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Book Review : Raghuvansham

मूल काव्य की भाव्य धारा में भीतर तक उतरकर किया गया अनुवाद है यह...

प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव विदग्ध कृत महाकवि कालिदास के रघुवंष महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद एक उल्लेखनीय रचनाकर्मी कृति है। पहला प्रष्न मन मे यह उठता है कि मेघदूत के अनुवाद के बाद उन्होने अपने काव्य कौषल से समन्वित रघुवंष का ही पद्यानुवाद क्यों किया। महाकाव्य की दृष्टि से और लयात्मक प्रस्तुति की दृष्टि से तथा रघुवंष मे अधिक छंदो के प्रयोग के कारण, साथ ही शंकर पार्वती के कथा प्रसंग के कारण वे कुमार संभव का अनुवाद कर सकते थे। छोटे केनवास अनुवाद करने की अभिलाषा से प्रकृति के प्रति सहृदय काव्यांजलि के रूप मे ऋतु संवार को ले सकते थे। एक नया प्रयोग करते हुये या तो संपूर्ण अभिज्ञान शाकुंतलम का या उसके पद्यो का सुदंर अनुवाद भी वे कर सकते थे। किंतु यह सब न करते हुये उन्होने रघुवंष को चुना इसका क्या कारण हो सकता है।
इसके लिये हमे पद्यानुवादकर्ता श्री श्रीवास्तव जी के व्यक्तित्व की ओर ध्यान देना आवष्यक है। वे प्रख्यात षिक्षा शास्त्री है और षिक्षा संकाय के विभिन्न पाठ्यक्रमो मे अध्यापन करते रहे है। नर्मदा तट मंडला (माहिष्मति) जैसी पवित्र एवं पुरातन नगरी के स्थाई निवासी प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव जी का संपूर्ण परिवेष सांस्कृतिक है। अपितु उनके अवचेतन मन पर भारतीय परपरा और संस्कृति के बहुत गहरे संस्कार है। वे हिंदी मे एम.ए., साहित्य रत्न, अर्थषास्त्र मे एम.ए. और एम.एड है। भावुक मन के धनी और संवेदनषील होने के कारण बाल्यावस्था से सृजन के लिये अकुलाहट उनकी तत्कालीन काव्यरचनाओ मे दृष्टिगोचर होती है। वे उस पीढी के सदस्य है जो विषेषज्ञता के नाम पर अपने आप किसी एक सीमा मे कवच मे बांधकर जीना नही चाहते। परिणामतः उनकी कृतियो मे विषयगत प्रतिपादक के रूप मे व्यक्तितत्व मे अनेक धाराओ का दर्षन होता है। यही कारण है कि वे भारत की सांस्कृतिक वाणी संस्कृत के भी अच्छे पाठक और सहृदय अनुवादक है। मेघदूत का काव्यानुवाद वे पहले ही कर चुके है।
अभी उनके द्वारा रघुवंष महाकाव्य के चुनाव का प्रष्न यद्यपि अनुत्तरित है तो भी महाकवि कालिदास के प्रति सहज प्रेम के बीज उनके व्यक्तित्व मे निहित है। अनेक टीकाकारो लोकश्रुति एवं आधुनिक विद्वानो ने भी महाकवि कालिदास की रचनाओ मे रघुवंष को श्रेष्ठतम माना है। अभिज्ञान शांकुलतम की प्रषंसा करते हुये हमारी काव्य कामधेनु लोक त्रुति कहती है ‘‘काव्येषु नाटकं रम्य तत्ररम्या शंकुतला‘‘ काव्यो मे नाटक श्रेष्ठ है। और उन सभ्ीा नाटको मे कालिदास दूसरी ओर काव्य शास्त्र के लगभग सभी आचार्य प्रबंध रचना के महत्व को स्वीकार करते हुये महाकाव्य की परिभाषा बडे उत्साह से करते है। अत‘ स्वभावतः दृष्य और मुक्तक दोनो की तुलना मे महाकाव्य को वरीयता मिलती रही है। यह एक प्रत्यक्ष कारण रघुवंष के चुनाव के लिये प्रो. श्रीवास्तव को प्रेरित कर रहा होगा। यहा यह उल्लेखनीय है कि महाकवि कालिदास के दोनो महाकाव्यो का अंत अधूरा है। कुमारसंभव को लेकर विवाद हो सकता है फिर भी तारकासुर के वध के लिये कुमार कार्तिकेय के संभव अर्थात जन्म की प्रतिज्ञा कर लिखे महाकाव्य मे उस ंिबदु तक तो कम से कम पहुचंना ही चाहिये था। कुमारसंभव एक नायक महाकाव्य है परंतु रघुवंष बहुनायक महाकाव्य है। यह