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गीता किसी भी धर्म विषेष का ग्रंथ नही है

गीता किसी भी धर्म विषेष का ग्रंथ नही है

अभिजात -आपका गीता का पद्यानुवाद पढा अच्छा लगा चर्चा मे मित्रो ने भी प्रशंसा  की है। इस तरह का पद्यानुवाद आपने किस उद्धेश्य से किया है।
प्रो. श्रीवास्तव -आदिकवि महर्षि वाल्मीकी द्वारा रचित रामायण और महर्षि व्यास (कृष्णद्वैपायन वेदव्यास) द्वारा सृजित महाभारत  संस्कृत साहित्य की प्रमुख रचनाये है। गीता महाभारत का ही एक अंश है .  भगवान कृष्ण ने अर्जुन को रणक्षेत्र मे गीता में संग्रहित  उपदेश के द्वारा उस समय समझाया है जब वह अपने क्षत्रिय कर्तव्य के प्रति हतोत्साहित हो चुका था और युद्ध करने को तैयार नहीं था।  युद्धक्षेत्र मे अपने सभी दूर पास के संबंधियो को देखकर उनसे लडकर मरने मारने का खूनी खेल , छोटे से राज्य के लिये करने हेतु वह मानसिक रूप से विचलित हो गया था। धर्म के पक्ष मे उसका लडना सर्वथा उचित था।  भगवान कृष्ण ने गीतोपदेश में केवल जीवन के वास्तविक सत्य को समझाकर , व्यक्ति को हर स्थिति मे अपना कर्तव्य करना सिखाया है। ये उपदेश हम सब के लिये दिशा दर्शक हैं अतः गीता किसी भी धर्म विषेष का ग्रंथ नही है . गीता मे जीवन मे क्या सही और क्या गलत है क्या करना उचित और क्या करना अनुचित है , यही तथ्य आध्यात्मिक ज्ञान देते हुये प्रतिपादित किया गया है . मनुष्य जाति के मनन करने और जीवन जीने के सूत्र गीता मे प्रस्तुत किये गये है , अतः गीता एक वरेण्य ग्रंथ है। चूंकि हिंदू सनातन धर्मावलंबियो ने श्री कृष्ण को ईश्वर का अवतार मानकर उनकी पूजा की है अतः यह भ्रांति है कि गीता हिंदू धर्म का  ग्रंथ है। वास्तव मे गीता समस्त मानव जाति के लिये एक महत्वपूर्ण अनुकरणीय पथप्रदर्शक ग्रंथ है। हर धर्मावलंबी के लिये उपयोगी है इसमे धर्म की  चर्चा नही मानव के कर्तव्यो की बात व विवेचना है . आज हिंदू धर्म मे गीता पूजी जाती है पर समझी  कम जाती है . संस्कृत जानने वाले दिन पर दिन घटते जा रहे हैं .मेरा मानना है कि अनूदित साहित्य को बढ़ावा देने से ही हिन्दी का भंडार बढ़ सकता है . इसलिये गीता जैसे विश्व ग्रंथ को हिन्दी पाठक काव्यगत आनंद के साथ समझ सकें इसी उद्देश्य से मैने यह अनुवाद किया है . प्रत्येक संस्कृत श्लोक के समानार्थी हिंदी भाषा के पद्य  मैने रचने का यत्न किया है .

अभिजात -संस्कृत भाषा के अध्ययन मे आपकी रूचि कैसे हुई ?
प्रो. श्रीवास्तव -संस्कृत भाषा मे मेरी रूचि विद्धार्थी जीवन से विकसित हुई। संस्कृत के  भावपूर्ण और गंभीर अर्थ वाले उपदेशात्मक श्लोक व सुभाषित संस्कृत की कक्षा मे प्रारंभिक रूप से जब पढने और कण्ठाग्र करने के लिये संस्कृत शिक्षक के द्वारा दिये गये तभी से संस्कृत भाषा के प्रति लगाव सा हो गया। आगे महाकवि कालिदास के ग्रंथो के चयनित श्लोको को पाठयपुस्तको मे पढने के प्रसंग आये इन्ही की मधुरता और अर्थगांभीर्य ने संस्कृत भाषा के प्रति रूचि बढाई। एक और भी कारण था ,घर मे सभी धार्मिक अनुष्ठान  पुरोहित जी द्वारा संस्कृत के मंत्रो द्वारा सपंन्न होते देखता था। उन मंत्रो का अर्थ नही समझता था। इसलिये मन मे भाव जागता था कि संस्कृत पढ लेने से पूजन विधि मे उपयोग मे लाये जाने वाले मंत्रो श्लोको को भी भलीभांति समझ सकूंगा। सनातन धर्म के सभी अनुष्ठानो मे संस्कृत भाषा का प्रयोग हजारो वर्षो से आज भी होता आ रहा है। अतः संस्कृत मृत भाषा नही है जैसा कि दुष्प्रचार किया जाता है .सच यह है कि संस्कृत भाषा अत्यंत सरस और सारगर्भित भाषा है , नासा ने इसे वैज्ञानिक भाषा के रूप में विश्लेषित किया है ।

