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Dr.girijesh Saxena : Blogs

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कहानी (भोपाल) बस स्टैंड की

गत कुछ दिनों से नगर के प्रमुख समाचार पत्र दैनिक भास्कर में भोपाल बस स्टैंड को वर्तमान स्थान नादिरा बसस्टैंड से हटा कर नाव बहार सब्ज़ी मंडी के स्थान पर स्थानन्तरित करने के समाचार छप र हे
है. मैंने अपने जीवन कल में इस स्थानन्तरण से हुए नुक्सान को देखा महसूस किया है , इस दर्द पर आधारित एक व्यंग प्रस्तुत है क
कहानी बस स्टैंड की .
मैंने ज़िन्दगी में पहली बार आंख खोली मार्च 1945 को भोपाल की गुजरपुरा गली में। अंग्रेज़ो भारत छोड़ो ,इंकलाब ज़िंदा बाद और फिर १५ अगस्त १९४७ को सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा झंडा ऊँचा रहे हमारा विजय विश्व तिरंगा प्यारा। चलो साहब एक किस्सा ख़त्म हुआ पर मैं अपनी झाँसी नहीं दूंगी की तर्ज़ पर अपने नवाब साहब अड़ गए "मैं अपना भोपाल नहीं दूंगा। "खैर साब एकऔर जंग , विलीनीकरण आंदोलन ,ज़िंदाबाद मुर्दा बाद। अल्ला अल्ला खैर सल्ला ये कहानी भी ख़तम हुई ,1949 में विलीनीकरण भी हो गया। पहले चीफ कमिश्नर प्रोविंस बना फिर अपना भोपाल 1955 में मध्य प्रदेश की राजधानी बन गया।
आप कहेंगे क्या बकवास है ,इसका बस स्टैंड से क्या सम्बन्ध। साहबजी ऑंखें तो 1945 में खुलीं पर शहर देखने के लिए पैरों पर चलना भी तो ज़रूरी है। तो अब सुनिये पचपन 1955 का बचपन। भोपाल का बस स्टैंड मैंने 1954 -55 में बुधवारा जहाँ चार बत्ती चौराहा है वहां देखा था। वहां कबसे था न अब्बा ने बताया न बब्बा ने बताया। पर हाँ भोपाल रायसेन सीहोर तरफ की बसें आती जाती थी। वक़्त ने करवट बदली ,बस स्टैंड भी चल पड़ा सफर पर। तो साहब अब बस स्टैंड आया जुमेराती पुराने कबाड़ख़ाने। किले की पुरानी फ़सील ( किले 8 -10 फ़ीट चौड़ी चाहर दीवार या परकोटा ) के पार /नीचे । दो साल या चार साल मे घुमक्कड़ का दिल भर गया तो साहब फिर चल पड़ा और जाकर रुका नूर महल पर , नूर महल और नूर मियां के तालाब के बीच की मस्त ज़मीन इसे रास आई और हुज़ूर ने पैर फैला दिए। 1960 के दशक में पाँव रखा तो इसके डैनों का वहां सामना मुश्किल हुआ तो इसमें उड़ान भरी और (नादिरा बस स्टैंड ) हमीदिया रोड पर जाकर टिका .1965 -66 में किसी सिरफिरे का सिरफिरा, राजधानी दिल्ली से तुग़लक़ाबाद की तर्ज़ पर एक आलिशान छोर बेछोर मॉडल ग्राउंड पर फवक़्तन (अस्थायी रूप से )टिकाया , शहर को बताया नवाब बस स्टैंड साहब के लिए एक अलीशान अजीबुल मुल्क (देश की सबसे बढ़िया )इमारत की तामीर होनी है। साहब नादिरा बस स्टैंड की अब की ख़स्ता हाल ईमारत की तामीर की गयी और बस स्टैंड वापस आगया जहाँ अब है। शायद 1970 के दशक से यह शैतान ख़म ठोंक के हमीदिया रोड नादिरा बस स्टैंड पर जमा है। हाँ याद आया इस बीच इसने एक बार नादिरा से भी बेबफाई की और बेरसिया रोड की पुतली की और भागा पर पुतलीघर मैदान पर ज़्यादा नहीं टिक पाया और अपने अंडे बच्चे छोड़ कर वापस नादिरा पर आ गया ,बस तब से यहीं है।
हाँ तो साहब अब आते है मुद्दे की बात पर। मैंने ये सफरनामा यूँ ही नहीं गोद डाला है। इसका मक़सद है,मतलब है। जँह जँह पाँव पड़े संतन के तँह तँह बंटाधार की तर्ज़ पर हमारे नवाबजादे की गुण्डागिरी के निशान हरतरफ मौजूद हैं। मेरे कहने का मतलब है जहाँ जहाँ बस स्टैंड जाता है वहां एक अजीब सा माहौल साथ जाता है ;टूटे फूटे वाहन, ढेरो गर्दो ग़ुबार में ढके ,गंदे पुराने बॉडी पार्ट्स के ढेर ,कबाड़ ही कबाड़, गाली गलौज का माहौल ;खैर साहब कम कहे को ज़्यादा समझिये ,ज़्यादा कहूंगा तो कुछ लोग बुरा मान जायेंगे , मेरा जीना दूभर हो जायेगा।
सबसे पहले लीजिये बुधवारा। आज भी उस पूर्व आधी सदी के बस स्टैंड के मेकेनिक्स के शेड्स ,टिंकरों पेंटरो के टूटे फूटे अधकचरे वाहनों के जमावड़े मौजूद है यहाँ से फब्तियों और सीटियों की सताई महारानी लक्ष्मी बाई (महारानी लक्ष्मी बाई गर्ल्स कॉलेज) को अंततः अपना हाथीखाना छोड़ कर पॉलिटेक्निक चौराहे पर अपनी राजधानी ले जानी पड़ी। आइये अब बस स्टैंड जुमेराती पर तो साहब यहाँ तो बसों ट्रकों गाड़ियों कबाड़ियों का बाज़ार ऐसा बसा की अपने बाप बस स्टैंड के लिए भी जगह नहीं छोड़ी , पूरा बाक़ायदा कबाड़ी बाज़ार बन गया और बापू इस कमबख्त औलाद को पीछे छोड़ कर नूर महल चले गए।
