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Ram  Purshottam  Kasture 's Blogs
Ram Purshottam Kasture : Blogs
Posts - 69    Comments - 119
 
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Posted on
Jul
25
2012
Wed
3:14
PM
मेट्रो मोनी साइड
From Ram Purshottam Kasture
मैने लड़की खोजने हेतु "भारत मेट्रो मोनी " और" रेशीम बंध" की साईट पर पंजीयन कराया. इसके बाद लडकियों की खोज शुरू की, इस खोज में मुझे जो अनुभव आये उसे मै आपके साथ साझा करना चाहता हूँ :-
१. इन साईट पर लडकियों को अपना इंटरेस्ट भेजो लडकिया इसे पढना पसंद नहीं करती. मई -जून के सन्देश अब तक नहीं पढ़े गए. ऐसा लगता है, केवल शादी के उम्मीदवार साबित हो सके इसीलिए शायद इन्होने पंजीयन कराया हो. माँ - बाप भी इन संदेशो को कोई महत्व नहीं देते . लगता माँ -बाप भी पंजीयन की रस्म अदायगी कर रहे है .यदि हमने पंजीयन कराया है तो इनका अधिक से अधिक उपयोग कर दुसरो के संदेशो का उतर देना हमारा कर्तव्य है. यदि इसके प्रति हम उदासीन है, तो निश्चित रूप से कोई भूल हमसे हो रही है.
२. इन साईट पर चेट पर आयी लडकिया केवल अपने मित्रो से बातचीत में मशगुल रहती है. यदि आप उनसे पूछते है कि उन्हें कैसा लाइफ पार्टनर चाहिए ? इसका जवाब आज तक किसी लड़की ने नहीं दिया है?
3 फ़ोन पर सम्पर्क करने पर वे लड़के का संदर्भ पूछते है, और बाद में बात करने को कहते है, ४-५ लोगो के सिवाय किसीने भी पलटकर फ़ोन नहीं किया है, जो भी स्थिति हो वैसा उतर देकर सवेदनशील होने का प्रमाण हमें देना चाहिए.
४. मैंने इन साईट पर ऐसी लडकिया देखी जो ३०-४० साल की हो गयी है. इसके बाद भी इनके परेंट्स को नींद कैसे आती है. सोचने को मजबूर करने वाला विषय है .
५. जितनी जरुरत लड़के वालो को है उतनी ही जरूरत लड़की वालो को भी है. यह सामान्य सिधाद्न्त को क्यों नहीं समझा जा रहा है ?
६. माँ -बाप की इकलोती लडकियों की सोच बचपने से अभी भी लबालब है. गंभीरता बिलकुल भी नहीं है, सिर्फ प्याज और लहसुन खाने की आदत दोनों विचार में भिन्नता पैदा कर रही है. देवी देवताओ पर विश्वास नहीं यह भी विचार भेद का कारण है.
मेरे उपरोक्त निष्कर्ष मेरे स्वयं के अनुभव है. यदि यही चलता रहा तो लड़के लड़की दोनों विवाह बंधन के बिना ही जीवन काटेंगे और यह स्थिति समाज के लिए भयावह होगी. लड़के और लड़की वालो से मेरा अनुरोध है कि वे दिशा में सतत प्रयास शील रहे है. हर उस सवाल का जवाब दे जो पूछा गया है. ईश्वर ही विवाह के जोड़े को बनाता मै इसे मानता हूँ , लेकिन प्रयत्न के बिना यह संभव नहीं है ?
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Posted on
Jun
17
2012
Sun
2:13
PM
डॉ केशव रामराव जोशी ------------ मार्गदर्शी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति का दामाद होना प्रारब्धीय योग ह
From Ram Purshottam Kasture

डॉ केशव राम राव जोशी संस्कृत के प्रगाड़ विद्वान थे. ४ भाई और ५ बहिनों माँ और पिता की जिम्मेदारी को निभाकर , नागपुर यूनिवर्सिटी के संस्कृत विभाग के विभाग प्रमुख से निवृत हुये. इस बीच उनका जीवन पढाई और अपनी स्थिति को बनाने के लिये संघर्ष में बिता. शायद संघर्ष करना उनके भाग्य में ही लिखा था. यही कारण है कि उन्हें संस्कृत के विभागाध्यक्ष का पद भी न्यायालय के निर्णय के बाद में ही मिला.
छोटे भाईयो ने बड़े भाई जैसा संघर्ष कर अपना मुकाम बनाया इसका उन्हें हमेशा गर्व था. अपने भाई बहनों को वे हमेशा स्नेह से देखते थे. इनके प्रति इनके मन में सदैव अपनत्व था. भाई और बहनो के लिये श्री जोशी हमेशा श्रद्धा केन्द्र थे. भाई इनकी सलाह से ही कोई बड़ा काम करते थे. कुल मिलाकर परिवार के एक उत्तम मुखिया थे. अपनी आखरी सांस तक उन्होंने परिवार धर्म निभाया.
उनके स्वयं के परिवार में पत्नी सहित ५ बेटिया और एक पुत्र है. बेटा विज्ञान का विद्यार्थी होते हुये भी संस्कृत से अलग नहीं है. बेटियों ने संस्कृत के माध्यम से अपने घर को अलग संस्कार देकर अपने पुत्र और पुत्रियों संस्कारवान बनाकर पिता की शिक्षा को साकार कर पितृधर्म का निर्वहन किया है. आज भी माँ और पिता की शिक्षा को याद रख इस आधुनिक जीवन में कृत्रिम आधुनिकता से दूर है. मेकप के नाम पर चेहरे पर पाउडर का ही उपयोग करती है. जितना भी हो उसमे गुजारा करने की क्षमता उन्हें अपने पिता से मिली है. कम परिवारों में ऐसा देखने को मिलता है.
श्री जोशी ने जीवन में कड़े अनुशासन का पालन किया है. परअन्न नहीं लेना इसी अनुशासन का अंग है. उन्होंने जीते जी इससे कभी समझोता नहीं किया. उनकी पत्नी यात्रा में पोहे का चिवडा साथ रखती थी. सिद्धांत के अनुसार भोजन नहीं मिलने पर यह चिवडा ही उनकी क्षुधा शांत करता था. वे कभी किसी की निंदा नहीं सुनते थे. ऐसा अवसर आने पर या तो वे चर्चा को मोड़ने का प्रयास करते थे या उस स्थान से चले जाते थे. वे इस बात की कभी परवाह नहीं करते थे कि चर्चा में कितने बड़े लोग बैठे है ? . भगवान की पूजा से स्वकर्तव्य से पूजा करने पर उनका भारी विश्वास था. यही वह वजह थी. जिसके कारण उन्होंने अपनी प्रतिकूल परिस्थितियों अपने अनुकूल बनाकर जोशी परिवार के लिये एक आदर्श स्थापित किया. श्री जोशी ने अपनी पूंजी को बाजार में लाकर कभी दुगनी करने का प्रयास नहीं किया. केवल पोस्ट ऑफिस और बेंको पर ही उनका भरोसा था. आज की चकाचौंध भरी जिंदगी, ना तो उन्हें और ना ही उनके पारिवारिक सदस्यों को प्रभावित कर सकी. इन प्रपंचो से दूर रहकर संस्कृत की आराधना में अपना जीवन बिताया. उन्होंने अनेक पुस्तकों का प्रकाशन कराया. इस भाषा को सुलभ बनाने लिये संकृत में बाल नाट्यो का इनका प्रयोग अनूठा है. धारा प्रवाह संस्कृत का प्रयोग ये इस भाषा के विद्वानों से बातचीत में करते थे. स्वभाव से विनोदी थे. बात बात पर गंभीर बातो में विनोद कर उन्हें सरल बनाना उनका स्वभाव था. घरेलु महिला के कांसेप्ट को वे नहीं मानते थे. अपितु वे घर को एक इंडस्ट्री मानकर इस गृहणी को वे हॉउस मेनेजर मानने के लिये कहते थे. इसके पीछे नारी शक्ति को सम्मान देना ही था. आत्मविश्वास से इनका जीवन लबालब था. अनेक जीवन के उनके प्रसंग है जो व्यक्ति के लिये प्रेरणादायक है.
श्री जोशी के संस्कृत के लिये समर्पण और इसके लिये किये कार्यों के कारण उन्हें अनेको सम्मानों से नवाजा गया. भारत सरकार ने भी उनके संस्कृत के लिये किये गये कार्यों की सुध ली और उन्हें मई २०११ में महामहिम राष्ट्रपति ने सम्मानित किया. श्री जोशी के लिये यह सम्मान संभवत अंतिम सम्मान था.
इस मार्गदर्शी व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति का दामाद होना प्रारब्धीय योग है. मेरे लिये यह सौभाग्य है. ऐसे व्यक्ति ने अपनी लंबी बीमारी से संघर्ष कर १२ जून को अंतिम सांस ली. मै उनके परिश्रमी. विद्वान व्यक्तिव को नमन करता हूँ और भाव भीनी श्रधांजलि देता हूँ.
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Posted on
Mar
23
2012
Fri
10:29
AM
विश्व जल दिवस ----------------
From Ram Purshottam Kasture

आज विश्व जल दिवस है. हम अन्य दिनों की भांति इस दिवस को भी मनाकर स्वयम और विश्व की संतुष्टि मानकर अगले साल के लिए भूल जाते है. वास्तव में होना यह चाहिए कि ऐसे दिवस जिनका सम्बन्ध देश और समाज से है, वर्ष भर इन दिनों के महत्व को समझाते हुए जन सामान्य में इन दिनों के बारे में जागरूकता फैलाने का काम किया जाना चाहिए. जल की आज जितनी जरूरत है. उतना नहीं मिल रहा है.एक दिन यह अमृत तुल्य होने वाला है, क्योकि दुरूपयोग हम जादा कर रहे जबकि मेघो और धरती की छाती चीरकर मिलने वाले जल की मात्रा दिनों - दिन कम होती जा रही है ? मेरे आंकलन के अनुसार जल के लिए ही विश्व युध्द होने वाला है , परंपरागत रीती रिवाजो के अनुसार वैसा ही पानी खर्च हो रहा है जैसे हमारी पुरानी पीढियों ने किया है, उस समय जन संख्या भी कम थी , सघन वनों की ओर मेघ आकर्षित हो कर खूब जल बरसाते थे. कुए सरोवर ओर नदिया पानी से लबालब रहती थी. जल बाहुल्य होने के कारण अलग अलग काम के लिए अलग जल का उपयोग होता था, किन्तु आज वनों का नामो निशान नहीं है , जो बचे है मनुष्य उन्हें विनाश की ओर पंहुचा रहा है. इसीकारण मेघो ने भी बरसना बंद कर दिया है. गर्मी के मौसम में अनेक जगह इसके लिए त्राहि त्राहि मचती है . इंदौर में कुछ वर्ष पूर्व जल के लिए हत्या के प्रकरण भी सामने आये है. नगरीय निकायों ने " वाटर हार्बेस्टिंग" नए बनने वाले भवनों के लिए अनिवार्य किया किन्तु यह अनिवार्यता कागज तक सिमट कर रह गयी ? मध्य प्रदेश में पिछले ५ सालो से सरकार बरसात के मौसम में पेड़ लगाने का लक्ष्य सरकारी अर्ध सरकारी तंत्र को दे रही है. बाकायदा बरसात ख़त्म होते तक इसकी सरकार समीक्षा भी करती है. यदि अंको के गणित में जाये तो आज की स्थिति में वृक्षों की संख्या खरबों में होना चाहिए. ढाक के वही तीन पात खोजने से भी इस अभियान के तहत वृक्ष दिखते ही नहीं है. हमने यदि पानी का उपयोग पैसे जैसा नहीं किया तो वह दिन दूर जब इस दिन मनाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी. हम जल के प्रति वास्तव में गंभीर है, तब हमें हर त्यौहार पर एक वृक्ष लगाने का संकल्प लेकर उसका पालन पोषण एक बच्चे जैसा करने प्रण किया जाना चाहिए. अनेक संगठन इस विषय पर जोर शोर से काम कर रहे है . उनकी भी सहायता ली जा सकती है. हमारे द्वारा लगाये गए वृक्षों की नुमाइश हमारे मेहमानों को कराते रहने से इनकी प्रकृति की देख भाल होते रहेगी. मैने इस वर्ष करीब १००० वृक्ष अपने खेत पर जुलाई में लगाने का संकल्प लिया है, ओर इनको वन का रूप देने की भी व्यवस्था कर ली है. क्या आप वृक्ष लगाकर हमारी नयी पीढ़ी के जल सुरक्षित रखेंगे यही देश ओर समाज की सबसे बड़ी सेवा होगी.
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Posted on
Dec
31
2011
Sat
1:58
PM
नया वर्ष
From Ram Purshottam Kasture
मेरे कुछ फेस बुक मित्रों को नयी साल की शुभ कामनाये स्वीकार करने में कठिनाई हो रही है, इसका मुझे दुःख है, कोई भी धर्म हो सबका आदर करना हमारी संस्कृति हमें सिखाती है, चाहे अंग्रेजो के नये वर्ष पर शुभ कामनाये देने की बात हो या किसी के धर्म स्थल पर जाने की. हमारी उदार वादी परम्परा हमें इन सबके लिए अनुमति देती है. अंग्रेजो के नये वर्ष से क्यों इतराज होना चाहिए जबकि उनकी भाषा सडको से हमारे घर और दिमाग में प्रवेश कर गयी है. हिंदी के २-३ वाक्यों के साथ ५-१० अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग हमारे लिए सहज हो गया है. टाटा और गुड मोर्निंग हमारे रोज उपयोग में आने वाले शब्द है. हर वाक्यों के अंत में OK कहना हम नहीं भूलते. परिधान में भी हम अंग्रेजो से पीछे नहीं है. लगभग वही परिधान हमारे लिए उपयोगी होते जा रहे है जिनका उपयोग अंग्रेज करते है. शादी ब्याह में पंगत की जगह बफे ने ले ली है. ये सब तो हमारी संस्कृति के अंग नहीं है उसके बाद भी हम इन्हें अंगीकृत कर रहे है. क्योकि इनमें सुविधा का गुण है. इसीलिए ये हमें स्वीकार्य है. जब सारी बाते हमारे जीवन का अंग होते जा रही है, तब इनके वर्ष का स्वागत करने में तकलीफ क्या हो सकती है ? स्वागत करके हम हमारी उदार वादी परम्परा का निर्वहन ही तो कर रहे है. अंग्रेजो द्वारा दी गयी सब बातों का त्याग करने के बाद ही हम इनके नये वर्ष को भूल सकते है. सच यह है कि हम हर बात में सुविधा देखने के आदी हो चुके है. इसीकारण जो सुविधाजनक लगता है , उसे स्वीकार कर लेते है, फिर वह किसी भी धर्म या जाति से समन्धित क्यों न हो, ऐसा करना कोई पाप भी नहीं है. भारतीय जनता पार्टी को हिन्दुवादी पार्टी माना जाता है, इनके द्वारा शाषित राज्यों में बड़े दिन के लिए १ सप्ताह का अवकाश स्कूलों में दिया जा रहा है, इसी बहाने राज नेता का परिवार नया साल मनाने के लिए कही और स्थान पर प्रयाण कर लेता है, क्या यही हिन्दुवादी छवि है ? इस बात में भी सुविधा को प्राथमिकता दी गयी है. किसी से उसकी जन्म तिथि पूछने पर वह ५ जुलाई बताता है. कोई भी हिंदू महीने को नहीं बताता. जन्म दिन भी तिथि के अनुसार नहीं तारीख के अनुसार मनाया जाता है. ऐसे में नया साल मनाने में क्या आपति हो सकती है ?? आपके अमूल्य मत का अभिलाषी हूँ.
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Posted on Monday, January 09, 2012 8:23:57 AM
From Kailash Choudhary
मेउम ालं इनतंप ींपद ण् ंइ चनतप कनदपलं ाप मा ीप ेंदेातंजप ींपद इंाप ेंइ तंरदपजप ाप इंींे लं कवहसंचंद ींपद ण् ंर ींउंतं ेंइ ानबी लंदप चंीदंूंएहींत ां ेंउंद ऐंइीपप ेंकींद इींतजपलं दंीप ींपद जव चीपत ेंदेातंजप ां रींहकं ांनदण् ींचचल दमू लमंत 2012
Posted on
Dec
24
2011
Sat
12:51
PM
माँ
From Ram Purshottam Kasture
एक दिन नित्य कर्म छूट जाए. पेट के साथ शरीर भी भारी भारी लगता है. गर्भस्थ महिला 1/2 से 3-4 kg वजन का टुकड़ा 9 महीने पेट में रखती है, वह ना तो पेट भारी लगने की शिकायत करती है और ना ही उसके शरीर में वेदना होती है. 9 महीने की इस अवधि में पेट में पल रहे बच्चे के साथ माँ का सतत संवाद चलते रहता है. जन्म के कुछ महीने बाद विभिन्न प्रकार के स्वाद चखाकर जीवन में भोजन का आनंद लेना सिखा देती है. रहन सहन आचार विचार का पाठ भी पढ़ा देती है. माँ विहीन बच्चे ये सब नहीं सीख पाते. यही वजह है कि ऐसे बच्चे ना खाने , पहनने और ना घूमने फिरने की जिद करते है. माँ की ममता ही बच्चों को सब सिखने पर मजबूर कर देती है साथ ही बिना ममत्व के सारा संसार शून्य सा लगता है.
www.humaramadhyapradesh.com
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Posted on
May
9
2011
Mon
5:15
PM
humaramadhyapradesh (हमारा मध्यप्रदेश)
Modified on
May
9
2011
Mon
6:59
PM
From Ram Purshottam Kasture




