तु में नहीं व्यक्ति कि नज़र में होता है और परफेक्ट वह व्यक्ति होता है जिसे जीवन के हर पहलू में पूर्णता नज़र आए. अपने काम में त्रुटियाँ नहीं आनंद ढूढीए. हर बार इस आनंद को बढ़ाने कि सोचिए फिर देखिए जीवन में कैसे मिठास घुल जाती है.
आपका राहुल.... ( रविवार, २३ सितम्बर को नवज्योति में प्रकाशित )
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Rahul Dhariwal
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क्षमा कर पाना इंसान का श्रेष्ठतम चारित्रिक गुण और पावन कर्म है. शायद इतना श्रेष्ठ और पावन की हम इसे मानवीय ही नहीं मानते. हम सोचते है कि ये तो किसी महापुरुष के बूते की ही बात है, भला मुझसे कैसे संभव है?
इस प्रश्न से उलझने से पहले हमें एक-दूसरे हठी प्रश्न से दो-दो हाथ करने होंगे वो यह कि ' मैं क्षमा करूँ ही क्यूँ? जब तक हमारी बुद्धि ये नहीं समझ लेती हमारा अहंकार क्षमा न करने के नित-नए बहाने ढूंढता रहेगा. इस बीच यदि हम अपने मन को टटोले तो एक बड़ा हिस्सा अपराध-बोध, क्रोध और घृणा से भरा मिलेगा. मन में इन भावों के होने का अहसास ही जाहिर कर देगा कि किस तरह हम अपने आपको रोके है वह सब करने, होने और बनने से जो हम अपनी जिन्दगी से चाहते है. हमें ठीक वैसा ही लगेगा जैसे हम घर से करने कुछ निकले थे और कर कुछ और रहे है. क्षमा हमें अपराध-बोध, क्रोध और घृणा से मुक्त कर हमारी रचनात्मकता लौटाती है.
आप कहेंगे, सारी बात ठीक है लेकिन ऐसा कोई व्यवहार जिससे हमारा मन आहत हुआ हो, दिल दुख हो; भला! कोई कैसे भूला सकता है? आपकी बात सही लगती है लेकिन इसे सही मानने से पहले हमें लोगों कि छंटनी करनी होगी. पहले तो हम स्वयं, दूसरे वे लोग जिनसे अनजाने ऐसा हुआ और तीसरे वे जो जान-बूझकर लगातार ऐसा कर रहे है.
यदि विगत में ऐसी किसी भूल जिसका पछतावा आज भी आपके दिल में है जिसके बारे में आपको ऐसा लगता है कि काश! में ये नहीं करता या इसकी जगह वो कर लेता तो आज मेरा जीवन, रिश्ते और सफलताएँ कुछ और होती तो एक बात हमेशा ध्यान रखिए, आप आज जो भी है वो अपने अच्छे और बुरे सारे अनुभवों का सम्मिलित परिणाम है. इन गलतियों ने ही आपको इतना परिपक्व और समझदार बनाया है. यदि आपने अपनी गलती से सीख लिया तो उस गलती का उद्देश्य व आपका काम पूरा हो गया, अब उसे और ढोने की कोई जरुरत नहीं. आप अपने को क्षमा कर ही किसी और को क्षमा कर पाने के काबिल बन सकते है.
आपकी अपने प्रति यही सहजता उन लोगों को समझने में मदद करेगी जिन्होंने अनजाने ही आपको आहत किया है. मुझे याद आता है 'पा' फिल्म का संवाद. एक छोटी दोस्त आई. सी.यू में लेटे ऑरो से कहती है कि अपनी गलती पर शर्मिंदा और दिल से माफ़ी माँगने वाला कहीं ज्यादा आहत होता है जिससे वो माफ़ी कि उम्मीद रखता है. व्यक्ति को उसके आचरण से नहीं नीयत से पहचानना चाहिए.