अभिजात -श्रीमद्भगवत गीता के अतिरिक्त और किन संस्कृत ग्रंथो का आपने हिन्दी गद्य या पद्य अनुवाद किया है ?
प्रो. श्रीवास्तव .. कविता सदैव से मेरी प्रिय विधा रही है . मेरा मानना है कि पद्य में न्यूनतम शब्दो में अधिकतम भाव मधुरता से संप्रेषित किये जा सकते हैं अतः जो भी अनुवाद मैने संस्कृत ग्रंथो के किये वे सभी पद्यानुवाद छंदबद्ध व गेय हैं . कालीदास का अप्रतिम प्रेम काव्य मेघदूत जिसमें विरह श्रंगार का भावपूर्ण वर्णन है मेरा पहला अनुवाद कार्य था . मेघदूत में कवि ने कल्पना की है कि एक यक्ष अपने स्वामी की अवहेलना करता है जिस कारण उसे दण्ड स्वरूप अपनी नवविवाहिता पत्नी का वियोग सहते हुये कैलाश क्षेत्र अलकापुरी से निर्वासित कर रामगिरि पर्वत पर रहना पड़ता है . तब वह यक्ष आसमान में काले मेघो को देखकर उनके माध्यम से अपनी प्रेयसी के प्रति अपनी व्याकुलता व्यक्त करता है . कवि ने मेघो को दूत बनाकर उन्हें अलकापुरी तक जाने का मार्ग बतलाया है . विभिन्न सुन्दर कल्पनायें करते हुये प्रणय दृश्य दिखलाये हैं . मेघदूत कालिदास की अद्वितीय कल्पना पर पाठको को भाव विभोर कर देने वाला १२५ श्लोको का छोटा सा खण्ड काव्य है . मैं इसे पढ़कर इतना प्रभावित हुआ कि मूल ग्रंथ के छंदो में ही मैने पूरे मेघदूत का भावपद्यानुवाद कर डाला . कालिदास का ही एक बहुचर्चित ग्रंथ रघुवंशम् है . जो बहुत बड़ा है . रघुवंश में १९ सर्ग है व लगभग १९०० श्लोक हैं . इसके प्रथम दो सर्ग मैने अपने विद्यार्थी जीवन में पढ़े थे व इससे प्रभावित था . भगवान राम भारतीय संस्कृति के प्रमुख पात्र हैं , उनके विषय में कालिदास का अभिमत पढ़ने के उद्देश्य से श्री अग्रवाल पुस्तकालय मण्डला में जब मुझे रघुवंश की प्रति सुलभ हुई तो मैने उसका गहन अध्ययन किया . रघुवंश में कालिदास के प्रकृति वर्णन से भी मैं बेहद प्रभावित हुआ और अनायास इस महान ग्रंथ का पद्यानुवाद कार्य कर डाला .  इनके सिवाय संस्कृत के कुछ स्फुट पद्य खंडो का भी अनुवाद किया है जिनमें भागवत के दशम स्कंध के वेणु गीत अध्याय 21, श्लोक 20  , गोपिकागीत, अध्याय 31,  श्लोक 19, युगल गीत अध्याय 35,  श्लोक 26 , भ्रमरगीत अध्याय 47,  श्लोक 69 , गौओं और गोपो का दावानल से बचाया जाना अध्याय 19  श्लोक 16। कुल 150 श्लोक। आदिशंकराचार्य   रचित नर्मदाष्टक  का हिंदी रूपांकन अनुवाद भी किया है।