इस प्रदेश का जन्म १९५६ में हुआ था, यह प्रदेश आजादी के बाद सी पी एंड बरार के अंतर्गत आता था । प्रदेश के पहले मुख्य मंत्री बनाने का सौभाग्य पंडित रविशंकर शुक्ल को मिला था, इनका कार्यकाल १.११ १९५६ से ३१.११.१९५६ तक मात्र ३१ रहा । वर्तमान में इस प्रदेश में ५० जिले है। प्रदेश का क्षेत्रफल ३०८१४४ वर्ग किलोमीटर है । २०११ की जनसँख्या के अनुसार प्रदेश के जनसँख्या ७,२५,९७,५६५ जो २००१ के तुलना में २४.३४% अधिक है। प्रदेश की राजधानी भोपाल है और प्रदेश का सबसे बड़ा शहर इंदौर है। जहाँ भोपाल अपनी खूबसूरती के लिए जाना जाता है वही इंदौर प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी कही जाती है । पिछलें पांच वर्षो में भोपाल सहित सभी नगरो का विकास बहुत तेजी के साथ हुआ है । इसके पीछे वर्तमान सरकार द्वारा शहरो को मुक्त हस्त से अनुदान देना और केंद्र सरकार की JNNURM योजना है । वर्तमान में लगभग पिछले ६ सालो से प्रदेश के मुखिया श्री शिवराज सिंह है। वे अपनी सरल छवि और बेबाक टिप्पणी के लिए जाने जाते है। युवा होने के कारण प्रदेश का मेराथन दौरा करते रहते है। इस कारण प्रदेश की हर तबके की नब्ज पर इनकी पकड़ मजबूत है । संक्षेप में यह कहा जाये कि प्रदेश का सच्चा विकास इनके के कार्यकाल में हो रहा है , तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
प्रदेश से नर्मदा ,सोन, सिंध , बैनगंगा चम्बल , बेतवा , केन धसान ,तवा और ताप्ती आदि नदिया बहती है । इनमे में से नर्मदा और ताप्ती का उदगम मध्य प्रदेश के क्रमशः अमरकंटक और मुलताई से ही हुआ है । इन दोनों स्थानों को वर्तमान सरकार ने पवित्र नगर घोषित किये है। वैसे प्रदेश में लगभग १५-२० पवित्र नगर है । पवित्र नगरो की सीमा से ५ किलोमीटर की परिधि में मांस और मदिरा का विक्रय नहीं हो सकता । नर्मदा तो प्रदेश की जीवनदायनी विख्यात है । भोपाल से ७५ किलोमीटर की दुरी पर होशंगाबाद से होकर यह नदी बहती है । वर्तमान सरकार इस शहर के समीप से भोपाल के लिए पानी ला रही है, इसका अधिकांश काम ख़त्म हो गया है और संभवतः जून में नर्मदा नदी का जल नियमित रूप से मिल सकेगा । चम्बल का जल तो पुरे देश में विख्यात है ।चम्बल के आसपास के लोग क्षेत्र कि भोगोलिक परिस्थिति के कारण बन्दुक रखना अपनी आन बान और शान समझते है । ग्वालियर संभाग के लोग खेती के लिए चम्बल पर ही निर्भर रहते है।
प्रदेश में अनेको दर्शनीय स्थल है, जिनमे से खजुराहो तो विश्वविख्यात पर्यटक स्थल है। अन्य पर्यटन स्थलों में होशंगाबाद जिले में पचमढ़ी, रायसेन जिले भीमबैठका और भोजपुर, भोपाल में भारत भवन, ताज-उल मस्जिद , राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, लक्ष्मी नारायण मंदिर, ग्वालियर, मंडला,जबलपुर,धार पन्ना और टीकम गढ़ जिले में अनेक दर्शनीय स्थान है। जिनकी दूर दूर तक प्रशंसा होती है, हजारो पर्यटक इन स्थानों को देखने के लिए मध्य प्रदेश आते है । मध्य प्रदेश का पर्यटन विभाग भी पर्यटकों को लुभाने के लिए अनेको सुविधाए दे रहा है । मध्य प्रदेश का पर्यटन विभाग इस सरकार के पहले लगभग सुप्त अवस्था में था, जिसे इस सरकार ने जाग्रत कर आर्थिक रूप से अत्यधिक प्रभावशाली और कुशल बना दिया है ।

मध्य प्रदेश की संस्कृति

१ मालवा
मालवा महाकवि कालीदास की धरती है। यहाँ की धरती हरी-भरी, धन-धान्य से भरपूर रही है। यहाँ के लोगों ने कभी भी अकाल को नहीं देखा । विन्ध्याचल के पठार पर प्रसरित मालवा की भूमि , श्यामल, सुन्दर और उर्वर तो है ही, यहाँ की धरती पश्चिम भारत की सबसे अधिक स्वर्णमयी और गौरवमयी भूमि रही है। इस क्षेत्र के लोग समृद्ध है, इनके व्यवहार प्रेम भाव दीखता है। राजस्थान से इसकी सीमाए जुडी होने के कारण राजस्थान की संस्कृति का समावेश इस क्षेत्र में हो गया है ।

२ बुंदेलखंड
एक अवधारणा के अनुसार "वह क्षेत्र जो उत्तर में यमुना, दक्षिण में विंध्य श्रेणियों, उत्तर-पश्चिम में चंबल और दक्षिण पूर्व में पन्ना, अजमगढ़ की श्रेणियों से घिरा हुआ है, बुंदेलखंडके नाम से जाना जाता है। बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश के चार जिले- जालौन, झाँसी,हमीरपुर और बाँदा तथा मध्यप्रेदश के पाच जिले- सागर ,दतिया, टीकमगढ़, छतरपुरऔर पन्ना जिलो का समावेश है । यह क्षेत्र पिछड़ा क्षेत्र होने के कारण गरीबी जादा है। बुंदेलखंड के लोग काम की तलाश में देश कई भागो में मिल जाते है । वर्तमान सरकार ने बुंदेलखंड के विकास के लिए एक प्राधिकरण का गठन किया है । उतरप्रदेश के संकृति की झलक इस क्षेत्र में देखने को मिल जाती है ।
३ निमाड़
निमाड़ मध्यप्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित है। इसकी भौगोलिक सीमाए एक तरफ़ विन्ध्य की शैल श्रृंखला और दूसरी तरफ़ सतपुड़ा , जबकि मध्य में है नर्मदा से जुडी है । पौराणिक काल में निमाड़ अनूप जनपद कहलाता था। बाद में इसे निमाड़ के नाम से जानते है । निमाड़ के दो भाग है पूर्वी और पश्चिमी निमाड़ । पूर्वी निमाड़ महारास्ट्र की सीमाओ से जुड़ा होने के कारण इसकी संस्कृति में महाराष्ट्र की छवि दिखती है। इस क्षेत्र के लोग सरल स्वभाव के है, इनका मुख्य धंदा खेती है ।

४ बघेलखण्ड
बघेलखण्ड की धरती का सम्बन्ध अति प्राचीन भारतीय संस्कृति से रहा है। यह भू-भाग रामायणकाल में कोसल प्रान्त के अन्तर्गत था। महाभारत के काल में विराटनगर बघेलखण्ड की भूमि पर था, जो आजकल सोहागपुर के नाम से जाना जाता है। भगवान राम की वनगमन यात्रा इसी क्षेत्र से हुई थी। यहाँ के लोगों में शिव, शाक्त और वैष्णव सम्प्रदाय की परम्परा विद्यमान है। यहाँ नाथपंथी योगियो का खासा प्रभाव है। कबीर पंथ का प्रभाव भी सर्वाधिक है। इस क्षेत्र में गरीबी बहुत है । इस कारण यहाँ के लोग देश के सभी हिस्सों में काम करते हुए दिखते है ।

५ ग्वालियर

मध्यप्रदेश का ग्वालियर क्षेत्र भारत का वह मध्य भाग है, जहाँ भारतीय इतिहास की अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाये घटित हुई हैं। सांस्कृतिक रुप से भी यहाँ अनेक संस्कृतियों का आवागमन और संगम हुआ है। राजनीतिक घटनाओं का भी यह क्षेत्र हर समय केन्द्र रहा है। १८५७ का पहला स्वतंत्रता संग्राम झाँसी की वीरांगना रानी महारानी लक्ष्मीबाई ने इसी भूमि पर लड़ा था। सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र ग्वालियर अंचल संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, चित्रकला अथवा लोकचित्र कला हो या फिर साहित्य, लोक साहित्य की कोई भी विधा हो, ग्वालियर अंचल, में एक विशिष्ट संस्कृति के साथ नवजीवन पाती रही है। ग्वालियर क्षेत्र की यही सांस्कृतिक हलचल उसकी पहचान और प्रतिष्ठा बनाने में सक्षम रही है। ग्रामीण क्षेत्र के लोग उखड़े स्वभाव के होते है। अनेक बड़े बड़े डाकुओ का जन्म इसी क्षेत्र में हुआ है ।अब डाकुओ का उतना भय नहीं है ।

विशेष
मध्य प्रदेश पर केन्द्रित यह वेब साईट अभी अभी बनी है, इस साईट पर मध्य प्रदेश के स्थापना से लेकर आज तक पदासीन रहे राज्यपाल, मुख्य मंत्रियो के बारे में जानकारी दी गयी है। मध्य प्रदेश में संचालित जन हितेषी योजनाओ की जानकारी के साथ प्रदेश के जिलो का विवरण भी दिया गया है। अनेक प्रकार के केलकुलेटर , सब्जियों ,फलो तथा दादा दादियो के नुस्खे भी बताये गए है । सभी बड़े अधिकारियो के टेलीफोन के नम्बर इस साईट प्राप्त होंगे । संक्षेप में मध्य प्रदेश राज्य से जुडी छोटी मोटी जानकारी साईट www.humaramadhyapradesh.com पर उपलब्ध कराई गयी हैं ।