भी अपूर्ण है। ऐसी जगह काव्य रूक गया है जहां के अनुभव बडे तिक्त और कटु है। महाकवि ने पुराण और महाभारत की वस्तु प्रतिपादन शैली का अवलंब लेकर रघु के वंष के प्रमुख चरित्रो पर यह काव्य रचना की है। रघु दिलीप अज दषरथ और राम के चरित्रो तक जो उज्जवलतम दीप मालिका राम के चरित्र के दीपस्तभं के रूप मे षिखर तक पहुचंती है वही अग्निवर्ण जैसे घृणित राजसत्ता के उपजीव्य तक पहुचंते पहुंचते अधंकारमय हो जाती है। महाकवि ने वहा पर ही महाकाव्य क्यों समाप्त किया इस पर भी एतिहासिक सामाजिक अकाल मृत्यु आदि आधारो पर विद्वानो ने अपने तर्क दिये है जो भी हो रघुवंष अपने वर्तमान रूप मे हमारे सामने है जो संपूर्ण संस्कृत महाकाव्य परंपरा से पृथक और विलक्षण है।
जहां तक काव्य सौष्ठव और भाव संपदा का प्रष्न है रघुवंषम संस्कृत वांगमय और उनके स्वंय की कृतियो की तुलना मे सर्वोत्तम और अद्वितीय है। अनुष्टुप जैसे छोटे छंदो मे भी गहरी काव्य अनुभूति करना केवल महाकवि कालिदास के ही वष की बात थी। यही कारण है कि विष्व साहित्य मे मेघदूत अभिज्ञान शांकुलतम और रघुवंष का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव विदग्ध ने अपने स्वाध्याय प्रेमी व्यक्तित्व के कारण महाकवि कालिदास का पूरा साहित्य पढा और मुक्तको मे श्रेष्ट मेघदूत तथा महाकाव्य मे श्रेष्ठ रघुवंष को अनुवाद के लिये चुना। प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव जी की सहृदयता पारंपरिक पीढिया और वर्तमान विदू्रपता विषेषतः राजसत्ता की निरकुंष व्यवहार शैली मे उन्हें रघुवंष को हिंदी मे अनुवाद करने के लिये चुनने हेतु प्रेरित किया होगा।
अब बात उनके अनुवाद की है। अनुवाद करना मूल रचनाकर्म से अधिक गूढ कार्य है। मूल रचना मे आपके काव्य संसारे कविदेक प्रजापतिः यथास्मै रोचते विष्वं तथेंव परिवर्ततः
अपार काव्य संसार की सृंिष्ट करने के लिये कवि ही एकमात्र ब्रम्हा है। वह अपने संसार को जैसा रूप देना चाहता है ब्रहमा जी की सृष्टि से भिन्न भी तो वह नया रूप देने मे समर्थ है। किंतु अनुवादक बहुत भावाकुल होने पर भी उसे अपनी सृजनात्मक अभिव्यक्ति को बर्बस रोकना पडता है। दूसरी ओर कवि की आत्मा मे पर देह प्रवेष भी करना पडता है। यह परव्यक्ति अनुभव के तादात मे समाधि की तरह है। वहां तक पहुंचना फिर योग्य शैली पद्यति पदावली और भावाभिव्यक्ति को प्रस्तुत करने मे कुषलता आदि अनुवाद से की जाने वाली महति अपेक्षाये है।
वैसे तेा अनेकानेक व्यक्तियो ने मेघदूत और रघुवंष का पद्यानुवाद किया है। किंतु प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव की तन्मयता और अनुवाद कुषलता प्रषंसनीय है। रधुवंष बहुत बडा महाकाव्य है। कालिदास की कृतियो मे एक गहरी दार्षनिकता भी है। जिसे अनुदित करना कठिन कार्य है। रघुवंष का प्रथम पद्य इसका उत्तम उदाहरण है। छोटे छंद अनुष्टुप मे किया गया मंगलाचरण का अनुवाद करते हुये प्रो चित्रभूषण श्रीवास्तव ने लिखा है
जग के माता पिता जो पार्वती षिव नाम
शब्द अर्थ समएक जो उनको विनत प्रणाम
इसी भांति महाकवि कालिदास द्वारा दिलीप की गौसेवा का जो सुरम्य वर्णन किया गया है उसका अनुवाद भी दृष्टव्य है।
व्रत हेतु उस अनुयायी ने आत्म, अनुयायियो को न वनसात लाया
अपनी सुरक्षा स्वतः कर सके हर मुनज इस तरह से गया है बनाया
जब बैठती गाय तब बैठ जाते रूकने पे रूकते और चलने पे चलते
जलपान करती तो जलपान करते यूॅ छाया सृदष भूप व्यवहार करते।