अभिजात ..  संस्कृत के सिवाय अन्य किन भाषाओ की रचनाओ का आपने  अनुवाद किया है ?
प्रो. श्रीवास्तव ..  अंग्रेजी की कुछ रचनाओ का हिन्दी अनुवाद तथा मराठी की कृति प्रतिभा साधन जो मूल रूप से पूना महाराष्ट्र के नामी साहित्यकार ना सी फड़के ने लिखी है का हिन्दी में अनुवाद किया है . प्रतिभा साधन नवोदित साहित्यकारो के लिये मार्गदर्शक ग्रंथ है . जब तत्कालीन सी पी एण्ड बरार के विदर्भ में मैं अपनी शिक्षकीय नौकरी के प्रारंभ में पदस्थ था तब खामगांव जिला बुल्ढ़ाना में मुझे फड़के जी को सुनने का अवसर मिला था . मैं उनसे प्रभावित हुआ और परिणाम स्वरूप हिन्दी के नवोदित रचनाकारो के लिये यह अनुवाद कार्य किया .

अभिजात -संस्कृत से हिंदी मे अनुवाद करने का आपका उद्धेश्य क्या रहा है और अनुवाद मे क्या कठिनाई अनुभव मे आई।
प्रो. श्रीवास्तव -संस्कृत के सतसाहित्य का हिंदी मे अनुवाद या रूपांतरण करने का प्रमुख उद्धेश्य सदा यही रहा है कि अनुवाद को पढकर अधिक से अधिक लोग संस्कृत साहित्य के रसास्वादन का लाभ ले सके और उनकी
संस्कृत सीखने मे रुचि बढ़े. आज जब सारा समाज साक्षर हो चला है तो ऐसे समय मे साहित्य के प्रति रूचि रखने वालो की संख्या भी बढनी चाहिये। जिनकी साहित्यीक रूचि होती है उन्हें अन्य भाषाओ मे रचित साहित्य के पढने की इच्छा भी होती है। यह इच्छा तभी पूरी हो सकती है जब विभिन्न भाषाओ के साहित्य का उनकी मातृभाषा या ज्ञात भाषा मे अनुवाद उपलब्ध हो। साहित्य के क्षे़त्र मे अनुवाद या रूपांतरण का अपना महत्व है। काफी पहले से ही साहित्यकारो के द्वारा यह कार्य संपादित किया जाता रहा है। परंतु आज के युग मे जब प्रचार प्रसार के अधिक साधन उपलबध है और जन संपर्क अधिक बढ गया है अनुवाद की विद्या साहित्य के क्षेत्र मे और अधिक उपयोगी होगी। इसका विस्तार किया जाना चाहिये। अन्य भाषा के साहित्य के पठन पाठन से विभिन्न भाषा भाषियो के बीच ज्ञान के साथ साथ आत्मीयता भी बढती है। यह सपंर्क और आत्मीयता  का भाव देश के एकीकरण और भावात्मक एकता के विकास मे भी परोक्ष रूप से सहायक हो सकता है।
 व्यक्तिगत रूप से पूछे तो मुझे पढने लिखने मे आनंदानुभूति होती है इसलिये जब मुझे कुछ प्रभावी भावमय साहित्य, मेरी जानकारी की अन्य भाषाओ में मिलता है तो मुझे उसका हिंदी मे रूपांतरण करने मे प्रसन्नता होती है और अनुवाद करना  रूचिकर लगता है यदि भाषा पर लेखक या अनुवादक का अधिकार हो और अध्ययन प्रशस्त हो तो सामान्यतः अनुवाद करने मे कठिनाई  नही होनी चाहिये। हां व्याकरण का ज्ञान जरूरी है हर भाषा की अपनी विषेषता होती है। अनुवादक को उसका ज्ञान जरूरी है . मुझे संस्कृत, अंगे्रजी व मराठी से हिदी मे अनुवाद करने मे कोई उल्लेखनीय कठिनाई कभी अनुभव नही आई। अनुवादक को भाषाओ के समानार्थी शब्दो का अच्छा ज्ञान होना चाहिये। पद्य मे अनुवाद करते समय छंद चयन शब्द चयन और भावाव्यक्ति महत्वपूर्ण होता है। साहित्यिक रूचि होने से मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई।