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Posted on
Feb
27
2011
Sun
4:17
PM
निंदा या प्रशंसा
Modified on
Feb
27
2011
Sun
4:21
PM
From Ram Purshottam Kasture
111111111
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Posted on
Feb
27
2011
Sun
4:14
PM
no text
Modified on
Feb
27
2011
Sun
4:22
PM
From Ram Purshottam Kasture
after some time
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Posted on
Feb
12
2011
Sat
4:07
PM
किसानो की आत्महत्या -----------------------
From Ram Purshottam Kasture
मेरा बचपन ग्रामीण परिवेश और काश्तकारो के बीच बिता ! पिताजी का व्यवसाय खेती था, इस कारण काश्तकारो से मेरा जीवंत संपर्क रहा ! यह संपर्क आज भी कायम है ! मध्य प्रदेश में हो रही काश्तकारो की आत्महत्याओ ने मुझे गुजरे ज़माने को याद करने पर मजबूर कर दिया !
६० के दशक के किसान पूरी तरह से खेती में ही अपना समय बिताते थे ! बैल जोड़ी उनकी देवता थी ! उस समय कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बैल जोड़ी हुआ करता था ! उन दिनों चुनाव चल रहे थे, तब मैंने गाँव के एक किसान से पूछा " काका इस चुनाव में वोट किसे दोगे" ? काका का उतर था "हम सब गाँव के लोग बैल जोड़ी को वोट देंगे , उनका कहना था की बैल जोड़ी के कारण ही हम अपना पेट पाल रहे है ! जहा भी बैल जोड़ी होंगी वहा हम होंगे" उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि कोनसी पार्टी राज करेगी ? इसका भरपूर फायदा कांग्रेस ने उठाया वर्ष १९७७ तक एक छत्र राज्य किया, किसी भी दल को उभरने नहीं दिया ! इस अवधि में कांग्रेस ने किसानो के लिए कोई उल्लेखनीय कार्य किया हो ऐसा मुझे याद नहीं है ! किसान जैसा था वैसा ही रहा ! १९७७ में गैर कांग्रेसी सरकार बनी, अन्य दल अस्तित्व में आये किसानो को लुभाने और अपने पक्ष में करने के लिए होड़ लग गयी अनेक रियायते किसानो को दी गयी, उनके लिए अनेक वितीय निर्णय लिए गए ! यही चूक हुई और यही वितीय निर्णय किसानो के लिए दुखदायी बने !
६०के दशक में बैंक से बड़ी कठिनाई से लोन मिलता था ? इस दशक में एक किसान ने भूमि विकास बैंक से ५०००.०० रुपयों का कर्ज मोटर पम्प लगाने के लिए लिया था ! १९६२ से १९८६ के बीच में इस किसान ने कर्ज कि कई किश्ते चुकाई लेकिन दिसम्बर १९८६ में इस किसान के खाते में १५०००.०० का ऋण दर्ज था, मैंने इस काश्तकार से कहा कि अगली गेहू कि फसल में आप पूरा कर्जा पटा दो नहीं तो तुम्हारी जमीन बैंक वाले बेच देंगे , इस काश्तकार ने ऐसा ही किया ! इस ऋण के बाद इस किसान ने बैंक से कर्जा नहीं लिया ! वो खेती के लिए पैसे नहीं होने पर अपनी पत्नी के गहने साहूकार के पास गिरवी रखता था, और फसल आने पर गहने छुड़ा लेता था ! एक साहूकार ने उसकी पत्नी कि सोने कि चुडिया इसलिए वापस नहीं की थी क्युकी उसने सही समय पर चुडिया नहीं छुड़ाने के कारण बेच दी थी , जब इस किसान के पढ़े लिखे बेटे को यह बात पता लगी तब उसने साहूकार से बात की और उसकी माँ की चुडिया मांगी इसके लिए साहूकार को वह मुहमांगी राशी देने को तैयार था ! साहूकार ने उसे अपनी मज़बूरी बताई और कहा की आज बाजार में सोने के जो भाव है उसमे में कर्जे की राशी ब्याज सहित काटकर वह दे सकता है ? किसान के लड़के के पास इसके सिवाय कोई विकल्प नहीं था,
लड़के ने उसकी यह बात स्वीकार कर ली ! साहूकार ने किसान को ५०००.०० की राशी वापिस की और मामला दोनों और से ख़त्म हो गया ! संक्षेप में मै यह कहू की उस समय के काश्तकारो का सरकारी बेंको से जादा विश्वास साहुकारो पर था ! साहूकार अपनी इज्ज़त और प्रतिष्ठा को दाव पर नहीं लगने देता था ? बीच बचाव के बाद दोनों पक्ष मामले का हल खोज लेते थे ! दोनों की नियत साफ होने के कारण उनका यह संबध बना रहा कही कही तो यह संबध आज भी दोनों क़ी राजी ख़ुशी से चल रहा है ! मेरे विचार से किसानो क़ी दुर्दशा के लिए सहकारी बेंक जादा जवाबदार है ! इन्हें किसानो के हित के मामलो से दूर रखना होगा !
१९६० के दशक में किसानो के पास आज की अपेक्षा सुविधाओ की कमी थी ! इसीकारण इस दशक का किसान हमेशा अपनी खेती में व्यस्त था, लेकिन आज के किसानो के पास जोतने के लिए ट्रेक्टर , सिचाई के आधुनिक साधन होने के कारण महीनो का काम कुछ ही दिनों में पूरा कर लेता है ! शेष समय कैसे गुजारे ? यह उसकी समस्या है ! इन सुविधाओ के बाद भी पहले के किसानो की तुलना में आज का किसान खेती के प्रति उदासीन दिखता है ! मध्यप्रदेश की वर्तमान सरकार ने किसानो के हित में कई उलेखनीय फैसले लिए है, आज के किसानो ने सरकार की सुविधाओ का भरपूर दोहन किया है ? और उनकी यही गलती उनको मरने के मजबूर कर रही है ? आज के किसान के पास मोटर साइकिल है घर में सब प्रकार के भौतिक सुविधाए है ! समय भी है, मुझे किसानो क़ी इस उन्नति से कोई इर्षा नहीं है ! इर्षा तो तब होती जब किसान अपनी मेहनत से कार से चलता ! किसानो क़ी यह उन्नति भविष्य के स्वर्णिम मध्य प्रदेश के लिए अमूल्य उपहार होता !
समय को काटने के लिए वह मोटर सायकिल से शहर भी घूम रहा है, कर्जे के पैसे से पेट्रोल और गाड़ी का उपयोग कर रहा , पैसे है इसलिए दारू भी पी रहा है ? बोरियत मिटाने के कभी जुआ और अन्य काम भी कर लेता है,इन दुर्व्यसनो के कारण खेती क़ी ओर आज के किसान उदासीन हो गया है ! संबधित अधिकारी के साथ मिलकर खेती के नाम पर लिए गए कर्जो का दुसरे कामो में उपयोग कर रहा है ! खेती क़ी ओर ध्यान नहीं देने के कारण फसल भी साथ नहीं दे रही है,रासायनिक खादों से जमीन कि उर्वरा शक्ति भी कम होते जारही है ? आवक नहीं होने के बाद भी अंधाधुन्द खर्चे हो रहे है?इस स्थिति में आत्म हत्या के सिवाय बचता भी क्या है ? पिछले वर्ष प्रकर्ति क़ी कृपा से गेहू क़ी बम्फर पैदावार हुई , सोयाबीन भी अधिकांश क्षेत्रो में उम्मीद से जादा पका , इसके बाद भी कर्ज के कारण आत्महत्या करना यक्ष प्रश्न बना हुआ है ? केंद्र सरकार क़ी कम काम के बदले जादा पैसे देने क़ी योजनाओ ने इन किसानो को धरती माता से दूर करने में महती भूमिका निभाई है ? किसानो क़ी इन वारदातो के कारण हमारे मुख्य मंत्री जी मेराथन दौरे कर रहे है , जितने हो सके खेतो में जा रहे है किसानो क़ी समस्याओ को सुन रहे है ! अफसरों को किसानो क़ी स्थिति सम्हालने के कठोर निर्देश भी दे रहे है ! उनका यह प्रयास प्रशसनीय है , लेकिन फिर भी हालत काबू में नहीं हो रहे है ! हमारे मुख्य मंत्री जी केंद्र के किसानो के रूखे व्यवहार के कारण १३ फरवरी से उपवास पर बैठ रहे है !किसानो के हित में माननीय मुख्य मंत्री को मेरे निम्न सुझाव है :-
१ किसानो को सस्ती दर पर कर्ज नहीं दिया जाय ! ताकि किसान इस सुविधा का दुरूपयोग नहीं कर सके !
२ किसानो के कर्जे माफ़ नहीं किये जाये! इससे किसान कर्ज लेने के प्रवर्ति से बच सकेंगे !
३ किसानो क़ी क्रेडिट कार्ड क़ी सुविधा बंद क़ी जाये ! ताकि किसान जब चाहे तब राशी निकालने से बच सकेंगे !
४ किसानो को दी जाने वाली सभी प्रकार क़ी सब्सिडी बंद क़ी जानी चाहिए !
५ फसल बीमा योजना को अनिवार्य किया जाये ! किसानो के इस बीमे के प्रीमियम की राशी सरकार वहन करे ! इससे प्राकृतिक आपदाओ से फसल के नुकसान के लिए अलग से मुवावजा नहीं देना होगा !
६ किसानो की प्रतिदिन की समस्याओ को हल करने के लिए हर विकास खंड पर किसान संरक्षण प्रकोष्ठ बनाया जाये
७ किसानो को उनकी उपज का , बाजार मूल्य से चौगुना मूल्य किसानो के लिए नियत किया जाये ! इससे किसानो में अधिक से अधिक फसल पैदा करने की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी वही समय का दुरूपयोग भी किसान नहीं कर पाएंगे !

मेरी द्रष्टि में इन उपायों से निश्चित ही कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे ! इन परिणामो को आने में समय लग सकता है ! किसान आत्म निर्भर बनेगा ! जैविक खेती से धरती माँ के उर्वरा शक्ति पुन्ह वापिस लायेगा !

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Posted on
Jan
5
2011
Wed
9:16
AM
ग्रहों का खेल
Modified on
Jan
5
2011
Wed
2:23
PM
From Ram Purshottam Kasture
मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार की समस्याए आती है इन समस्याओ से उसे जूझना पड़ता है ! जीवनकाल, अनेक उतार चढावो से पूर्ण होता है ! कभी सुख कभी दुःख कभी अन्य परेशानियों को ही जीवन का नाम दिया गया है! इन समस्याओ का सामना करने पर यदि सफलता मिलती है तब ख़ुशी मनाई जाती है यदि असफलता हाथ लगती है तब मनुष्य दुखी हो जाता है !
किसी ने कहा है कि "सफलता सार्वजनिक उत्सव है जबकि असफलता व्यक्तिगत त्यौहार" !

दुःख के समय सारा दोष भगवान् के सर मढ़ देने का हमारा स्वभाव है ! यदि इसमें भी संतोष नहीं मिलता है ! तब जिनके द्वारा संकट पैदा किया गया है उन्हें कोसने में हम अपनी साड़ी सकारात्मक ऊर्जा खर्च कर देते है ! हम कभी यह सोचने का साहस नहीं करते की संकट क्यों आया है ? यदि ख़ुशी या अच्छा समय भगवान की देन है, तब संकट या बुरे समय में भगवान की देन को मानने के लिए हम क्यों तैयार नहीं रहते?
मेरे विचार से प्रारब्ध और कुछ नहीं हमारे जन्म कुंडली में भगवान द्वारा बैठाये गए ग्रह है जिन्हें अपना.अपना काम करने की छूट भगवान ने दे रखी है ! वे जब अपना काम करते है तब ख़ुशी या संकट का मनुष्य को अहसास कराते है ! ख़ुशी या संकट की तीव्रता को कम करने के उपाय ज्योतिषी द्वारा बताये तो जाते है किन्तु इनके प्रभाव को ख़त्म करने के उपाय नहीं बताये जाते है ! संक्षेप में ख़ुशी, दुःख, संकट, आफत और परेशानी ग्रहों का खेल है ! इस खेल में मनुष्य को धैर्य रखते हुए किसी पर भी दोषारोपण से बचना चाहिए क्योकि यह प्रारब्ध में लिखा है !

छह महीने पहले मेरे मित्र को झूटी शिकायत के आधार पर मंत्रालय से हटाया जाकर संचालनालय में पदस्थ किया गया है ! उस समय से आज दिन तक वह यह नहीं समझ पाया है कि उसका इस तबादले के पीछे क्या पाप है ?

अनेको ने अनेको विचार से उसे समझाने का प्रयास भी किया, किन्तु वह अवसाद से नहीं निकल पाया ! किसी ने ज्योतिषी के पास जाने की सलाह दी किसी ने विपत्ति के समय शांत और धैर्य रखने की सलाह दी ! वैसे ऐसे समय में सलाह देने वालो की कमी नहीं रहती ! किसी ने इसके बाद अच्छा समय आने की भविष्यवाणी की, तो किसी ने ज्योतिषी के पास जाने का आग्रह किया! मेने भी उसकी जन्म पत्री कई ज्योतिषीयो को दिखाई ! सभी ज्योतिषीयो ने राहू की अन्तर्दशा को इस घटना के लिए जिम्मेदार बताया ! किसी ने नीलम पहनने की सलाह दी तो किसी ने राहू के मंत्र का जाप कर राहू को शांत करने का उपाय सुझाया ! ज्योतिषी श्री दुबे ने बड़े आत्मविश्वास से यह सब ना करते हुए गौ माता की सेवा करने को कहा ! यह सलाह उसे अच्छी लगी ! वह पिछले वर्ष की जुलाई २३ से निरंतर गौ सेवा कर रहा है! इसका उसे लाभ भी मिला ! जो मित्र उससे बात करना पसंद नहीं करते थे, वह आत्मीयता से बात कर रहे है ! अनेको जटिल मसलो पर उससे सलाह मांग रहे है ! यह सब एक दिन की सेवा से नहीं हुआ अपितु इस स्थिति को बनने में पूरे पांच महीने लग गए ! आठ महीने बिना काम के रहा! आज की स्थिति में उसे छोटा.मोटा काम भी मिला ! इस सेवा में उसका आत्म विश्वास तो बढाया ही है साथ ही काम नहीं मिलने की चिंता से भी उसे मुक्त रखा है !
ज्योतिषीजी ने कुछ दिन बाद उससे कहा कि आपको २६ अक्टूबर २०१० से २६ दिसंबर २०१० तक स्वास्थ्य के प्रति बहुत ज्यादा चिंतित रहना है ! उसने उनसे इसका कारण भी पूछा तब उन्हीने बताया की राहू की अन्तर्दशा में केतु की प्रत्यंतर दशा चलेगी जो शारीरिक कष्ट का कारण बनेगी, और बताया की गौ माता इस स्थिति को भी सहज कर देगी ! हुआ भी ऐसा ही ! केतु की प्रत्यंतर दशा लगने के पहले ही एक ऑटो ने अपने पिछले भाग से उसे टक्कर मारी, इस टक्कर में उसकी कोहनी पर जखम भी हुआ और पसली में गुप्तमार भी लगी ! आठ.दस दिनों में यह हादसा भी सामान्य हो गया ! इन दिनों में भी उसकी गौ सेवा निरंतर रही!
नवम्बर के अंतिम सप्ताह में उसे रात में अचानक लूज मोशन होना शुरु हुए और तेज बुखार आया ! यह कष्ट भी ०३-०४ दिन में दूर हो गया ! उसने तेज बुखार में भी गौ सेवा में वाधा नहीं आने दी ! केतु की प्रत्यंतर दशा निकलने के बाद ही कुछ और काम मिलने का सिलसिला शुरु हुआ! अब शुक्र की प्रत्यंतर दशा चल रही है जो ज्योतिषीजी श्री दुबे के अनुसार उसके लिए अच्छी है ! श्री दुबे ने बताया की जब आदमी का समय खराब आता है तब आदमी परेशान रहता है ! और अच्छे समय में आदमी के बिगड़ने के अवसर ज्यादा होते है,इशारा उसकी और था! उन्होंने आश्वस्त किया कि उसके साथ ऐसा नहीं होगा क्यूकि जो सेवा आप कर रहे है उसके कारण गौ माता ऐसा नहीं होने देगी !
ज्योतिष में ग्रहों का खेल बहुत महत्वपूर्ण माना गया है ! कोई भी ज्योतिषी इस खेल को बंद करने का उपाय नहीं बना सकता अपितु होने बाले कष्टों की तीव्रता को कम करने के लिए सुझाव दे सकते है ! ग्रहों के खेल ने भगबान श्री राम, कृष्ण रावण आदि को भी नहीं छोड़ा है ! राम को वनवास जाना पड़ा जबकि महाबली रावण की राम के हाथो पराजय हुई ! इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिल जायेंगे !
ऐसा भी नहीं की ग्रह कष्ट देते है ! विपत्ति में अपने पराये का बोध भी कराते है आपका हमारा मार्गदर्शन भी करते है ए भगवान के प्रति आस्था बढाते है ! मेरा निश्चित रूप से यह मानना है कि ग्रहों के खेल को नियंत्रित करने के लिए गौ माता की अहम् भूमिका हैए ३३ करोड़ देवी देवता को अपने शरीर में रखकर ग्रहों के बिपरीत प्रभाव को नियंत्रित करती है जैसा कि मेरे मित्र के साथ हुआ है !
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Posted on
Oct
17
2010
Sun
10:29
PM
सत्य असत्य
Modified on
Oct
17
2010
Sun
10:36
PM
From Ram Purshottam Kasture
विजया दशमी आपको हम सब को हमेशा विजय श्री दिलाती रहे यही इश्वर से प्रार्थना है !

सत्य की जीत होती रहे, असत्य हमेशा हारता रहे !

यह भी सही है कि सत्य कभी हारता नहीं है !

लेकिन सत्य को सत्य बताने के लिए भी सहारे कि जरुरत न पड़े ?