1960 की बात है , भोपाल की बेनज़ीर नियामत तीन सीढ़ी तालाब थे।मैं अपनी ज़िन्दगी मैं हिंदुस्तान के पूरब से पच्छिम ,उत्तर से दख्खन दो बार घूम चूका हूँ , और हिंदुस्तान के बाहर भी विलायत समेत 12 - 15 देश घूम आया हूँ पर तीन सीढ़ी तालाब की मिसाल ऐसा नज़ारा कहीं नहीं दिखा ; एक ताजुल मसाजिद के पीछे मोतिया तालाब ,फिर सड़क बन्ध , दूसरा नीचे नूर महल की ज़मीन से लगा नूर मियां का तालाब और तीसरा मरघटिया महावीर / लाल मस्ज़िद के बीच मुंशी हुसैन खान की तलैया।बात में दम है इसलिए कह रहा हूँ। 1960 में मेरा दाखिला मॉडल स्कूल में हुआ था वहां सफ़ेद झक वर्दी वाली नेवल एन सी सी थी। हमने नूर मियां के तालाब में नेवी की बोट्स और राफ्ट्स पर बोटिंग रोइंग डाइविंग की ट्रेनिंग की थी। किनारे से नाव बढ़ाने के लिए ही दस पन्द्रह फिट का बांस डूब जाता था। मेरे यार बस स्टैंड साहब तो वहां से चले गए पर इस इलाके और तालाब की बर्बादी की दास्ताँ लिख गए। वही मेकेनिक वही बड़ी गाड़ियों के ढेर ,डेंटर,पेंटर ,कबाड़ कहाँ है वो खुशनुमा तालाब वो दिलक़श नज़ारा ????उफ्फ़ थक गया थोड़ी साँस ले लूँ।
बस स्टैंड साहब नूर महल से नादिरा पहुंचे , पैर पसारने को जगह मुनासिब पाई तो थोड़ा जमने का इरादा किया। जब तक ईमारत न बने तबतक मॉडल ग्राउंड की तफरीह सोचा। जब मैं मॉडल स्कूल में पड़ता था यह बे ओर चोर हमारे स्कूल का प्ले ग्राउंड था। हमारे हाकी, फुट बॉल , वॉलीबॉल ,इन्टर स्कूल मैचेस वगेराह सब एक सब साथ हो लेते थे ।,उस ज़माने के बड़े बड़े कमला सर्कस ,जैमिनी सर्कस,एशिया सर्कस भी यहीं डेरा डालते थे। पर मुन्ने मियां अब कहाँ है वो मॉडल ग्राउंड, ढूंढ के बता दो तो ज़िंदगी की ग़ुलामी लिख दूंगा। और तो और नूर महल की छाया थाना शाहजहाँनाबाद के रास्ते मॉडल ग्राउंड तक एक रस एक जान हो गई है।
आज 07 जनवरी नगर के लब्ध प्रतिष्टित समाचार पत्र (दैनिक भास्कर,पृष्ठ 02 ) में समाचार दूसरी बार पढ़ा. एक बार शायद सप्ताह पूर्व भी पढ़ा था , की अब जनाब स्टैंड साहब एक बार फिर बतौर- ऐ - तफरीह अपना टोकरा - ए - तशरीफ़ ले कर निकलने वाले है , और इसबार नज़रें नव बहार सब्ज़ी मंडी पर इनायत है। मेरी शहर के हर आम ओ खास ,खास तौर पर शख्सीयत ए एहतराम , महापौर साहब को याद दिलाना चाहूंगा ,यह यूँ ही शहर काफी इलाकों की खूबसूरती को निगल चुका है,हलालपुर पर भी इसका असर दिख रहा है , अब बस स्टैंड के जिन्न को नादिरा बोतल से बहार न निकालें बल्कि बुधवारा नूर महल (नूर मियां के तालाब सहित )और मॉडल ग्राउंड आदि को इसके पंजों की खरोच के ज़ख्मों से निज़ात दिलाएं।
आमीन



व्यंग प्रस्तुत है .

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Dr.girijesh Saxena

Corporate/Business/Professional

Madhya Pradesh ,  INDIA

I am a born bhopali,Medical graduate of Gandhi Medical College Bhopal(1966batch),did Post graduation in Hospital Administration From ISSR,Christian University foundation Vellore{TN},MDBA(MBA)from Symbiosis Pune,PG in medico legal Systems from Symbiosis Pune,and Latest NABH standards implimentation program training.

Served Indian Army(Army Medical Corps) for 33 yrs,Medical Officer Incharge ECHS PolyClinic Bhopal 4-1/2 yrs,Medical Supdt JK Hospital Bhopal and now working independent Hospital planning and management councellor.

By hobby a hindi poet,and a free launce hindi/english writer in news papers/magazines

publications:1: Kamyab Safarnama:A monograph book with 16 biographies   of successfull sildiers sepoy to general who set examplary courrage and vellore after hanging uniforms to fight their resettlement/second carriers and gave their best to the society. 2. Prateekshalaya: hindi poems about 40 dipicting the agony of separation .

          

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