अभिजात -मै समझता हूं कि आपकी मातृभाषा हिंदी है इसमें किस विधा में आपका लेखन हुआ है?
प्रो. श्रीवास्तव -हां मेरी मातृभाषा हिंदी है . माता पिता कम पढे थे किंतु धार्मिक वृत्ति के संस्कारवान एवं समाज में प्रभावशाली थे। मेरी हाईस्कूल तक की षिक्षा मंडला के जगन्नाथ हाईस्कूल मे हुई थी। पूरे मंडला मे पूरे जिले मे तब यह एकमात्र हाईस्कूल था। छात्र जीवन से ही मुझे पढने मे रूचि थी। मैने लाइब्रेरी का अधिकाधिक उपयोग किया। नियमित रूप से पढने के कारण किताबे पढना एक आदत बन गई। रात को बिना कुछ पढे मै सो नहीं पाता। अब धार्मिक पुस्तके और आध्यात्मिक पुस्तके पढने मे अधिक रूचि है। लेखन भी एक नियम सा बन गया है। गद्य या पद्य मे कुछ ना कुछ लिखता रहता हूं . दोनो  विद्याओ मे काफी कुछ लिखा है। गद्य मे सामयिक आलेख निबंध इत्यादि है। तथा पद्य मे कविताये गीत गजल दोहे मुक्तक है। देशप्रेम,सामयिक समस्यायें,बढती हुई सामाजिक बुराईया ईश प्रार्थनायें,देवीगीत विभिन्न भारतीय त्यौहार इत्यादि मेरे प्रिय विषय है। महापुरूषो के जन्म दिन और पुण्यतिथियां उनके कर्मठ जीवन के संबंध में भी बहुत सी रचनायें हैं . विभिन्न एकल विषयों पर भी भावपूर्ण रचनाये है।


अभिजात -आपने लिखना कब से प्रारंभ किया एवं कौन कौन सी पुस्तके अब तक प्रकाशित हैं ?
प्रो. श्रीवास्तव -मुझे याद आता है कि मै जब कक्षा 9वी में पढता था तब स्कूल छात्रावास के गणेश उत्सव मे आयोजित कवि सम्मेलन मे पहली  स्वरचित कविता पढी थी। जो देश के तत्कालीन स्वतंत्रता संग्राम के भावों पर थी। उसके बाद  चुपचाप लिखता रहा। कहीं चर्चा नहीं की। पहली एक हास्य कविता आगरा के बाग मुजफुर खां से निकलने वाली पत्रिका नोकझोक मे संभवत सन 1947 मे छपी थी। उसके बाद इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली पत्रिका चांद
और सरस्वती मे कविताये छपी थी। फिर तब के सीपी एंड बरार प्रांत मे विदर्भ क्षेत्र मे अकोला मे शिक्षक  के रूप मे नियुक्त होने पर पारिवारिक एवं शासकीय कार्यभार से लेखन का कार्य धीमा हो गया। किंतु कवि जागृत था और जब जहां भाव आते रहे लिखता रहा। लेखन और संस्कृत से हिंदी अनुवाद कार्य मे पत्नी श्रीमती दयावती श्रीवास्तव का जो तब शिक्षिका थी और बाद मे म.प्र.  से कन्या उच्चतर माध्यमिक शाला मंडला के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हुई ,का सदा सहयोग रहा .
वे स्वतः संस्कृत की विदवान तथा स्वतंत्र लेखिका थी। शिक्षा महाविद्यालय जबलपुर मे प्राध्यापक रहते हुये लेखन कार्य मे गति आई। पुस्तकालय का भी लाभ मिला तभी शैक्षिक आलेख लिखे, पुस्तके भी छपी। देश प्रेम की साहित्यक कविताओ का संकलन वतन को नमन कारगिल युद्ध के समय छपा,तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी ने उसकी बहुत प्रशंसा की. काव्य कृतियो अनुगुंजन,ईशाराधन  एवं प्रगति प्रकाशन आगरा से प्रकाशित अनेक सामूहिक संग्रहो में रचनाये संकलित है। हाल ही  मानस के मोती प्रकाशित हुई है, जिसमें रामचरित मानस पर तथा विभिन्न विषयो पर आत्म चिंतन के आलेख है। रेडियो टीवी से प्रसारण तथा विभिन्न पत्र पत्रिकाओ मे लेख एवं कविताये निरंतर लिखता रहता हूं.