क्युकी एक सत्य को ३० बार झूट बोलो तो सत्य भी झूट बन जाता है ?

सत्य को सत्य बताने कि जरुरत क्यों है ?

इसलिए कि झूट का बोलबाला है ?

हर जगह खोटे सिखे चल रहे है ?

असली सीखे को कोई पहचान नहीं रहे है ?

असली नकली बन जाता है,

लोग विचलित है, जिसको असली समझो वही नकली निकलता है !

हर नकली भस्मासुर हो रहा है ?

हमारी जड़े खुद खोद रहा है !

क्या करे यही समझ में नहीं आ रहा है ?

असली नकली के भेद में हम क्या है ? यही भूल रहे है ?

जो जैसा कहता है मान रहे है ?

इन सब का भी चेहरा सामने आगया है ?

अपना भाग्य खुद बनाकर अपना रास्ता खुद ही बना रहे है ?

अच्छे दोस्त मिल रहे है ? रास्ता भी बन रहा है ?

भविष्य सुखद हो यही कामना है !

सभी दोस्तों को शुभ कामनाये !
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Posted on Monday, November 15, 2010 6:00:12 PM
From Kailash Choudhary
दिपावली की हार्दिक शुभकामनायें..............
Posted on Tuesday, November 02, 2010 10:23:51 PM
Modified on Tuesday, November 02, 2010 10:29:16 PM
From Kailash Choudhary
it is very hard to find hidden truth.......between fake and false .....nice blogging ..keep it up ...sir
Posted on
Sep
13
2010
Mon
5:56
PM
वैभवशाली
Modified on
Sep
13
2010
Mon
6:07
PM
From Ram Purshottam Kasture
धार्मिक आयोजनों में अनेक कथाओ के साथ गौमाता की भी कथा बताई जाती है ! गो कथा के बिना धार्मिक आयोजन पूर्ण नहीं माना गया है ! गाय को ब्रह्मा जी पुत्री भी कहा गया है !
भगवान सूर्य की किरणों में से गो नामित किरण गो माता शोषित करती है ! यही कारण है कि गाय के उत्पादित पदार्थो में सूर्य के तेज के साथ साथ सोना भी रहता है ! एक गाय को सवा मन सोना ले कर चलने वाला प्राणी बताया गया है !
हमारे घरो में गाय के लिए नैवेध्य निकाले बिना भोजन नहीं किया जाता है ! हमारे द्वारा किये जाने वाला हर धार्मिक अनुष्ठान गाय के द्वारा उत्पादित उत्पाद के बिना संभव नहीं है ! हवन गाय के कन्डो और घी के साथ ही पूरा होता है ! गाय का दूध मधुर,शीतल, दुग्ध को बढाने वाला,स्निग्ध, वात पित नाशक बताया गया है !
गाय का दोपहर में पिया गया दूध बल वर्धक ,कफनाशक, पित नाशक के रूप में वर्णित है, वही रात्रि में पिया गया दूध बालक के शरीर को बढ़ाने,क्षय,नाश, बूढों के शरीर में तेज उत्पन करने वाला प्रमाणित किया गया है ! गाय का दही अग्नि को प्रदीप्त करने वाला, विषम ज्वर,अतिसार, अरुचि,कमजोरी,,बल और शुक्र को बढ़ाने वाला प्रतिपादित किया गया है ! घी दवाई के रूप में भी उपयोगी है ! अभी कुछ दिन पहले हुए शोध के आधार पर यह घी शरीर में बढे कोलेस्ट्रोल को कम करता है, अनेक डाक्टरों ने इसकी पुष्टि भी की है ! क्षीण होते जा रहे योवन को बलशाली बनाने के लिए गाय के अधिकाधिक पुराने घी की एक बूंद को ही पर्याप्त बताया गया है ! आयुर्वेद में इस घी को "कांति और स्मृति दायक, बलकारक , पुष्टिकारक, वात कफ नाशक, श्रम निवारक , पित नाशक, अग्निदीपक, पाक में मधुर,शरीर को स्थिर रखने वाला, भाग्य से मिलने वाला पदार्थ और सभी उपलब्ध घी से बलशाली है" का वर्णन किया गया है ! गोमूत्र को आयुर्वेद में कटु, तीक्ष्ण और उष्ण वात कफ नाशक बताया गया है वही इसका प्रयोग शूल, उदर रोग, कंडू,नेत्र रोग,मुख रोग, वात रोग, कुष्ठ, श्वास रोगों में करने के लिये उतम औषधि है ! कर्ण शूल को नष्ट करने के लिए कान में गो मूत्र डालने कि सलाह भी दी गयी है! गाय का गोबर विष नाशक,कीट नाशक, और खाद के रूप में किये जाने का उलेख है ! गाय के खाद में रासायनिक खादों के तुलना में नायट्रोजन , पोटेशियम और फस्पोरस कि मात्रा कम नहीं है ! गाय के खाद में नायट्रोजन ०.०५%-१.५%,पोटेशियम १.२ %-.१.४ % और फस्पोरस कि मात्रा ०.५%-०.९% सिद्ध कि गयी है ! गाय के कुछ उत्पादों का ही यहाँ संक्षेप में बताने का प्रयास किया गया है ! इन उत्पादों में सभी बीमारियों को नष्ट करने के गुण विधमान है ! गौ के सारे उत्पाद गुणों से परिपूर्ण होने के बाद भी गोमाता क्यों उपेक्षित है ? गौशालाए धनार्जन सरकारी जमीन हडपने का साधन बन गयी है ?नैवेध के बजाय बचा खुचा खिलाने कि प्रवर्ति क्यों बढ़ रही है ? गाय के दूध को नकार कर अन्य दूधो की ओर क्यों हम बढ़ कर अपनी नकारत्मक सोच को बढ़ा रहे है ? इसी कारण सकारत्मक सोच कम तो नहीं हो रही है ? भाई भाई को तलवार से काट रहा है ? सारी जगह नकारत्मक सोच काम कर रही है ? गो माता के पास सभी धर्मो के लोग जा सकते है, साम्प्रदायिक सदभाव का साक्षात् प्रमाण है ! इतनी वैभव संपन्न गो माता के लिए हम क्या कर रहे है ? ये सब विचारनीय प्रशन है ! इन प्रश्नों के लिए हमारी सोच को बदलने कि जरुरत है ! एक बार यदि गो माता क़ी हमने सेवा शुरू कर दी, देखिये ग़ो माता आपके लिए क्या करती है !
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Posted on Tuesday, November 02, 2010 10:33:04 PM
Modified on Tuesday, November 02, 2010 10:43:04 PM
From Kailash Choudhary
मगबमससमदज ंतजपबसमण्
Posted on Sunday, September 26, 2010 12:11:53 PM
From Rajeev Tripathi
Aapne jo "vaibhavshali" blog likha hai wo kabil-e-tareef hi nahi balki aapko baitarni paar karane mein aham bhoomika nibhanne mein saksham saabit hoga............kripya is baar ka vishesh dhyaan rakhe ki vedo mein kewal bharatiya nasl ki gaumaata ko hi shreshth maana gaya hai. kripya apne blog mein bhartiya gaumaata ka hi chitra upyog karen! Aapke liye kuch photo main e.mail se bhej raha hoon! Kripya gaumaata ki mahima ka aap aise hi bakhaan karte rahen aisi meri kaamna gau maata se hai!

-RAJEEV TRIPATHI
CHEIF EDITOR
RAJANCHAL TIMES
NEWS MAGAZINE
Posted on
May
13
2010
Thu
10:57
AM
महिलाओ का गुस्सा
Modified on
May
13
2010
Thu
5:46
PM
From Ram Purshottam Kasture
महिलाये पुरुषो से जादा गुस्सा करती है,

इनका गुस्सा समय और परिस्थिति के अनुरूप प्रकट

होता जबकि आदमी का गुस्सा न तो समय देखता है, और नहीं परिस्थति इसी

कारण महिलाओ से जादा गुस्सेल पुरुष को माना जाता है !

महिलाओ को अपना गुस्सा कब निकालना है, यह बखूबी आता है ! यदि गुस्से के

समय मेहमान आजाये तब ये शांत हो कर

उनसे हंसी मजाक करने लग जाती है ,

लेकिन गुस्सा पुरे जोर से उफान मारते रहता है ! वक़्त मिलते ही ज्वाला मुखी फूट

पड़ता है ! इतिहास में इसके उदहारण भी मिलते है ! पांचाली के गुस्से से महाभारत

हो गया, झाँसी के रानी के गुस्से ने उसे लड़ाई के मैदान में ही उतार दिया ऐसे कई

सारी मिसाले हमें इतिहास में मिल जाएगी ! राजमाता सिंधिया के गुस्से ने राजनीती

के चाणक्य द्वारका प्रसाद मिश्र को मुख्य मंत्री के कुर्सी से भी हटा देने की घटना

को हम नहीं भूले है ! इंदिराजी के गुस्से का आपातकाल अब भी अनेको को पसीना

ला देता है ! ये सब महिलाओ के उग्र गुस्से का परिणाम है ! उग्र गुस्सा बहुत कम

आता है! छोटे मोटे गुस्से का शिकार तो रोज होते रहते है! महिलाओ को गुस्सा

आना कोई अजीबो गरीब बात नहीं है , यह स्वाभाविक प्रक्रिया है , लेकिन गुस्से में

तर्क का वितर्क होने में देर नहीं लगती है और कुछ भी घट सकता है ! महिलाये

इन सब से परिचित होते हुआ भी गुस्सा करती है ! दया,करुणा और ममता की

देवी माने जाने वाली महिला को गुस्सा आना एक अप्रत्याशित घटना होती है ! कोई

भी उनसे गुस्से की कल्पना नहीं करता है ! कुछ अकलमंद लोग इनके गुस्से को

जानते है, इस कारण इनसे वाद विवाद करने से बचते है, यदि ये सब नहीं होता है

तब भी जीता हुआ पुरुष अपनी हर मान लेता है ! महिलाओ को यह ईश्वरीय देन

है ! चलती महिला को कोई पुरुष कोई ताना कसे और महिल उसकी ओर देख भी

ले तब पुरुष की क्या स्थिति होती है यह किसी से छिपी नहीं है ! महिला का यह

कृत्य गुस्से से कम नहीं है, फिर गुस्सा करके अपना ब्लड प्रेशर क्यों बढाती है ?

शायद नारी शक्ति के ज्ञान को वह भूल जाती है ! इसीकारण अनेको परेशानी भी

खड़ी हो जाती है ! महिला लेखिकाए अपना गुस्सा उस लेख पर लिखी गयी

टिप्पणियों पर निकालती है ! बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है ! असावधानी अनेक

कुतर्को को जन्म दे देती है ! जब तक समल्हते है तब तक बहुत देर हो जाती है !

लिखती बहुत अछा है इसी कारण टिप्पणी करने की भी इच्छा होती है , लेकिन कब

गुस्सा हो जाये ? इसी डर से बहुत वक़्त गुजरने के बाद टिप्पणी की जाती है !

महिला का एक आंसू ही पुरुष को पिघलाने के काफी होते हुए भी गुस्सा क्यों करती

है ! यह खोज का विषय हो सकता है ! गुस्सा कभी बिचारे बच्चो पर निकलता है तो

कभी पति पर, बच्चो पर निकला गुस्सा तो क्षणिक होता है लेकिन पति पर निकला

गुस्सा काफी दिनों तक चलता है ! पति के सारी मान मनव्वल धरी की धरी रह

जाती है ! अनेको बार गुस्से का ब्रमास्त्र की तरह भी उपयोग किया जाता जिसमे वे

सफल हो कर आदमी को कई बुरी आदतों से मुक्त भी करा देती है ! नारी की

महिमा अपरम्पार है ! फिर भी नारी आज भी अपने आपको क्यों असहाय मानती

है ? पुराने समय से उसका कद बढ़ा है , उसकी आवाज में दम है , उसकी आँखों में

गजब की ज्योति है ! नारी समाननीय है ! जब वह अपनी पूरी शक्ति के साथ खड़ी

होती है, बड़े से बड़ा आदमी पनाह मांगने लगता है ! दया, करुणा, ममता ओर रौद्र

का संगम नारी ही है !
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Posted on Monday, May 17, 2010 5:28:57 PM
From Keshav Sahu
Res/Sir,
prannam & Very Good aapne bilkul sanhi likha hai
Posted on
May
2
2010
Sun
5:35
PM
दुखद
Modified on
May
2
2010
Sun
5:58
PM
From Ram Purshottam Kasture
३० अप्रैल का दिन दुखद रहा !

अब तक रेल अपनी पटरियों पर तेज गति से दौड़ रही थी.,

अनेको महत्व पूर्ण निर्णयों से विभाग लबालब हो गया है !

मेट्रो जैसी योजनाओ के लिए काम भी शुरू हो गया है !

३ साल पहले तक विभाग को सोया माना जाता था,

विभाग बिना विश्राम के काम कर रहा था !

हर जानकारी समय से पहले ही भेज दी जाती थी !

विभाग की इस सतर्कता के कारण सभी अचम्भित थे !

चहु ओर विभाग ही विभाग था !

विभाग दिन दुनी रात चौगुनी उन्नति कर रहा था !

आज के युग में कोई किसी की उन्नति नहीं देख नहीं सकता ,

ईर्ष्यालु पैदा हो गए थे, ओर विभाग की उन्नति में अवरोध पैदा कर दिए गए !

मुखिया बदल दिया गया !

सरकार में अधिकारियो को बदलने की प्रक्रिया नई नहीं है

बदली करने के पहले विभाग को लाभ होगा या

हानि इसका आंकलन कभी किया जाता था !

आज अदला बदली का कोई पैमाना नहीं है !

जो हमसे क्यों आगे जा रहा है ?

उसे पटरियों से अलग करने का मापदंड है !

सरकार अपनी सुविधा से अदला बदली कर रही है !

सरकार का यह विशेषाधिकार है !

पारदर्शी युग में इस प्रकार का अधिकार सामन्ती वाद का प्रतिक है !

विशेष अधिकारों की समीक्षा और आंकलन अब जरुरी हो गया है !

अदला बदली अपनी सुविधा के लिए न होकर

जन हितार्थ करने की आवश्यकता हो गयी है !

कोनसी बदली क्यों की जा रही है इसका उत्तर हमारे पास होना जरुरी है ,

बदली, प्रशासनिक आधार पर की गयी यह बताना अब पर्याप्त नहीं है !

इसके सभी कारणों के खुलासे के साथ विभाग को

क्या नफा नुकसान होगा बताने की जरुरत है !