रघु के द्वारा अष्ममेघ अष्व की रक्षा के प्रसंग मे इंद्र से युद्ध करते हुये उसके महत्व को स्वंय इंद्र रेखांकित करते हुये कहते है
वज्राहत रघु के पराक्रम और साहस से होकर प्रभावित लगे इंद्र कहने
सच है सदा सद््रगृणो मे ही होती है ताकत सदा सभी को करने सदा वष मे
रघु की दिग्विजय के संदर्भ मे कलिंग के संबंध मे अनुवाद की सहजता देखे
बंदी कर छोडे गये झुके कलिंग के नाथ
धर्मी रघु ने धन लिया रखी न धरती साथ
कौरव की गुरूदक्षिणा का संदर्भ देखे
पर मेरे फिर फिर दुराग्रह से क्रोधित हो
मेरी गरीबी को बिन ध्यान लाये
दी चैदह विद्या को ध्यान रख
मुझसे चैदह करोड स्वर्ण मुद्रा मंगाये
अज अब इंदुमती के स्वंयवर के लिये आये है रात्रि विश्राम के बाद प्राप्त बंदिगण स्तुति कर रहे है।
मुरझा .चले हे पुष्प के हार कोमल औं फीकी हुई जिसकी दीप्त आभा
पिंजरे मे बैठा हुआ छीर भी यह जगाता तुम्हे कह हमारी ही भाषा
रघुवंष का छटवा संर्भ अत्यंत लोकप्रिय एवं आकर्षक है। इसकी उपमाये उत्प्रेक्षाये एवं उपमानो का ग्रहण अदभुत एवं पूर्णतः सार्थक है। इसी सर्ग के दीपषिखा के उपमान के कारण महाकवि कालिदास को दीपषिखा कालिदास यह विरूद प्राप्त हुआ। इंदुमती के स्वंयवर मे आये राजाओ का मनोरम वर्णन विज्ञ चारणो के द्वारा किया जा रहा है। उसके बाद इंदुमती की सखी एक एक राजाओ की वरण योग्य विषेषताये बता रही है। यह सुनंदा सामान्य नही है।
तभी सुनंदा ने इंदुमती को मगध के नृप के समीप लाकर
सभी नृपो की कुलषील ज्ञाता प्रतिहारिणी ने कहा सुनाकर
अपने प्रिय एवं स्थायी निवास स्थान महिष्मति के राजा प्रदीप का उसके पूर्वजो अनूप और सहस्त्रबाहु सहस्त्रार्जुन की पीढिता के साथ परिचय देते हुये अंत मे सुनंदा ने कहा
इस दीर्घ बाहु की बन तू लक्ष्मी यदि राजमहलो की जालियो से
माहिष्मति की जलोमि रचना सी रेवा जो लखने की कामना है
इन छह पद्यो का अनुवाद चित्रभूषण श्रीवास्तव ने बडे मनोयोग एवं भाव प्रबलता के साथ किया है। महाकवि का उज्जयनी प्रेम प्रसिद्ध है। अनुवादक कवि विदग्ध भी इससे अछूते नही है। सुनंदा के साथ कवि का अनुवाद दृष्टव्य है।
ये विषाल बाहु प्रषस्त छाती सुगढ बदन है अवंतिराजा
जिसे चढा शान पैर सूर्य सी दीप्ति के गढता रहा है जिसे विधाता
इन पद्यो के द्वारा अनुवादक का संस्कृत भाषा का गहरा ज्ञान काव्य स्वाद का उत्तम अभ्यास और भाषातंर करने की प्रषंसनीय क्षमता का परिचय मिलता है। इसके अतिरिक्त ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रो मे दिये गये उनके योगदान से भी उनकी बहुमुखी प्रतिभा का अनुभव होता है। इस परिपक्व वय मे ऐसी जिज्ञासा बौद्धिक प्रभाव और गतिषीलता दुलर्भ है। वे आज भी के तरूण की भांति नगर की सांस्कृतिक एवं साहित्यीक गतिविधियों का गौरव बढा रहे है।
मै प्रो चित्रभूषण श्रीवास्तव को उनकी इस कृति के लिये हृदय से बधाई देता हॅू। मुझे पूरा विष्वास है कि निकट भविष्य मे भी उनकी समर्थ अनुवाद की भूमिका एवं स्वतंत्र एवं मूल लेखन की सहज प्रवृत्ति के कारण और भी उल्लेखनीय कृतिया सामने आयेगी। मेरा विष्वास है कि रघुवंष हिंदी पद्यानुवाद सुधिजनो को आल्हादित एवं संतुष्ट करेगी।
आचार्य कृष्णकांत चर्तुवेदी
पूर्व निदेषक कालिदास अकादमी उज्जैन

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Raghuvansham
Category : Poem
Book Title : Raghuvansham
Author : Prof. Chitrabhushan Shrivastav
Publication : Arpit PublicationHaryana
Primary Language : Hindi

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