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नागवंश और आस्तिक बाबा का दरबार आलेख

बचपन में कही दादी नानी की कहानियों में एक बात बतायी जाती थी कि धरती शेषनाग के फन पर टिकी है और जब शेषनाग थोडी सी भी करवट लेते हैं तो धरती पर जलजला आ जाता है। भले प्रत्यक्ष रूप में किसी शेषनाग के दर्शन न होते हो लेकिन सचमुच कोई तो है जिसके श्फनश् यानी श्हुनरश् पर तो अवश्य ही टिकी है हमारी धरती। हिन्दू संस्कृति में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन नाग पूजा किये जाने का विधान है जिसे नाग पंचमी के रूप में जाना जाता है।

अब शंकर जी के मंदिर में मूर्ति के गले में लिपटे सर्प हों अथवा शिवलिंग के चारों ओर बने अरघे में घेरा डालकर फन फैलाकर बैठे किसी नागदेवता की प्रतिक्रतिए हमारे हाथ स्वयमेव नमन की मुद्रा में उठ ही जाते हैं। सचमुच हिन्दू संस्कृति में सांपों का महत्व अद्वितीय है। सांपों के प्रति आस्था का आलम इस सीमा तक है कि शंकर जी के मंदिरों के बाहर अनेक संपेरे अपने सांपों की डलिया लेकर इस आशा में खडे रहते हें कि आपकी श्रद्धा का कुछ अंश उनके लिये भी रोटी की व्यवथा अवश्य कर सकेगी। नाग को सांपों के राजा के रूप में जाना जाता है और इतिहास में इनके नाम पर नागवंश का बडा इतिहास निहित है। यूं तो नागवंश के संबंध में भांति भांति की मान्यतायें हैं परन्तु सभी विद्वान इस बात पर एक मत हैं कि नाग भारत की एक प्रतापी जाति थी। आधुनिक युग के नाग जातिधारी भी इसी नाग प्रजाति के ही वंशज होने चाहिये।

नाग वंश के प्राचीनतम प्रमुख मनीषी के रूप में महर्षि कपिल मुनि का नाम लिया जा सकते हैं जिन्होंने राजा सगर के साठ हजार पुत्रों को भस्म किया था। कालान्तर में राजा सगर के वंश में राजा भगीरथ पैदा हुये जिनका तप सर्वविदित है। उन्होंने नाग वंशीय मनीषी कपिल मुनि के द्वारा भस्मीभूत किये गये अपने पुरखों की आत्मा की मुक्ति के लिये कठोर तप किया तथा तप से प्रसन्न हुये भगवान शंकर से वरदान मांगकर मां गंगा को धरा पर उतारा । गंगा के धरतीपर अवतरण के उपरांत ही राजा सगर के पुरखे तर सके। यही गंगा आज भी भारतवर्ष की जीवनरेखा है। नाग वंश का नाम नागों के नाम पर संभवतः नाग की तरह के रंग के कारण अथवा नागों को पालने में दक्ष होने के कारण पडा होगा। नाग प्रजाति की विशेषता यह थी कि वे नाग की तरह घात करके छिपने में दक्ष थे तथा नागों को पकडकर उनका विष निकाल कर विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लाते थे एक ऐसे ही घातक अस्त्र का नाम नागपोश होता था। महाभारत काल में श्रीकृष्ण के सहयोग से अर्जुन ने हस्तिनापुर राज्य के विस्तार हेतु खांडव वन का दहन किया जिससे इस क्षेत्र में निवास करने वाली नाग प्रजाति का भारी विध्न विनाश हुआ। इस प्रकार अर्जुन के हाथों अनजाने ही नाग वंश को बहुत हानि पहुंच गई। श्रीकृष्ण ने बचपन में ही नागवंश के पुराने श कहा जाता है कि नाग पीढी दर पीढी वंश दर वंश अपना बदला नही छोडते। नाग वंश ने हस्तिनापुर राज्य से अपने विनाश का बदला लेने की ठानी। इसी मान्यता को सिद्व करते हुये एक नागवंशी योद्वा तक्षक द्वारा अर्जुन के पुत्र परीक्षित को मार दिया गया। परीक्षित के प्राण नागविष के बुझे उसी घातक अस्त्र द्वारा लिये गये जिसे नागपोश कहा जाता था। क्रोधित होकर परीक्षित के पुत्र जनमेजय द्वारा अनेक नागपुरूषों को बंदी बनाकर आग में जीवित झोंक दिया गया और इसे सर्प यज्ञ का नाम दिया तो नागराज आस्तिक के द्वारा कुछ प्रमुख नागों को बचा लिया गया। आस्तिक मुनि ने श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन नागों की रक्षा की थी तभी नागपंचमी की यह तिथि पर्व के रूप में मनायी जाने लगी। कहा जाता है कि तब सर्पो ने आस्तिक मुनि को यह वरदान दिया था कि जहां जहां उनका नाम लिया जायेगा वहां सर्प अपना जहर नहीं फैलाऐगे न ही कोई उपद्रव करेंगे। आज भी यदि कहीं सांप आ जाते हैं तो

'' ष्ष्मुनि राजम् अस्तिकम् नमः''

मंत्र का जाप किये जाने पर सर्प के लौट जाने का विश्वास विद्यमान है। इस प्रकार इतिहास में नागवंश के रक्षक के रूप में आस्तिक महाराज का नाम लिया जाता है। इनकी माता मनसा देवी तीर्थ के रूप में हरिद्वार मे विराजमान है।