सरकार सोचे या न सोचे लेकिन विभाग की रेल तो आज रुक ही गयी,

यही हमारे लिए दुखद है !
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4 Comments
Posted on Monday, May 03, 2010 12:27:00 PM
From Anurag Soni
आदरणीय सर
आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है, मे आपके इस लेख पर बहुत अभिभूत हुआ हु,
स्थानांतरण और परिबर्तन आज के युग मे दोनों ही जरुरी है, बस थोडा सा समय और मिला होता तो बॉस मेट्रो तो क्या और भी बहुत बड़ा योगदान इस बिभाग मे दे देते!
Posted on Monday, May 03, 2010 11:07:03 AM
From Ashfaq Ahmad
ये बात सत्य है की मुखिया बदल जाने से प्रदेश में विकास से हो रहे कार्यों पर जरूर असर पड़ेगा, भोपाल में मेट्रो का आना शायद अब सपना हो, प्रशासन को हर पहलू पर ध्यान देना चाहिए, जंहा बात प्रगति की हो तो ख़ास तोर पर जरूर ध्यान देना चाहिए !
Posted on Monday, May 03, 2010 10:23:23 AM
From Shankar Das
आप के लेख से मै पूर्ण तरह से सहमत हु..
किसी भी स्तर के बदलाव से पहले उसका कारण ज़रूर सार्वजानिक होना चाहिए..
सिर्फ यह कह देना की ये प्रशाशनिक फेर बदल है, नाकाफी है..
जब कोई अधिकारी किसी विभाग में अच्छा काम कर रहा है तो उसे उस विभाग से हटाना नहीं चाहिए, उससे प्रगति में बाधा आती है.. क्या ये भी प्रशाशन को समझाने की ज़रूरत है..
क्यों नहीं कोई निर्णय से पहले आम जनता और उसकी प्रगति के बारे में सोचा नहीं जाता..
Posted on Monday, May 03, 2010 10:12:21 AM
From Rishi
lachar sarkari trant ka yaha ek jita jagta utdaharan hai.aapki yaha vishesh tippani bhi sarkari trantriyo ko samaz se pare hai.
Posted on
Apr
28
2010
Wed
4:18
PM
सीएमओ
Modified on
Apr
28
2010
Wed
7:08
PM
From Ram Purshottam Kasture
मध्य प्रदेश में ३६० नगरीय निकायों में सरकार के द्वारा पदस्थ

मुख्य नगर पालिका अधिकारी इन निकायों का प्रशासन सम्हालता है !

सीएमओ का चयन राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा किया जाता है !

१९५० -१९६० के दशक में सीएमओ को निकाय का सचिव कहा जाता था !

इनका चयन वह वहा की परिषदे करती थी !

उस समय परिषद् का सचिव, परिषदों का बुल डॉग जादा औकात नहीं रखता था !

इसकारण इस पद कि न तो गरिमाँ थी और नहीं कोई अहमियत !

१९७० के दशक से इस पद का महत्व समझा गया

नगरीय निकायों के लिए अधिनियम बनाया गया

जिसमे इस पद कि जिम्मेदारी बताई गयी !

लोक सेवा योग से चयन होने के कारण पढ़े लिखे

अधिकारी आने लगे ! जो अपनी जिमेदारी को समझते है

और विपरीत परिस्थितियों में काम करके

अपने पद कि महता को दिखाने कि क्षमता रखते है !

यहाँ यह बात्त भी उलेखनीय है कि

नगरीय निकायों में वे सारे विभाग एक ही जगह होते है,

जो सरकार ने अलग अलग बना रखे है !

सरकार के इन विभागों के भारी भरकम अमला होता है,

वही सीएमओ अपने कुछ अधिकारी के साथ इन सब

विभागों का संचालन करता है ,

इसी के साथ उसे अध्यक्ष और पार्षदों कि मर्जी को भी देखना पड़ता है ,

शहर कि राजनीती इसी अधिकारी के चारो और घुमती है

और शहर के अधिकारियो का भी ख्याल रखना पड़ता है !

यह अधिकारी इतनी सारी कवायद एक साथ करता है ,

जो दुसरे विभाग के अधिकारी को नहीं करनी पड़ती,

इन विभाग के अधिकारियो के साथ कानून का डंडा भी होता है,

जो सीएमओ को नसीब नहीं होता !

इन सबके बावजूद भी यह अधिकारी शहर में काम करके अपनी छाप छोड़ देता है !

वर्ष १९९२-१९९४ में श्री राजीव गाँधी ने इन शहरी संस्थाओ के

महत्व को समझते हुए इन्हें सवेधानिक दर्जा दिया और इन्हें मजबूत बनाया,

किन्तु प्रदेश के इन अधिकारियो के लिए १९६२ में बनाये गए नियमो

में कोई बदलाव नहीं किया गया !

पंचायत जिसका दायरा नगर पंचायत से भी कम होता है !

पंचायत सचिव सरकारी नौकर है !

स्टेनो राजपत्रित अधिकारी है !

इन दोनों के बारे में cmo के लिए स्थिति स्पष्ट नहीं है !

cmo सब झंझावातो को झेलते हुआ उपेक्षा कि जिन्दगी जी रहा है !

इन अधिकारियो के मन में भी यह सवाल उठता है कि

"मै राज्य सरकार के अन्य अधिकारियो के सामान

योग्यता रखते हुए भी क्यों उपेक्षित हूँ " ,

राज्य सरकार के सारे संवर्ग के अधिकारी,

इन अधिकारियो को मजबूत नहीं बनने दे रहे है !

इन संवर्गो को यह डर है कि यदि ये अधिकारी सामने आगये तो

अन्य संवर्गो को उनकी औकात पता लग जाएगी इसी कारण

राज्य सरकार इनके पक्ष में कोई निर्णय लेती है

तब विरोध के स्वर इतने जबरदस्त उठते है

कि राज्य सरकार इनके बारे में सोचना ही छोड़ देती है !

विभाग के प्रमुख ने इसी वर्ष २७ वर्ष बाद पदोन्नति क़र इतिहास जरुर रचा है

और इसके लिए वे बधाई के पात्र भी है !

ऐसे ही मजबूत इरादे कि जरुरत है !

माना यह जाता है कि सरकार से कोई बड़ा नहीं होता

लेकिन इन अधिकारियो के बारे कोई निर्णय नहीं लेने के

कारण यह धारणा गलत साबित हो रही है !

प्रदेश के मुखिया ने नगरीय निकायों के लिए कैडर बनाने

का निर्देश देक़र विधान सभा के गए सत्र में पारित कराने के निर्देश भी दिये थे !

सत्र को समाप्त हुए १ माह से अधिक का समय बीतने के बाद

भी इस दिशा में कुछ नहीं हो सका है

और कुछ होने कि उम्मीद भी नजर नहीं आरही है !

विभाग के अधिकारी इतने भी लाचार भी हो सकते है ?

इन अधिकारियो ने विभाग के उच्च पदस्थ अधिकारियो कि

कुछ नहीं करने कि स्थिती को देखते हुए

माननीय उच्च न्यायालय में उन्हें "सरकार का नौकर"

घोषित करने के लिए याचिका भी दायर की थी ,

इस याचिका का निर्णय इन अधिकारियो के पक्ष में होने के बाद भी

इस निर्णय को क्रियान्वित करने के लिए, आज १५ वर्ष से अधिक का

समय बीत जाने के बाद भी कुछ नहीं हो सका है !

इसी निर्णय के आधार पर विधि विभाग ने सीएमओ को

IAS के लिए पदोन्नति के योग्य भी बताया है !

इसके बाद भी इन्हें वंचित रखा जा रहा है

इन अधिकारियो की दशा दिशा के लिए कुछ भी नहीं किये जाने

से यह साबित होता है नगरीय निकायों के जड़ो को

कमजोर बनाने कि खूब छाछ डाला जा रहा है !

इस विभाग, में अन्य विभाग के अधिकारी आकर इन अधिकारियो का शोषण क़र रहे है !

इन अधिकारियो कि इज्जत तार तार क़र रहे ,

भीष्म पितामह द्रोपदी का वस्त्र हरण देख रहे है !

जो हमारा खाते, पिते है वे ही रौब दिखा रहे है !

जबकि इनमे में से कुछ wine , line और sign

के सिवाय और नहीं जानते !

विभाग में योग्य अधिकारियो के होते हुए भी

बहार के अधिकारियो को क्यों बुलाया जा रहा है !

इस प्रकार का करिश्मा इस विभाग में छोड़कर क़र

किसी विभाग में देखने को नहीं मिलेगा !

विभाग ही अपनी रीढ़ कि हड्डी को खुद ही कमजोर बना रहा है ,

कोनसी मजबुरिया है ? समझ के परे होती जारही है !

विभागीय अधिकारी नहीं होने से इस विभाग कि साख नहीं बढ रही है !

यदि विभागीय अधिकारी मजबूत होंगे तो विभाग कि

साख अपने आप बढ़ेगी और विभाग गर्व के साथ

अपना अस्तित्व बनाकर रख सकेगा

विभाग अंतिम छोर पर नहीं दिखेगा !

वर्तमान में विभाग के मंत्री

और उच्च पदों पर बैठे अधिकारी संवेदनशील , दढ़ इछा शक्ति के है ,

विभाग को आसमान तक ले जाने कि उनमे क्षमता है,

उनसे इन अधिकारियो कि मांग है कि वे :-

१ नगरीय निकायों के अधिकारियो के केडर को अंतिम रूप दे !

२ विभाग में विभागीय अधिकारियो को पदस्थ करने कि कारवाई करे !

३ माननीय उच्च न्यायालय के निर्देश को क्रियान्वित कराये !

४ प्रति वर्ष विभागीय समिति के बैठक कराये !

यदि ये ऐसा कर लेते है तो उन्हें इतिहास पुरुष बनने से कोई नहीं रोक सकता ................


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2 Comments
Posted on Tuesday, November 02, 2010 10:41:29 PM
Modified on Tuesday, November 02, 2010 10:47:38 PM
From Kailash Choudhary
बढिया लेख है.......धन्यवाद
Posted on Thursday, May 27, 2010 9:58:09 PM
Modified on Thursday, May 27, 2010 9:59:57 PM
From Kailash Choudhary
very nice blog---// kash aisa ho jaye.
Posted on
Apr
19
2010
Mon
8:33
PM
क्या कहु क्या न कहु
Modified on
Apr
20
2010
Tue
9:04
AM
From Ram Purshottam Kasture




आज बहुत दुविधा में हूँ क्या कहु और क्या नहीं कहु !

बहुत सारी बाते मन में है ! किस गठरी को खोलू किस गठरी को नहीं!

मै अपने आप से ही खुद कहना चाह रहा हूँ ! मन चंचल है, कभी कहता है,

इस गठरी को खोलो कभी कहता है उस गठरी को !

पेशो पेश में हूँ ! न निगलते बन रहा है, ना उगलते !

फिर भी मैंने अपने बचपन की गठरी को खोल लिया !

गठरी कहती है ये तुमने क्या किया !

मेरे पास तो कुछ भी नहीं है कहने को !

माँ के बिना क्या बचपन भी होता है ?

क्यों नालायकी करके मेरी बदनामी कर रहे हो !

मैंने गठरी बांध दी !

दूसरी गठरी खोली उसमे मेरी जवानी का हिसाब था !

उसने कहा क्यों मुझे शर्म सार कर रहे हो !

क्या किया ऐसा जो तुमने ?

सारे दिन रात अपने काम बिजी रहे !

पुरुषत्व बताऊ ?

किसका मै बखान करू ?

इस जवानी के खेल में मुझे भागीदार बना रहे हो !

मैंने जो गठरी अभी नहीं बंधी थी , उसको ही खोल दिया !

वो चिलाकर बोली , क्यों असमय प्रसव करा रहे हो !

मै जानती हूँ , न तुम अपना बचपन खेल पाए और नहीं जवानी का सुख भोग पाए !

तुम्हारी कोन मदद करेगा !

जैसे भी अपना बुढ़ापा काटो !

राम नाम सत्य है , का इंतजार करो !

बच्चे चिल्ला रहे है, बीबी कोस रही है !

सारी जिन्दगी ऐसे ही खो दी !

इसी आशा में जिन्दा हूँ कि कोई ना कोई गठरी मेरा जीवन का बखान करेगी !

मै भी कुछ हूँ बता देगी ? गठरी का जीवन भी धन्य हो जायेगा !

सरकारी आदमी है, सोचता है, रिटायरमेंट के १ दिन पहले ही मर जाऊ ?

अनुग्रह राशी और अनुकंम्पा नियुक्ति से कुछ भला कर जाऊ ?

साडी गठरियो और घर वालो को अपना महत्व बता दु ?

काश ऐसा होता ?

वह मरने के बाद भी

अपना महत्व समझा देता ?