अभिजात -आपकी साहित्य के सिवा अन्य क्या रूचियां है।
प्रो. श्रीवास्तव -साहित्यिक अभिरूचि जिसमे पढना और लिखना शामिल है के सिवाय खेलो तथा बागवानी मे रूचि रही है। सांस्कृतिक आयोजनो मे सहभागिता करता रहा हूं , छात्र जीवन मे मै हाकी तथा बालीवाल खेलता था। जहॅ भी रहा बाग बगीचा स्वंय लगाता रहा। अब मेरी पुत्रवधू कल्पना ने बडी तत्परता से बागवानी का यह कार्य संभाल लिया है। आज भी घर मे सुदर बगीचा है।


अभिजात -क्या आपने संपादन कार्य भी किया है।
प्रो. श्रीवास्तव -प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय मे छात्र शिक्षक परिषद के सक्रिय सचिव के रूप  मे अनेक संपादकीय कार्य किये। इसके अतिरिक्त केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक 1 जबलपुर संस्थापक प्राचार्य के रूप में वार्षिक पत्रिका पयस्वनी प्रारंभ की थी जिसका संपादन किया। मै जिस भी संस्था मे प्राचार्य रहा वहां छात्रो की रचना धर्मिता को विकसित करने हेतु वार्षिक पत्रिका प्रकाशित की .जूनियर कालेज सरायपाली जो वर्तमान मे छत्तीसगढ मे है की वार्षिक पत्रिका उन्मेष तथा बीटीआई मंडला से प्रकाशित वातास प्रमुख है,जगन्नाथ हाईस्कूल मंडला की पत्रिका अर्चना को  पुरस्कार भी मिले है।

अभिजात -क्या आपके द्वारा सृजित साहित्य वाद विशेष या किसी खास विचारधारा का पोषक है।
प्रो. श्रीवास्तव -जी नही। अपनी जानकारी मे मैने कभी किसी विषेष विचारधारा का पोषण नहीं किया। जो सामाजिक समस्याये मेरा ध्यान आकर्षित करती रही है उन्ही पर मेरी कलम चली है। इस दृष्टि से मेरे साहित्य मे सामयिक समस्याओ पर केन्द्रित अनेक रचनाये है।

अभिजात -क्या आप किसी विषेष लेखक संघ के सदस्य के रूप मे सक्रिय है?
प्रो. श्रीवास्तव -मै प्रांरभ से ही किसी संघ या समूह की विचारधारा से दूर रहा हूं.स्वतंत्र कवि एवं लेखक के रूप में लिखता रहा हूं,  स्थानीय साहित्यक संस्थाओ के सदस्य के रूप मे खुले मनोभाव से जुडा रहा हूं,1947 या उससे कुछ पहले मंडला मे हम कुछ कवियो ने हिंदी साहित्य समिति का गठन किया था। जो आज भी कार्यरत है। हर साहित्यक संस्था के प्रति मेरा आदर भाव और लगाव है।

अभिजात -साहित्यिक सम्मान किन संस्थाओ से प्राप्त हुआ।
प्रो. श्रीवास्तव -परीक्षाये उत्तीर्ण कर मैने  साहित्य विशारद, साहित्य रत्न की उपाधियां हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग से 1953 के पूर्व प्राप्त की  थी। अनेको संस्थाओ से लगभग प्राय सभी किताबो पर एवं निरंतर साहित्य सृजन के कारण अनेक साहित्यक सम्मान मिले। दिल्ली,मेरठ,मथुरा,भोपाल,जयपुर , मंडला तथा जबलपुर की अनेक साहित्यक सांस्कृतिक संस्थाओ ने अनेक अवसरो पर सम्मानित किया। किंतु आजकल जो प्रथा चल रही है कि संस्थायें आर्थिक सहयोग लेकर  सम्मान करती हैं वह मुझे पसन्द नही , अतः ऐसे प्रस्तावो पर मैने कभी विचार नही किया .

अभिजात - आपकी पुस्तको का प्रकाशन कब और कहां से हुआ ?
प्रो. श्रीवास्तव -विभिन्न पुस्तको का प्रकाशन अलग अलग प्रकाशको के द्वारा हुआ। जिनमे मंडला ,जयपुर ,दिल्ली ,जबलपुर, मुबंई ,आगरा ,प्रयाग ,करनाल आदि के प्रकाशको से पुस्तके प्रकाशित हुई हैं . आगामी कुछ किताबें जयपुर से छप रही हैं .