हरदोई जनपद के लिये यह सोभाग्य का विषय होना चाहिये कि यहां एक स्थान पर नागों के इन्ही रक्षक आस्तिक बाबा का दरबार है जो श्रद्धा का केन्द्र होने के साथ साथ स्वयं में प्राग्ऐतिहासिक काल की अनेक कथाओं का मूल भी समेटे है। हरदोई के ऐक कस्बे का नाम बिलग्राम है जो इसी तहसील के सुदूर अंचल में स्थित है एक ग्राम बारामऊ। नवसृजित सवायजपुर तहसील बनने से पहले कटियारी पंचनद क्षेत्र का यह गांव बारामऊ इसी तहसील बिलग्राम में आता था। यह ग्राम बारामऊ गंगा और रामगंगा नदी के संगम से पहले निर्मित बेसिन मे पडता है। यहां जनपद फर्रूखाबाद में गंगा और रामगंगा नदी पर बने पुलो के बीच स्थित रामनगरिया मेला क्षेत्र से होकर बने मार्ग द्वारा पहुंचा जा सकता है। रामनगरिया मेला क्षेत्र से लगगभ 25 किलोमीटर इस बेसिन जिसे स्थानीय भाषा में कटरी कहा जाता है मे चलने के बाद पहला गांव अर्जुनपुर पडता है। इस स्थान से लगभग पन्द्रह किलोमीटर दूर चलने पर बारामऊ नामक एक ग्राम पडता है आया जो पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी जान पडता है। इस ग्राम में प्रवेश करने पर एक प्राचीन मंदिर मिलता है जिसके गुंबद और उस पर चढे पीतल के कलश की आकृति देखकर इसकी एतिहासिकता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। जब मैं यहां पहुंचकर इसके निर्माण का साक्ष्य तलाशने लगा तो इस जीर्ण मंदिर की एक दीवार पर एक शिलालेख लगा दिखा जिस पर अंकित तिथि के अनुसार यह निर्माण लगभग 150 वर्ष पूर्व संवत 1942 में होना बताया गया जबकि खंडित मूर्तियों के अवशेष अधिक पुराने प्रतीत होते है। मैं जब इस गांव में चंद कदम आगे आगे बढा तो इसी गांव के बीच स्थित आस्तिक बाबा का दरबार देखने को मिला। इस दरबार के दर्शन करने पर अनेक मिथों और पौराणिक तथ्यो की जानकारी हुयी। इस दरबार में सर्पो की अनेक मूर्तियां तो हैं ही मिट्टी की कच्चे फर्श पर सर्पो की बांबियां भी हैं। सर्प देवता की एक मुख्य मूर्ति है जिसके चारों ओर राख की बनी हुआ अरघे जैसी आकृति है। स्थानीय नागरिक किसी शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पूर्व पहला निमंत्रण आस्तिक बाबा के दरबार में देते हैं और त्यौहार के अवसर पर भोजन बनाकर पहली खुराक आस्तिक बाबा को अर्पित करते हैं।

आस्तिक बाबा के प्रांगण मे नीम का ऐक पुराना पेड है जिसके नीचे शिवलिंग स्थापित है और इसके संबंध में यह विश्वास किया जाता है कि नाग पंचमी के दिन अर्पित दूध यहां पर यहां के स्थानीय निवासियों का विश्वास है कि आस्तिक बाबा उनके क्षेत्र के कुलदेवता है और उनके परिवार की सुरक्षा के लिये आस्तिक बाबा की कृपा का उनपर बना रहना ही एकमात्र शर्त है। यहां पर नाग के प्रतीक के रूप में चांदी अथवा तांबे की सर्प प्रतिमाऐं अथवा रस्सी में सात गांठे लगाकर उसे नाम का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की जाती है। सर्प की बाम्बी का पूजन किया जाता है और दूध चढाया जाता है। गांव से बाहर बस गये लोग बाम्बी की मिट्टी अपने घर में लाकर कच्चा दूध मिलाकर चक्की चूल्हे आदि कपर सर्प की आकृति बनाते हैं। शेष मिट्टी में अन्न के बीज बोते है जिसे खत्ती गाडना कहा जाता है। इस दिन भीगा हुआ बाजरा और मोठ खाने का भी विधान है । मन में विचार कौंधा कि इस गांव में आस्तिक बाबा का दरबार स्थित होना निश्चित रूप से किसी पौराणिकता से जुडा होगा।

उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में यह किवदंती भी व्याप्त है कि भगवान कृष्ण के भाई बलराम के नाम पर ही बिलग्राम नाम का कस्बा बसाया गया था। तो क्या सचमुच बिलग्राम तहसील के इस ग्राम का संबंध महाभारतकाल से है ?

कहीं यह स्थल अर्जुन के पौत्र जनमेजय द्वारा सर्प यज्ञ में दी गयी नागवंश की आहुति में प्रमुख नागों को बचाने के लिये आस्तिक द्वारा किये गये किसी प्रयास की ऐतिहासिकता से तो नहीं जुडा है ?

क्या महाभारत काल में अर्जुन के जिस हस्तिनापुर के विस्तार के लिये जिस खांडव वन को तहस नहस किया गया वह गंगा रामगंगा के इसी बेसिन में स्थित था ?

क्या महाभारतकालीन पात्र जनमेजय आस्तिक आदि का इस क्षेत्र से कोई संबंध है ?

गांव के प्रवेश द्वार पर बने एक पुराने शिवालय में लगा कलश नाग की मुद्रा में मुडा हुआ है। इसके पीछे भी कोई ऐतिहासिकता है क्या ?

हस्तिनापुर राज्य के विस्तार हेतु खांडव वन को नष्ट करने में जिस श्रीकृष्ण की प्रमुख भूमिका थी के उनके बडे भाई बलराम के नाम पर स्थापित बिलग्राम की जो किंवदंती है उसके पीछे कोई ऐतिहासिकता तो नहीं .? 

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