अब आते है वे लोग जो जान-बूझकर ऐसा व्यवहार करते है जो आपको तकलीफ पहुँचाए. ऐसे लोगों से पहली बार में कठोर एवम स्पष्ट शब्दों में अपनी असहमति व्यक्त कर दें. हो सकता है इन्हें ग़लतफ़हमी हो कि आपको अपनी तकलीफों कि वजह का अंदाजा ही नहीं. ऐसा है तो आइन्दा ये अपना व्यवहार सुधार लेंगे और आपके लिए उनके उस व्यवहार को भूला देना कहीं आसान होगा.
जो लोग इसके बाद भी अपने व्यवहार को दोहराते है उनसे दूरी बनाना ही अच्छा, यह समझकर कि जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण भिन्न है. ये सिखाते है कि हमें जीवन में कैसा व्यवहार कभी नहीं करना चाहिए. इन लोगों से दूरी ही आपके जीवन में शांति लौटाएगी जो हमें बुरे सपने की तरह उनके व्यवहार को भुलाने में मदद करेगी. अंग्रेजी में एक कहावत है, ' सूअर के लिए तो कीचड़ आनंद है पर आप उससे उलझकर अपने कपडे हो खराब करेंगे.'
कुछ लोग इससे भी आगे बढ़ जाते है. आपकी भलमानसता को कमजोरी समझाने लगते है. अपने निजी स्वार्थों के लिए आपका ही अहित करने से भी जरा नहीं हिचकते. ऐसे लोगों के प्रति क्रोध जायज है और आपको अपने बचाव का अधिकार भी. हर आदर्श की एक सीमा होती है नहीं तो कृष्ण शिशुपाल का वध नहीं करते ओर राम रावण से युद्ध नहीं करते. वो क्षमा नहीं कायरता है जो हमारे आत्म-सम्मान को गिराएँ, हमारी निजता पर अतिक्रमण करें लेकिन ध्यान रहें, आपका क्रोध अँधा न हो. आपकी प्रतिक्रिया व्यवहार के प्रति हो व्यक्ति के प्रति नहीं.
क्षमा का यही बहुआयामीपन व्यक्ति को साधारण से असाधारण बनता है. यह महापुरुषों का गुण नहीं बल्कि वो रसायन है जो व्यक्ति को महापुरुष बनता है.
( इतवार १६ सितम्बर को नवज्योति में प्रकाशित ) आपका राहुल....
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From
Rahul Dhariwal
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एक व्यक्ति ने अपने पिता के कातिल को ढूंढ़कर बदला लेना अपना जीवन लक्ष्य बना रखा था. कई सालों तक उसका पीछा कर आख़िरकार उसने अपना बदला पूरा कर ही लिया. वापस लौटते हुए वह हतप्रभ सा चारों दिशाओं में देख रहा था. उसका दिमाग जैसे कुंद हो गया था. उसे बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि वो किधर लौटे? अब जब उसका लक्ष्य पूरा हो गया तो वह जीवन में किधर बढे? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सभी अपनी जीवन यात्रा में इतने खो जाते है, ढूंढने में इतने तल्लीन हो जाते है कि जब हमें वह मिल जाती है तब न तो ये मालूम होता है कि इसका क्या करें और न ही ये मालूम होता है कि इसके बाद क्या करें?
एक पथिक को चलते रहने की ऐसी आदत सी पड जाती है, उसी में इतना आनंद आता है कि वो अनजाने ही सही, पहुंचना ही नहीं चाहता. यात्रा की तो पूरी जानकारी होती है लेकिन मंजिल अनजानी होती है. हम भी उस पथिक की ही तरह पा लेने की दौड़ के इतने अभ्यस्त हो चुके है कि स्वयं ही स्वयं को उससे दूर रखे है जो हम पा लेना चाहते है. अनावश्यक प्रयास करते रहना हमारी जीवन-शैली बन गई है जो हमें गलतियाँ करते रहने और अपने काम के प्रति लापरवाह रहने की छूट देती है. निश्चित रूप से ऐसा जीवन हमें सुरक्षा का आभास देता है और इसीलिए हम अपने सुरक्षा घेरे (कम्फर्ट जोन) से बाहर निकलना ही नहीं चाहते. यहाँ तक कि हम अपना परिचय, रिश्ते, मूल्य और जीवन-संबल भी सुरक्षा घेरे के इस दायरे में ही बुन लेते है.