राम नाम ही सत्य है यह साबित हो जाता !
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1 Comment
Posted on Thursday, May 27, 2010 10:07:32 PM
From Kailash Choudhary
man ke kone main hajaron secret hote hain ..... jo.. hum kishi ko nahin batate hain. ye gathariyan sachmuch .....aapke...blog.. anushar hi darati hain..
Posted on
Apr
3
2010
Sat
8:58
PM
सत्य की पराजय
Modified on
Apr
3
2010
Sat
10:24
PM
From Ram Purshottam Kasture
सत्य की २२ मार्च २०१० को बहुत बड़ी पराजय हुई ! सत्य लहू लुहान पड़ा है ! कोई उसकी मदद के लिए तैयार नहीं ! समाचार पत्रों में कोई खबर नहीं, टीवी इस बारे में खामोश है ! लगता है इन त्तथा कथित सत्य के पक्षधरो के सामने ही असमय ही मौत को गले लगाकर असत्य के लिए मैदान छोड़ देगा ! हुआ भी यही है ! सत्य की यह दुर्दशा असत्य के साथ चलने से हुई ! सत्य के साथ चलने से असत्य को लगा की उसका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा और सत्य ही विजयी होगा ? इस कारण षडयन्त्र रचा गया, जनता के कर्णधारो से शिकायत करायी गयी , सदन में की गयी शिकायतों के सम्बन्ध में प्रशन उठाये गए, सत्य परेशान हो गया ! एक कर्णधार से सत्यधर्मी ने पूछा कि क्या आपने शिकायत की , सदन में प्रशन उठाये ? कर्णधार का जवाब था नहीं , मेरे लेटर हेड का उपयोग आपके लिए किया गया इसका मुझे खेद है ! कर्णधार दुखी हो गया , उसने शिकायत भी वापस ली और प्रशन भी ! सत्य को अपना अस्तित्व का भास हुआ , उसे लगा कि अब असत्य हाथ पैर नहीं मारेगा यही भूल हुई , असत्य ने इसका लाभ उठाया और सीधे सदन में उतर देने वाले मंत्री से साठघाट की और मंत्री के माध्यम से यह बताने में सफल रहा कि सत्य ने कर्णधार को मेनेज कर लिया है ! मंत्री ने बिना जाच पड़ताल के यही बात अपने मुखिया को बता दी ! मुखिया ने सत्य को असत्य की राह से हटाने के आदेश दे दिए ! मुखिया ने भी किसी जाच की जरुरत नहीं समझी, नहीं उसको अपना पक्ष रखने का मौका ही दिया ! घी के दीपक जले , खुशिया मनाई गयी और नवरात्री, सत्य के साथ ही बिदा हो गयी ! सत्य को अपनी पराजय का दुःख नहीं है, उसे हटाने के तरीके वह दुखी है ! असत्य अपनी जयजय कार मनाता घूम रहा है! सत्य अकेला रह गया है , बचे हुए दिन सही सलामत कट यही दुआ मांग रहा है ! सत्य कल की नहीं आज की सोच रहा है ! मुर्गी से भविष्य में जीने की कला सिख रहा है ! " मुर्गी क्या जाने अंडे का क्या होगा, लाइफ मिलेगी या तवे पर फ्राय होगा " ! सत्य को मुखिया के निर्णय पर भी आश्चर्य हुआ सत्य ने सोचा यदि ऐसे ही होता रहा तो कोन उसके साथ रहेगा , असत्य का साथ देने पर भी सत्य दुखी है , मुखिया की सत्य निष्ठा पर भी संदेह उसको हो गया है ! कान के कचे मुखिया कान को नहीं कौए को देखते है, कैसा स्वर्ण मय होगा ! जो अपने ही लोगो को नंगा कर रहा है ! कब तक कपडे पहने रह सकता है ! देखे मुर्गी का अंडा आमलेट बनता या मुर्गा ! सत्य हमेशा जीवित रहेगा ! यह उसकी मात्र अस्थायी हार है ! सत्य सत्य रहेगा !
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6 Comments
Posted on Saturday, April 10, 2010 5:40:14 PM
From Ram Purshottam Kasture
आदरणीय सर
मेरा हौसला बुलंदी के लिए आपका आभारी हूँ ! आपके प्रेरणात्मक शब्द से उर्जा अवश्य मिलेगी !
Posted on Saturday, April 10, 2010 5:35:14 PM
From Prof. Prem Mohan Lakhotia
अवश्य ही सत्य का मार्ग कठिन है पर ऐसा भी नहीं जो शब्दों में व्यापक बना कर भयंकर बना दिया जाए | मेरे दीर्घ जीवन अनुभव में मैंने बहुत कुछ भोगा है, गहरे आघात भी मिले | लहू लुहान होकर मैं भी गिरा हूँ किन्तु इसका अर्थ यह तो नहीं कि सत्य लहू लुहान होकर हार गया |
आपके दुखद अनुभव के लिए मेरी आन्तरिक सहानुभूति स्वीकार करें | कुछ कर सकता हूँ तो बताइये |
Posted on Friday, April 09, 2010 4:55:08 PM
Modified on Friday, April 09, 2010 4:57:14 PM
From Keshav Sahu
आदरणीय सर जी/ चरण चुकार सादर प्रणाम
मै आपसे चरण छूकर छमा चाहता हूँ इसलिए की वाकई सत्य कहो तो मारण धावा, आज ब्रस्ताचार, बेईमानी, पाप और असत्य का इतना बोलबाला है की सत्य की कोई चलन ही नही है, लोग पैसे से सब कुछ खरीद रहा है, लोग अपनी शान बड़ाने के लिए कुछ भी कर सकता है, किसी की भी बेवजह कुछ भी शिकायत कर सकता है, लोग पैसे से सच को झूठ और झूठ को सच साबित कर सकता है, सदन में क्या स्वय भगवन के सामने भी जाये तो भी असत्य ही बजी मारेगी, इतनी भ्रस्त हो गई है संसार, वैसे ही सत्य के साथ हुआ है, और १ अकेला सत्य कितना भी कुछ कर ले हिम्मत हारना ही पड़ता है, पर यह भी सत्य है की अंत में विजय सत्य की ही होती है, और जहाँ तक असत्य का जशन मानाने का सवाल है तो कब तक जशन मनायेगा अंत में वे खुद ही हार जायेगा. सत्य के ऊपर हार का जो गम है, उस गम को मै समझ सकता हूँ. आपने बिलकुल सत्य लिखा है,
I am so sorry sir & thank you so much.
Posted on Monday, April 05, 2010 7:49:34 PM
From Ram Purshottam Kasture
आदरणीय लखोटिया जी
आपने सही लिखा ! मै आभारी हूँ ! सत्य को भी अपनी पहचान बतानी पड़ती है , सीता को भी यही करना पड़ा ! मै इस घटना का नायक हूँ ! घटना सही है, भुक्त भोगी हूँ ! असत्य के साथ अनेको होते है , जबकि सत्य का साथ कोई नहीं देता , वातावरण ही कुछ ऐसा हो रहा है ! सत्य को अनेको बार असत्य कहे तो यही सत्य हार जाता है ! मनीषि भी सोचने पर विवश हो जाते है !
कुछ भी निर्णय लेते है ! निर्णय , निर्णय है !
Posted on Monday, April 05, 2010 7:32:40 AM
Modified on Monday, April 05, 2010 7:33:48 AM
From Prof. Prem Mohan Lakhotia
बात छुपाएं और सत्य बताएं!
सत्य को हार का हार नहीं पहनाएं |
जो हारे वह सत्य नहीं |
सत्यमेव जयते !
विचारों में जो सच लगे - वह सच प्रायः नहीं होता |
शायद हम कोई तात्कालिक सच ढूँढ़ने में ही अपनी सार्थकता मानने लगे है |
Posted on Sunday, April 04, 2010 7:23:11 PM
From Ashok Coomar
What you lament about has been happening ever since we got organised as a society. It is regrettable but merely regrets are not enough if we want to improve things. We must know the details.

Why not reveal what you are talking about?
Posted on
Mar
12
2010
Fri
10:52
PM
दोस्ती
Modified on
Mar
13
2010
Sat
7:10
AM
From Ram Purshottam Kasture
दोस्ती हर किसी के साथ नहीं होती !

मेरे मत अनुसार दोस्ती पिछले जन्म का कोई पुण्य है !

जो इस जन्म में लाकर मिलाता है ! कही न कही विचार मिलते है ,

कही विचारो में भिन्नता भी होती है ,

लेकिन कोई न कोई आपस में मिला देता है !

इसको आगे बढ़ाना हम लोगो का कर्तव्य है !

आज के इस युग में हर पर्सन एक दुसरे का दुशमन है !

हर जगह रिनात्मक सोच बाजी मार रही है !

इसी कारण धनात्मक सोच हार रही है !

विलयन हीरो बन रहे है ! दादा गिरी हो रही है !

कही न कही दोस्ती समर्पण में आगे नहीं आरही है !

दोस्त दोस्त को दुश्मन समझ रहा है !

दुश्मन इसका लाभ उठा रहा है !

हर जगह अछे आदमी पीट रहे !

दोस्ती की कमी का ये फायदा उठा रहे है !

कृष्ण और सुदामा कि दोस्ती आज भी प्रांसगिक है !

इनकी दोस्ती में भी दुश्मनों ने आग लगायी होगी ?

लेकिन इन दोस्तों कि दोस्ती आज उदारहण दे कर कह रही है

दोस्त सब एक हो जाओ ! इस ललकार को कोई नहीं सुन रहा है !

हमारे घर के सामने कोन रहता मालूम नहीं है ?

योग्यता कि लोग टांग पकड़कर खीच रहे है ,

दोस्त मजाक उड़ा रहे है !

द्रोपदी के चीरहरण इसका उदारहण है !

कर्ण और दुर्योधन की दोस्ती भी हार गयी,क्यूंकि इसमें स्वार्थ था!

इस दोस्ती के आगे कृष्ण को भी अपनी रन निति बदलनी पड़ी थी !

स्वार्थ की दोस्ती ने भी अपना कमल दिखाया था !

दोस्ती में स्वार्थ अनदेखा करना होगा !

स्वार्थ को दोस्ती के साथ मिलकर कोई दोस्ती का रास्ता खोजना होगा !

यह हम अब भी समझ नहीं पा रहे है !

फिर भी दोस्त को पछाड़ने में दुश्मनों का साथ दे रहे है !

दोस्त दोस्त का चिर हरण कर रहा है !

कितना बेहूदा मजाक है ! दोस्त बनाने के लिए आज बहुत सारे प्लेटफार्म है ,

लोग इसका उपयोग तो कर रहे है लेकिन हर किसी को को शंका के नजर से देख रहा है !

इसी कारण इन प्लेटफार्म का भी सही उपयोग नहीं हो रहा है !

इस में भी लोग अपना फायदा धुंड रहे है !

कोई दोस्त बनाने के लिए पैसे दे रहा है,

कोई विज्ञापनों के माध्यम से दोस्त इकठा कर अपनी रोजी रोटी चला रहे है !

प्लेटफार्म विचारो का आदान प्रदान हो सके इसके लिए बहुत सारे प्लेटफार्म आगे आ रहे है !

फिर भी ये प्लेटफार्म सबको व्यस्त रख रहे !

फेस बुक , आर्कुट और अपना सर्किल यही काम कर रहे है !

इन प्लेटफार्म में भी भयानक प्रतिदंद्विता सामने आरही है !

एक दुसरे को दुसरे को निचा दिखाने की कोई गुन्जायिश नहीं छोड़ रहे है !

इसी कारण दोस्त दोस्त नहीं बन रहे है !

इंटर नेट के सहारे कोन क्या बोल रहा यकीन नहीं कर रहे है !

शंका सामने आरही है वो भी ऐसे ही रहा है !

दोस्ती के नाम पर कुछ भी चल रहा है !

इसी कारण दोस्ती आगे नहीं बढ़ रही है !

दूध का दूध पानी का पानी करने वाला प्लेटफार्म आगे आना चाहिए ताकि दोस्ती मरते दम तक बनी रहे !

दोस्त के सुख दुःख में काम आये दोस्त के नहीं रहने पर दो आंसू बहाए !

दोस्ती धन्य हो जाएगी ! सब दूर विश्वास का वातावरण बनेगा !

दोस्त को दोस्त समझेगा ! चाहे जो कुछ भी करना पड़े करेंगे !

मै ऐसा प्लेटफार्म तैयार करने का प्रयास भी कर रहा हूँ !

कुछ सफलता भी मिली है !

भगवान ने चाहा तो दोस्ती के बीच जो दिवार बनी है वह दूर होकर दुश्मन को भी दोस्त समझा जायेगा !

यह हमारे लिए बड़ी उपलब्धि होगी और समाज धनात्मक सोच कि ओर आगे बढेगा
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Posted on Sunday, March 14, 2010 2:14:23 PM
From Ashok Coomar
Bahut achhe vichar hain.
Ishwar ap ko safalta den.
Posted on
Feb
28
2010
Sun
12:55
PM
२८ साल से एक अफसर ........
Modified on
Feb
28
2010
Sun
1:01
PM
From Ram Purshottam Kasture
परसों विधान सभा में कि

जबलपुर जिले का एक अफसर २८ साल से एक स्थान पर क्यों पदस्थ है ?

के बारे में प्रश्न पूछा गया था !

इस प्रश्न के जवाब में सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्री ने उतर दिया

कि " यह अधिकारी जब भी ट्रांसफर करो कोर्ट से स्टे ले आता है" !

विधान सभा अध्यक्ष ने इस पर कहा कि

क्या यह अधिकारी सरकार पर भारी पड़ रहा है ?

यह टिपण्णी मुझे सटीक लगी ! भारी भरकम सरकार पर

क्या कोई आदमी भारी पड़ सकता है ?

ऊँची सरकार से क्या कोई ऊँचा हो सकता है ?

मेरे विचार से न तो कोई आदमी सरकार पर भारी न कोई ऊँचा और नहीं कोई सरकार

से बड़ा हो सकता है ! सरकार -सरकार है ! यदि ऐसा हुआ तो सरकार का अस्तित्व ही समाप्त हो

जायेगा ! यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि सरकार के सदस्य कितने भारी है ! इन सदस्यों

कि काम करने कि नियत कितनी साफ है ? निर्णय लेने कि क्षमता पर ही सरकार को भारी या

हल्का ठहराया जा सकता है ! किसी अधिकारी के स्टे लाने के बाद भी क्या उस पर करवाई नहीं

कि जा सकती ? यही पर सरकार चूकी है और इसी कारण सरकार हलकी साबित हुई है ! आज

निर्णय लेने में भाई भतीजे आड़े आ रहे है ! कोई बड़ी बात नहीं यह अधिकारी भी सरकार के

किसी सदस्य का कोई नातेदार या रिश्तेदार हो और इसी कारण यह २८ साल से अधिक समय एक

ही जगह पर टिका है ! अनुभव यह है कि अच्छा अधिकारी ३-४ साल से जादा किसी स्थान पर

टीक ही नहीं सकता ! या तो जनता इस अधिकारी से बोर हो जाती है या यह अधिकारी ही अपना

ट्रांसफर करवा लेता है ! यदि दोनों नहीं हुए तो जनता ही अफसर का सामान बंधवा देती है ! जनता

२८ सालो से इस अफसर को कैसे झेल रही है ? समझ के परे है ! हो सकता है जनता ने प्रयास

किया हो लेकिन प्रशासन ने नहीं सुना हो ! यह भी सवाल है कि विधान सभा में यह प्रश्न नहीं

उठाया जाता तब तो सरकार के ध्यान में यह बात आती ? रिटायर वही से होता ! मजे से दिन

काटता ! इस अफसर द्वारा किये गए कार्यो कि जाँच और इस जगह से ही इस अफसर को क्यों

लगाव है इस बारे में रोहानी जी कुछ नहीं बोले ? अरविन्द जोशी कांड के बाद सरकार ने ३ वर्षो से

एक ही जगह काम करने वाले अफसरों को ट्रांसफर करने का निर्णय लिया है ! इस निर्णय के

क्रियान्वयन के बाद सरकार हलकी है या भारी सिद्ध हो जायेगा !

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4 Comments
Posted on Thursday, March 04, 2010 3:10:42 PM
From Vishnu Khare
किसी अधिकारी का स्थानांतरण करके अपने आप को भारी साबित करने के अलावा भी सरकार के पास बहुत से काम हैं अपने आप को भारी साबित करने के लिए
Posted on Thursday, March 04, 2010 11:06:10 AM
From Anurag Soni
बहुत अच्छा लेख लिखा है सर आपने, यहाँ पर यह ध्यान देने बाली बात है ! पर इस बात से भी नहीं इनकार किया जा सकता है की सरकार, सरकार है ! अभी भी जनता इसे सहर्ष स्वीकार करने से कतराती है!
Posted on Wednesday, March 03, 2010 5:58:46 PM
From Dushyant Sharma
अच्छी जानकारी है ! सरकार भारी है यह सरकार को साबित करना पड़ेगा !
Posted on Wednesday, March 03, 2010 5:52:15 PM
Modified on Wednesday, March 03, 2010 5:52:58 PM
From Ram Purshottam Kasture
-
Posted on
Feb
27
2010
Sat
4:15
PM
रंग
Modified on
Feb
27
2010
Sat
4:32
PM
From Ram Purshottam Kasture
रंगों के त्योहार की ढेर सारी शुभकामनाएँ!

हर साल होली आती है। रंगों से दुनिया रंगी जाती है।

हम सब जाने कितनी बातें करते हैं कि रंग

ये कहते हैं, रंग वो कहते हैं... रंगों के ये मायने होते हैं वगैरह, वगैरह।

लेकिन क्या रंगों का कहा

सचमुच सुना जाता है?

जो सुना जाता, तो गलत क्यों समझा जाता?

जब दुनिया बनाने वाले की कूची चली होगी,

तो उसने कुछ सोचकर ही धूप पीली बनाई होगी।

और हमने क्यों उदासी को खुश्क कह दिया?

धूप की गर्माहट और रोशनी की अहमियत को हमने कहाँ जाना?

उजाला सफेद होता है और हमने सफेद को बेरंग मान लिया।

काला क्या सिर्फ अँधेरा होता है?

काजल, बादल, मिट्टी का सौंदर्य अँधेरे से जोड़ा जा सकता है??

पानी को तो हमने रंगहीन ही कह दिया।

लेकिन पानी से ज्यादा रंग किसमेँ दिख सकते हैं?

नदियों की आरती के दिए, सबसे ज्यादा पानी में ही लुभावने लगते हैं।

यहाँ तो पूरा शहर तालाब के पानी

में झलकता है। और असल से कहीं ज्यादा खूबसूरत उसकी यह पनीली छाया लगती है।

groups.bounces.google.com
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Posted on Saturday, February 27, 2010 8:35:58 PM
From Nani Manna
The sheer beauty of your poem touches the heart & makes us think anew the meaning of the colours of the objects they represent.
Posted on
Feb
17
2010
Wed
10:41
PM
अफसर
Modified on
Feb
18
2010
Thu
8:20
AM
From Ram Purshottam Kasture
अफसर के बारे में कहा जाता है !

जो नीचे से आत्ता है उसको ही अनुमोदित कर देते है !

अपना mind नहीं लगाते!

न सोचते है नहीं कोई पूछताछ करते है !

जो आया उसपर हस्ताक्षर कर देते है !

जो निर्णय उचः स्तर पर होना चहिये!

वह निचले स्तर पर होता है !

यही हर जगह देखने को मिलता है !

इसी कारण बाबु अफसर से महान हो गए है !

हर किसी की तक़दीर बाबु तैयार करते है !

बाबु को लोग महान मानते है !

जो बाबु ९०-२/ ५ के पगार पर लगता है !

ना कोई शिक्षा है ! ना कोई MIND

वही बड़े बड़े लोगो का तक़दीर तय करता है !

यही हमारे देश की विडम्बना है !

लेकिन मैंने आज ऐसे अफसर को देखा !

जो खुद ने निर्णय लिया है !

इस अफसर ने अचानक ही करवट ली

सारी फाइल पढ़ी !

जो महान थे उनको पटकनी लगा दी !

सबको अपनी औकात दिखा दी !

बॉस का यह रुख देखकर मै भी अचम्भित रह गया !

सब को प्रसन्न करके अपने घर को जाने के लिए बाध्य कर दिया !

अपने पाले की गेंद दुसरे के पाले में डालकर !

सरकार क्या होती है बता दिया !

वही याचिका कर्ता को उनकी गलती समझा दी !

और उनकी सहमती अपनी से पारी खेल कर !

प्रकरण की इतिश्री कर दी !
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2 Comments
Posted on Friday, February 19, 2010 12:06:53 PM
From Nani Manna
Unfortunately it is the reality today.
Posted on Thursday, February 18, 2010 10:05:26 AM
Modified on Thursday, February 18, 2010 10:06:13 AM
From Keshav Sahu
Res/sir,
Pranam
aapne bilkul satya likha hai realy aaj ke date me babu hi bade logo ki takdir bana raha hai. I agree with u & thank u so much for this blogg.
Posted on
Feb
17
2010
Wed
10:38
PM
।थ्ै।त्
From Ram Purshottam Kasture
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Posted on
Jan
26
2010
Tue
3:10
PM
माँ का तर्क
Modified on
Jan
27
2010
Wed
1:51
PM
From Ram Purshottam Kasture
माँ बूढी हो चली थी !

आँख से दिखाई भी कम दे रहा था ! सुनाई भी कम आता था !

पति को पहले ही खो चुकी थी !

इकलोते बेटे के पास रह रही थी !

टीवी के नजदीक बैठकर बचा खुचा जीवन काट रही थी !

पोते और पोतियों से दिल बहला रही थी !

बेटा आँख का आपरेशन

और सुनने वाली मशीन के लिए हमेशा माँ को कहता था !

माँ इस साल नहीं अगले साल पर टरका देती थी !

बेटा परेशान था !

एक दिन वो ठान बैठा कि माँ को आज आपरेशन के लिए मनाऊंगा !

माँ से जिद कर बैठा !

माँ ने कहा बेटा आँख ठीक भी हो जाएगी तब भी मै क्या तेरे पिताजी को देख सकुंगी ?

क्या उनकी आवाज को कान में मशीन लगाकर सुन लुंगी !

बेटा ऐसा नहीं होगा !

तू किसी जोतिष्यी के पास मुझे ले चल !

और कितने दिन मुझे जिन्दा रहना ये पता कर !

दो चार साल जीने के लिए तेरे लाख रूपये बर्बाद क्यों करुँगी !

जैसे अभी जी रही हूँ वैसे ही जी लुंगी !

बेटा माँ का तर्क सुनकर अवाक् रह गया !

माँ की ममता से रूबरू हो रहा था !

आयडिया :- अश्क
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Posted on
Jan
12
2010
Tue
8:13
PM
क्या हो रहा है
Modified on
Jan
13
2010
Wed
9:24
AM
From Ram Purshottam Kasture
आज के इस युग में किस पर विश्वास करे ?

यह नहीं समझ में नहीं आरहा है !

हर कदम पर धोका मिल रहा है !

मिलावटी दानव से रोज वास्ता पड़ रहा है !

जिसको अपना कहे वही गर्दन काट रहा है !

आस्तीन का सांप बनकर डस रहा है !

आदमी आदमी को धोका दे रहा है !

बॉस भी हम पर विश्वास नहीं कर रहा है !

समय की गति है !

भयानक विडबना है !

बेटीयो को परायो से नहीं अपनों से बचना पड़ रहा है !

आंध्र के नारायण से बेटिया अपनी इज्जत की भीख मांग रही है !

जिस पर भरोसा किया है वही दगा दे कर स्वास्थ के कारण इस्तीफा दे रहा है !

नैतिकता के नाते इस्तीफा मंजूर भी हो गया है !

इस नैतिकता को देखकर मामा शकुनी भी सोच में पड़ गए है !

दुर्योधन ने भी बहुत ठहाके मारे !

बोले क्यों मुझको बदनाम करते हो !

मुझसे से भयानक जीव है यहाँ !

क्यों उनको नहीं कोसते हो !

जिनके दामन में है दाग यहाँ !

वे सब नैतिकता के कारण बे कसूर हो चुके है !

क्यों अब भी मेरा पीछा करते हो !

बहुत हो गया मेरा अपमान !

अब तो बक्श दो !

ऐसो को बेदाग छोड़ने के कारण ही यह सब कुछ हो रहा है !

यही सब देखनो को मिलेगा ?

विश्वास को लुटा जायेगा है !

धोखा फल फूल रहा होगा !

स्वार्थ निकलने के बाद, अपना आदमी मारने, मरने पर उतारू होगा !

कब्र खोदकर दफ़नाने की तैयारी करेगा !

एक ही साँस में पूरी खानदान को निपटा देगा !

"कर्म कर उसका फल" छोड़ने वालो की गति यही होगी !

भगवान पर भरोसा कर रहे हो !

भगवान भी न कुछ दे रहा है न ले रहा है !

कह रहा है "जो हो रहा है अछा हो रहा है"

इस पचड़े में क्यों पड़ रहा है" !

दुर्योधन ने कहा उस समय एक ही द्रोपदी का चीरहरण हुआ था !

तब एक ही भगवान ने सबकी रक्षा की थी

इस युग में अनेको इसकी शिकार है !

भगवान का बस भी नहीं चल पा रहा है !

क्युकी भगवान के खुद के नाम से ही दुकाने खुली है !

इस कारण विश्वास की धजिया उड़ रही है !

विश्वास को छोड़कर अविश्वास के महल में जी रहे है !

अछा होता यदि हम ,अविश्वास के युग में जीने की कला सीख लेते !

यह तो वैसे ही हुआ हर किसी का खेत चरकर

हम दादा गिरी दिखा रहे है !
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Posted on Wednesday, January 13, 2010 10:46:05 AM
From Sweety Singh
आपने बिलकुल मेरे मन की बात लिखी है! सर आज का युग ऐसा ही है पर ऐसे युग के साथ हम जैसे लोग ही मार खाते है! जो कुछ करना चाहते है पर कुछ बंदिशे ऐसी लगती है की कर नहीं सकते बहुत ही अच्छा लिखा है आपने आज के युग के बारे में !
Posted on
Jan
5
2010
Tue
8:39
PM
३ इडियट्स
Modified on
Jan
6
2010
Wed
1:52
PM
From Ram Purshottam Kasture


आज ३ इडियट फिल्म के सारे सिनेमा हाल हॉउस फुल थे !

कोई जुगाड़ काम नहीं आ रही थी !

हर सिनेमा हॉल में हॉउसफुल का बोर्ड लगा था !

मैंने २७ दिस. २००९ को यह मूवी देखने की ठानी थी !

हॉउस फुल के कारण मूवी देखने की हिम्मत नहीं कर सका !

३ इडियट को घर से ही सलाम करके इसे

कभी नहीं देखनी की कसम खायी थी !

चेतन भगत ने विवाद पैदा कर पुन: देखने की जिज्ञासा उत्पन कर दी !

मैंने आज जुगाड़ करके सह परिवार मूवी देख ली !

३ इडियट ने जो संभव नहीं था कर दिखाया !

इन्टरनेट के सहारे प्रसव करवा दिया !

हर जगह टायलेट का इस्तेमाल करने पर होने वाली परेशानी से भी अवगत करा दिया !

अपने मन में जो हो, वह करने का सबक दे डाला !

महंगाई से भी अवगत करा दिया !

२० रुपये पाव भिन्डी और १० रूपये पाव की गोभी के दाम भी बता दिये !

दुःख के सीन में दर्शको के साथ खुद भी रो लिए !

वायरस का बोध भी करा दिया !

रेगिंग में कैसे निपटना है, यह भी बता दिया !

अपनी अकल दोसरों के काम कैसी आयेगी यह भी समझा दिया !

गधे को गधा कहकर, करीना कपूर को पटा लिया !

सच कब बोलना है, यह भी बोध करा दिया !

गे और नपुंसक को भी समझा दिया!

"कुछ तो लोग कहेंगे" यह बी बता दिया है

दोसरों की तुलना में हम कैसे बेहतर है, यह भी साबित कर दिया !

भगवान पर कितना निर्भर रहना चाहिए यह भी बता दिया !

फिर भी ये क्यों इडियट है? सोचने को मजबूर कर दिया !

मिडिया ने आमिर खान से इस फिल्म के बारे में पूंछा !

आमिर खान ने इन इडियटस को जीनियस बता दिया !

यदि ३ जीनियस के नाम से यह मूवी आती, तो हॉउस फुल का बोर्ड नहीं लगा होता !

इस मूवी को देखने भी, मै नहीं जाता !

हर क्षेत्र में जीनियस को झेल रहे है !

हर रोज जीनियस पैदा हो रहे है !

जीनियस ही जीनियस है !

हम जीनियसों की, हाँ में हाँ मिला रहे है

जीनियसों के सामने इडियट आने से कतराते है !

इडियट दूभर हो गए है ! प्रजाति लुप्त हो रही है !

इसी कारण इडियटओ को खोज रहे है !

इनकी हरकतों को देखने को लालायित है !

सिनेमा घरो की ओर भाग रहे है !

इडियट कभी हंसा रहे है, कभी रुला रहे है !

इडियट अपनी करतूतों का लोहा मनवा रहे है !

वेक्यूम क्लीनर से डीलेवरी कराकर,

बड़े बड़े जीनियसों को मात दे रहे है !

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6 Comments
Posted on Sunday, January 17, 2010 5:41:12 PM
From Ahsaas Verma
Sir you have talked about each aspect of the film in such a nice way that I have no words to explain..............In the previous comment I don't where my words have flown????????????and mere pink line is visible.................
Posted on Sunday, January 17, 2010 4:24:08 PM
From Ahsaas Verma
Posted on Monday, January 11, 2010 5:55:52 PM
From Kailash Choudhary
NICE BLOG
Posted on Saturday, January 09, 2010 4:28:14 AM
From Ravi Limaye

We too tried to get tickets and then one day fine day WE FINALLY saw the movie.
You have covered all aspects of the movie nicely
Posted on Friday, January 08, 2010 8:34:18 PM
Modified on Friday, January 08, 2010 8:37:33 PM
From Vikrant Sadana
पुरषोत्तम जी आपने तो कमाल कर दिया..
______ _______ के रुमाल कर दिया....
Posted on Wednesday, January 06, 2010 4:44:29 PM
From A. L. Hanfee
हसी की कराह
इंडिया टुडे में लेखक शिवकेश जी ने ३ इडियट को हसी की कराह के रूप में यूँ कहा की यह फिल्म काबिल की बजाये कामयाब बनाने पुर जोर देने वाली हमारी मौजूदा रत्तामर प्रणाली का तगड़ा पोस्टमोरटॉम हैं वे कहते हैं की हर एक द्रश्य को अच्छे विजुअल्स, टकसाली जुबान,माकूल रफ़्तार और कुल मिलकर संप्रेशंनीयता के एसे सांचे में ढाला हैं की कमोबेश हर प्रसंग दिल और दिमाग को छूता जाता हैं - शैक्षणिक प्रणाली के बखिये उधेड़ते द्रश्यो को देखकर हम हँसते भी हैं और कराहते भी हैं - ३ इडियट सिर्फ मनोरंजन की नहीं बल्कि हमारी तालीम से जुड़े बड़े सवालो को सतह पुर लानी वाली फिल्म हैं - पांचो किरदारो ने अपने किरदारों को आखिर तक जींत बनाए रखा हैं. किस्सागोई और दिलचस्प दमदार किरदारों के गठन अदि के नजरिए से वे शानताराम से लेकर सलीम - जावेद तक की याद दिलाते हैं -
पुरषोत्तम जी आपकी कविता में मज़ा आया - धन्यवाद
Posted on
Jan
1
2010
Fri
12:59
PM
2010
Modified on
Jan
1
2010
Fri
2:43
PM
From Ram Purshottam Kasture
पुराने साल को बिदा कर !

हर शख्स नए साल का इंतजार कर रहा है ।

नए साल के स्वागत के लिए भागम- भाग मची है ।

सारी रेलगाडियों की बर्थ फुल हो गयी है !

होटल्स में भी जगह नहीं है !

पार्टियों का इंतजाम चरम पर है !

इस आने वाले साल के लिए वो सब कुछ किया जा रहा है, जो बच्चे के शादी के समय किया जाता है !

इन सब व्यवस्था के कारण सारे आफिस खाली हो गए है !

हर किसी की जुबान पर नया साल है !

लोगो का मानना है की आने वाला साल उनके लिए अच्छा साबित होगा !

भ्रम पालने में कोई बाधा नहीं !

रंगीन सपने देखना भी बुरी बात नहीं है !

हर वर्ष नए साल के बारे में हमारी धारणा कुछ ऐसी ही रहती है !

नया साल कुछ कमाल दिखायेगा ?

पिछले साल की तरह इस साल में दशहरा, दिवाली, मोहर्रम और ईद आयेगी !

इस साल में भी ३६५ दिन होंगे ! आने वाले साल के दिनों में क्या होगा ?

अच्छी बुरी घटनाये सामने आएगी !

अच्छी घटनाये हमारी मार्गदर्शक बनेगी, वही बुरी घटनाओ को भूलने का प्रयास करेंगे !

समाज के कंटक वे सब वही करेंगे जो उन्होंने पिछले साल में किया है !

आतंकवादी भी अपनी आदत से बाज नहीं आएंगे !