सच तो यह है कि हमें खुद नहीं मालूम होता कि इस सुरक्षा की हम क्या कीमत चुका रहे होते है. यह होती है मन का खालीपन, कमतरी की भावना, परिस्थितियों की मज़बूरी और प्रेम-विहीन जीवन जबकि इससे बाहर निकल 'पा लेने' का अहसास हमें अपनी तरह जीने का आत्म-विश्वास तो देगा ही साथ ही हमारा जीवन सुख-शांति-स्वास्थ्य और प्रेम से खिल उठेगा.
वास्तव में ये हमारे मन का डर ही है जो हमें अपनी कामयाबी को गले लगाने से रोकता है. कामयाबी जो खुशियों के साथ जिम्मेवारी भी लाती है. यदि आप किसी चीज के प्रति जिम्मेवार है इसका मतलब है उससे सम्बंधित निर्णय आप ही को लेने है. निर्णय चाहे कितने ही विवेक से क्यूँ न लिए जाएँ उनके सही या गलत होने की सम्भावना बराबर बनी रहती है. अहम् भला हमें उस दिशा में क्यूँ जाने देना चाहेगा जहाँ हमारे गलत हो जाने का जरा सा भी अंदेशा हो. हकीकत तो यह है कि हम अपनी जिम्मेवारियों से भाग रहे होते है. अहम् कि ये ही कारस्तानियाँ हमें कामयाबी को स्वीकारने से रोकती है.
इसे यों देखें जैसे कोई भी अच्छा विद्यार्थी यही चाहेगा कि शिक्षा ग्रहण के बाद उसकी गिनती अपने विषय के श्रेष्ठ ज्ञाताओं में हो. यही उचित है और यही प्रेरणा भी लेकिन यह भी उतना ही सही है कि दीक्षित (ग्रेज्यूएट) होना शिक्षा का एक आवश्यक एवम महत्वपूर्ण पड़ाव है. पाठ्यक्रम की सम्पूर्ण जानकारी दीक्षित होने की शर्त कभी नहीं हो सकती. ठीक उसी तरह जैसे एक शिक्षक को अपने विषय की सम्पूर्ण जानकारी नहीं हो सकती लेकिन एक मुकाम पर आकर उसे स्वीकार करना पड़ता है कि उसका अर्जित ज्ञान दूसरों में बाँटने के लिए पर्याप्त है. यह हमारी ग़लतफ़हमी है कि संतुष्टि का यह भाव एक दीक्षित या शिक्षक को आगे ज्ञानार्जन से रोक देगा. संतुष्टि ठहराव नहीं आत्म-सम्मान और आत्म-विश्वास की आधारशिला है. यह हमें मजबूती से आगे बढ़ने की ऊर्जा देती है.
निस्संदेह यात्रा का भी उतना ही महत्व है जितना मंजिल का. जिसने यात्रा का आनंद नहीं लिया वह मंजिल पर पहुँच कर भी खाली ही रहेगा लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही सत्य है कि कोई भी यात्रा मंजिल के लिए होती है और होनी चाहिए. यदि रास्ते का आनन्द आपको जीवन भर पथिक बनाए रखता है तो आपने यात्रा के मूल भाव को ही कहीं बिसरा दिया है. एक बात हमेशा याद रखनी होगी कि ठहराव कभी ख़ुश्बू नहीं दे सकता.
( दैनिक नवज्योति - रविवारीय में 9 सितम्बर को प्रकाशित) आपका राहुल......
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