महंगाई का क्या होगा ?

दहेज़ की बलिवेदी पर कितनी बहुए चड़ेगी ?

बलात्कार का तांडव होगा ?

टांगें खिचाई चरम पर रहेगी ?

राजनीति कोनसी करवट लेगी ?

आज कल तो इन सबकी भविष्य वाणी भी होने लगी है !

हर राशी का साल भर का भविष्य फल नेट पर मिल रहा है !

किन्तु इन सब प्रश्नों का सही उत्तर आने वाले साल के दिनों में मिलने वाला है !

हमारी संस्कृति हर आने वाले का स्वागत करती है!

संस्कारवान होने के कारण हम भी इसके स्वागत में भिड़े हुए है !

किसी का बुरा नहीं सोचते, इस कारण आने वाला साल भी हमारे लिए बुरा नहीं होगा !

यह हमारा मानना है !

साल यदि अच्छा रहा, तो भगवान को धन्यवाद देंगे ! यदि बुरा रहा, तो साल से निपटने की शक्ति मांगेगे !

जैसा भी हो निपटेंगे! लेकिन मैदान छोड़कर नहीं भागेंगे !

हर पुराने साल को सलाम कर हम बुढ़ापे की ओर बढ़ रहे है !

कैसा मजाक है, जवानी को छोड़कर बुढ़ापे की चादर समीप ला रहे है !

फिर भी साल को सेलिब्रेट कर जश्न मना रहे है !

बीते साल की सुखद घटनाओ को याद कर, वर्ष २००९ को बिदा कर रहे है !

नए साल का स्वागत कर, परम्परा का निर्वहन कर रहे है !
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Posted on Friday, January 01, 2010 5:18:00 PM
From Keshav Sahu
Res/sir,
Happy new Year 2010
very good..............................
Posted on
Dec
28
2009
Mon
1:43
PM
e mail
From Ram Purshottam Kasture

A Jobless man applied for the position of 'office boy' at Microsoft.
The HR manager interviewed him then watched him cleaning the floor as A test.

'You are employed' he said. Give me your e-mail address and I'll send
You the application to fill in, as well as date when you may start.

The man replied 'But I don't have a computer, neither an email'.

'I'm sorry', said the HR manager. If you don't have an email, that
Means you do not exist. And who doesn't exist, cannot have the job.'

The man left with no hope at all. He didn't know what to do, with only
$10 in his pocket. He then decided to go to the supermarket and buy a
10Kg tomato crate.
He then sold the tomatoes in a door to door round. In less than two hours,
He succeeded to double his capital. He repeated the operation three times,
And returned home with $60.

The man realized that he can survive by this way, and started to go
Everyday earlier, and return late. Thus, his money doubled or tripled Everyday.

Shortly, he bought a cart, then a truck, and then he had his own fleet
Of delivery vehicles.

5 years later, the man is one of the biggest food retailers in the US ..
He started to plan his family's future, and decided to have a life insurance.

He called an insurance broker, and chose a protection plan....
When the conversation was concluded the broker asked him his email.
The man replied,'I don't have an email.'
The broker answered curiously, 'You don't have an email, and yet have
Succeeded to build an empire. Can you imagine what you could have been
If you had an e mail?!!' The man thought for a while and replied,
'Yes, I'd be an office boy at Microsoft!'

Moral of the story


Moral 1
Internet is not the solution to your life..

Moral 2
If you don't have an Internet, and work hard, you can be a millionaire.

Moral 3
If you received this message by email,
You are closer to being an office boy/girl, than a millionaire. .........

i received this email on my inbox
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3 Comments
Posted on Thursday, December 31, 2009 12:52:05 PM
From Keshav Sahu
Nice story...
Posted on Wednesday, December 30, 2009 8:50:04 PM
From Meenakshee Pande
Nice story...I believe that GOD,HARD WORK AND LUCK,if these three things are with you no one in the world can beat you..Here we are talking about the Internet and e-mails,but how it come in exists?It was the man's intelligence n hard work..Before that man was already a "Millionaire"...so it do not affect our life we are having internet or not....I really appreciate Ram uncle for sharing this story with us...
Posted on Monday, December 28, 2009 5:06:19 PM
From Nani Manna
May I add another moral? Nothing works like hard work & perseverance.
Posted on
Dec
28
2009
Mon
12:04
PM
जल स्तर
Modified on
Dec
28
2009
Mon
1:27
PM
From Ram Purshottam Kasture




पिछले गर्मियों में चारो तरफ पानी की मारा मार थी । भोपाल में एक दिन छोड़कर पानी दिया जाने लगा ! इंदौर में तो पानी के लिए खून भी बह गया । पानी आन बान और शान बान गया । जल स्तर काफी नीचे चले जाने के कारण नलकूप भी जवाब देने लगे । सरकार ने जल कष्ट से निपटने के लिए करोडो रूपये पानी तरह बहाए । इस समस्या से निपटने का कोई ठोस उपाय नहीं हो सका । इस वर्ष नवम्बर में पानी गिरने के कारण शहरो में यह समस्या अभी उभरकर नहीं दिख रही है ।

मार्च- अप्रैल से यह समस्या फिर से सामने आने वाली है । देश में बरसात अछी नहीं होने के कारण यह स्थिति बन रही है । बरसात अछी नहीं होने के लिए कई कारण गिनाये जाते है ।

हमारे प्रदेश में अछी वर्षा के लिए हर वर्ष लाखो की संख्या में पेड़ लगाने का अभियान चलाया जाता है। वृक्ष लगाने के कार्यो की विभिन्न स्तरों पर बैठके भी बहुत होती है । इन अभियानों का अंत भी सुखद नहीं हो रहा है। बरसात ख़त्म होते ही अभियान भुला दिया जाता है । पिछले तीन वर्षो से यह अभियान चल रहा है। अभियान की सफलता दूर दूर तक नहीं दिखती है ।

यदि यह अभियान २५% भी सफल हो जाता तो सारे शहर हरे भरे हो जाते । भोपाल की हरियाली आज से १०-१५ साल पूर्व की देन है । भोपाल में ही इस अभियान को जांचा परखा जा सकता है ?

शहर की सभी सड़के सीमेंट से बनायीं जाने लगी । गली कूचो में भी सीमेंटीकरण हो गया है । इन सडको का बहाव नाली की तरफ कर दिया जाता है । इस कारण नाली का पानी नालो, नालो का पानी नदियों में और नदियों का पानी समुद्र में चला जाता है ।

इस प्रकार बरसात के पानी के सबसे बड़ा भाग से शहर वंचित रह जाता है । इस कारण जल स्तर प्रति वर्ष नीचे की और जा रहा है । सीमेंट की सडको के बीच में १५-२० फिट के दुरी पर आधे फुट डायमीटर के पाइप लगाकर इनको १० फुट जमीन में गाड़कर सडको और इसके आजु बाजु से बहने वाले पानी को जमीन के अंदर भेजा जा सकता है बशर्ते कि सडको का ढलान इन पाइप को और केन्द्रित हो । हर सीमेंट या डम्बर क़ी सडको पर यह प्रयोग किया जा सकता है । जल स्तर बढाने का यह प्रयोग तो किया ही जा सकता है ।

इस बरसात में यह कार्य तो किया जा सकता । रेन वाटर हारबेस्टिंग का खूब नाम चला । नगर निगमों ने इस कार्य को करने वालो को सम्पति कर से छुट देने के लिए एक्ट में प्रावधान भी किया । नागरिको ने सम्पति कर से छुट मिलने लायक काम कर लिया । इस दिशा में भी ईमानदारी से प्रयास नहीं हुए है । पानी के रिसाय्कलिंग पर भी कार्य चल रहा है। कुल मिलाकर पानी के लिए सारे उद्योग किये जा रहे है । मेरे विचार से जो भी कार्य हो ठोस और परिणात्मक हो । पानी के लिए हाय तोबा काम होगी ।
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Posted on Tuesday, January 05, 2010 12:47:58 PM
From Kailash Choudhary
PANI BI SAB SOON..... ONE TREE SERVES RS. 135OO IN ITS LIFE .MASS PLANTATION IS NECESSARY TO SAVE EARTH.
Posted on Wednesday, December 30, 2009 9:00:37 PM
From Meenakshee Pande
I really agree with you Sir...In Maharashtra in my city akola we get corporation's water after 8 days..can you really believe....8 days we have to store that water and use...I really think that strict action must be taken on these...because in winter we are getting water after 8 days...then what in summer??Government should think on this...
Posted on
Dec
22
2009
Tue
10:18
PM
आज व्यथित हूँ !
Modified on
Dec
23
2009
Wed
6:18
PM
From Ram Purshottam Kasture




आज व्यथित हूँ !

दुखी हूँ !

क्यों लोग हम जैसे लोगो को कष्ट देते है !

अपनी लाइन को बड़ा करने की बजाय,

हम जैसे लोगो की लाइन क्यों छोटी करते है !

क्या आप हमें यह दिखाना चाहते हों कि !

आप हमसे बड़े हों !

हाँ आपको आपको बड़ा मानते है !

आप महान है !

आप बलशाली है !

महान तक़दीर वाले है !

मुकदर के सिंकदर हो !

आज आपका जमाना है ?

हम आपको प्रणाम करते है !

फिर भी आप हमको स्वीकार क्यों नहीं करते हो !

हम जानते है कि आप चोर कि दाढ़ी में तिनका पर विश्वास करते हो !

आप ने कभी गिरेबान में झाककर देखा ,

आप क्या हो !

जिन्दगी में पैसा या और सब कुछ नहीं है !

इंसानियत भी कुछ है !

आप अपने घर में हो, कुछ भी बोल सकते हो !

क्या आप आप कुंती पुत्र हो !

ना यहाँ कोई कुंती पुत्र है ना कोई सूत पुत्र !

सूत पुत्र ने भी तो कुंती की खोख से जन्म लिया है !

एक ही खोख से जन्म लेने वाले !

सभी योध्या होते है !

युध्य से क्यूँ भागते हो !

पीठ पर छुरा क्यों घोपते हो !

यह कुंती पुत्र की पहिचान नहीं है !

गांधारी के पुत्र हो ?

आप ही गांधारी कि आँख कि पट्टी के जिम्मेदार हो ?

छल कपट से क्यों हमारे सामने क्यों आते हो !

यदि हिमंत है ! तो कर लो तुलना !

हम अकले ही काफी है !

१०० के बराबर !

छल कपट की राजनीती क्यों चला रहे हो !

ये मत भूलो की आप भी इन्सान हो !

हमारी कमजोरी का फायदा मत उठाओ !

माना की भीष्म पितामह आप के साथ है,

क्यों विदुर को हमसे दूर समझते हो ?

भगवान कृष्ण हमारे साथ है !

फिर भी कहा से हिमंत जुटाते हो !

शकुनी जैसा आपका हश्र होगा !

जिन्दगी भर शकुनी मामा के नाम से,

जाने जाओगे !

फांसे फेकते रहोगे !

कोई रोने वाला भी नहीं आयेगा !

ना गांधारी आयेगी, ना दुर्योधन !

इतिहास को कंलकित कर दोगे !

यह दोष भी हमारे सर मढोगे !

ऐसे ही होती है मति भ्रष्ट !

मुझे लिखने में आती है शर्म ?

आपको भला बुरा बोलना मेरे संस्कार में नहीं है !

इसके बाद भी यह लिखकर मै ,

भगवान कृष्ण के वचनों की याद दिलाता हूँ

९९ बार भी वचन वार करके भी आपको माफ़ करता हूँ ?

आपका १०० वचन मै सहन नहीं करूँगा !

आपका इस के बाद क्या होगा ?

यह स्वयं जान लो !
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Posted on Wednesday, December 23, 2009 1:40:31 PM
From Kailash Choudhary
sar....lagta hain ki dil par gahri chot lagi hain.....jab chot lagti hain to dil se baddua nikalti hain .....kabir ne kaha hain dil ki aah se loha tak bhasm ho jata hain...phir dil dukhane wala kya cheez hain...samay bada balwan hain..bura karne wale ko kala kawwa kate...
Posted on
Dec
20
2009
Sun
9:48
PM
दलाल
Modified on
Dec
21
2009
Mon
12:31
PM
From Ram Purshottam Kasture
आज के युग में यह शब्द बहुत कामन हो गया है !
हर जगह इस नाम के आदमी मिल जाते है !
ना मुमकिन काम को ये संभव बनाते है !
हर किसी को ये साध के रखते है !
हर टेबल इन्हें आदर की द्रष्टि से देखता है !
क्यूंकि इनके बाल बचों का ये पेट भरते है !
जो खुद नहीं खाते उनको खिलाते है !
हर किमंत पर इनकी जरुरत को पूरा करते है !
भविष्य इनका है उनको यह मालूम है !
उनके लिए हर काम करते है !
कठिन काम को ये आसानी से कर लेते है !
ये ईमानदारी से सबको अपना हिस्सा देते है !
क्रेता और विक्रेता के बीच के ये कड़ी है !
इन दोनों को अपने अनुकूल बनाते है !
मुंह माँगा दाम इनको मिलता है !
क्रेता से लेकर, विक्रेता के हर टीम के आदमी को ये बाटते है !
उपर से कराकर लाते है !
नीचे से जो चाहे कराने की इनकी ताकत है !
इसलिए ये दलाल कहलाते है !
मंत्री से संत्री तक इनका दोस्त है !
बीच का पैसा ये खा लेते है !
इसलिए आज करोड़ पति के जमात में ये खड़े है !
आज के दलाल जो, इनका काम, नहीं करता उसको को बेवकूफ समझते है !
यही तो मज़बूरी है !
जिसको नादान समझते है वह आदमी है !
ईमानदार है ! ऐसा वैसा काम नहीं करते !
इसलिए उनको बदनाम करते है !
जलील करते है !
शिकायत करते है !
चरित्र में का कमजोर है ?
शिखंडी के तुलना इनसे की जाती है !
नपुंसक खुद होते है !
क्यूंकि न ये क्रेता होते है न विक्रेता
अपना हर दाव पर लगाकर क्या ?
कहलाना चाहते है ?
ऐसे ही लोग आज सफलता पूर्वक हर
समारोह की अध्यक्षता कर रहे है !
हर संस्था को दान दे रहे है !
ऐसे समय लोग इनका गुणगान करते है !
बचे समय में इनको दलाल कहकर
अपने घर, का व्यापारी कहते है !
अंत में दलाल ही विजयी होता है !
क्युकी मंत्री से संत्री तक इनका होता है !
हर कोई हथकंडा अपना सकते है !
कोई भी परेशानी में डाल सकता है !
इस कारण शरीफ इन्हें पहले , बाद में दुसरो को प्रणाम करते है !
डरपोक किस्म के लोग इनको नागपंचमी के दिन अपने घर में दावत पर भी बुलाते है !
दूध पीकर भी फन फनाते है !
कब काट ले कोई भरोसा नहीं होने के कारण
लोग इन्हें आस्तीन में पालकर रखने का प्रयास करते है !
फिर भी जब मन आये काट लेते है !
इसी कारण इन्हें आस्तीन का सांप संबोधन भी प्राप्त हुआ है !
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Posted on Wednesday, December 23, 2009 1:44:46 PM
From Kailash Choudhary
very nice blog... thanks
Posted on
Dec