अभिजात ..आधुनिक प्रकाशन  तकनीक पर आपकी टिप्पणी।
प्रो. श्रीवास्तव -प्रिटिंग की सरलता और सुविधा होने से कम्पयूटर के कारण अब पुस्तको का छपना बहुत सरल हो गया है। प्राय हर साहित्यकार की पुस्तके प्रकाशित होती दिखती है। पुस्तक छपाने मे अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिये भी आजकल लोग किताबे छपवा रहे है। पर मेरी समझ मे हर प्रकाशित पुस्तक का प्रसार और पठन पाठन कम ही होता है। सभी स्तरीय भी नहीं होती। कविताओ की किताबे ज्यादा छपवाई जा रही है। और पब्लिसिटी के लिये विजिटिंग कार्ड की तरह बांटी भी जाती है। किंतु पढी कम जाती है।

अभिजात ..क्या आज टीवी के युग मे पुस्तके कम पढी जाती है और उनकी उपादेयता पहले से कम हो गई है।
प्रो. श्रीवास्तव -ऐसा नही है। यह सही है कि टीवी के आने से लोगो का समय पढने मे कम और देखने मे अधिक जाता है परंतु पुस्तको का अपना महत्व है जो स्थाई है वह कभी कम नहीं होगा। पुस्तको का उपयोग दीर्धकालीन तथा बहुआयामी है। विभिन्न विषयो का पूर्ण ज्ञान पुस्तको से ही होता है। टीवी से यह संभव नहीं है। टीवी से क्षणिक ज्ञान या मनोरंजन मिल सकता है। सदंर्भ हेतु पुस्तको का ही उपयोग होगा। इसलिये पुस्तके ज्ञान की अमर निधी है। अच्छी पुस्तको को पुस्तकालयो मे सुरक्षित रखा जाता है जो शोध कार्यो मे सदंर्भ ग्रंथो के रूप मे उपयोग होती है। ज्ञान की परिपक्वता के लिये पुस्तको का अध्ययन जरूरी है। इसीलिये पुस्तको के प्रकाशन मे कोई कमी नहीं आई है। जमाने के बदलाव के साथ मनोरंजन के लिये पुस्तको का उपयोग अवश्य कम हुआ है पर ज्ञान की गहराई पाने को पुस्तको का सरंक्षण और उपयोग सदा आवश्यक रहा है और आगे भी रहेगा। पुस्तको के बिना सदगुणी और ज्ञानवान समाज की कल्पना  कठिन है।


अभिजात -पुस्तको के मान सम्मान की दिशा मे भविष्य क्या अच्छा नहीं दिखता ?
प्रो. श्रीवास्तव -पुस्तको का मान सम्मान सदा रहा है और रहेगा यह मैने पहले ही कहा है। ज्ञान का दिनो दिन विस्तार हो रहा है गुणवत्ता मे भी और संख्यात्मकता में  भी. अब शिक्षा अनिवार्य अधिकार के रूप मे निर्धारित की गई है। इससे पढने वालो की संख्या निरंतर बढती जायेगी और पुस्तको की जरूरत भी बढेगी। पाठय पुस्तक के साथ हर विषय के सदंर्भ ग्रंथ भी जरूरी है। पढने वाले बढेगें, पढाने वाले बढेगें। नई नई खाजो मे लोग प्रवृत्त होगें। इससे संदर्भ ग्रंथ आवश्यक होगें। वैज्ञानिक विषयो पर भी हिंदी में लेखन बढेगा। लोगो की रूचिया परिमार्जित होंगी। साहित्य ही व्यक्ति के जीवन मे सदाचार व्यवहार व्यवस्था तथा अनुशासन की प्रेराणा देता है। साहित्यकार भी अधिक होगें। इसलिये साहित्य और पुस्तको का भविष्य उज्जवल है। पुस्तको के मानसम्मान को लेकर कमी की आशंका उचित नही है .

अभिजात -आपकी किताबे किन पुस्तकालायो मे सुलभ है।
प्रो. श्रीवास्तव -राजराममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन कलकत्ता को मेरी सभी पुस्तके भेजी गई है। इसके अतिरिक्त मंडला, जबलपुर ,भोपाल के विभिन्न ग्रंथालयो मे भी या तो किताबे खरीदी गई है या मेने स्वंय भेट की है। जब भी कही अन्य शहरो मे भ्रमण पर जाता हूं तो वहां पुस्तकालयो में किताबें भेंट करना मुझे अच्छा लगता है। मेरी किताबे नैतिक कथाये, आदर्श भाषण कला, जनसेवा, अंधा और लंगडा, कर्मभूमि के लिये बलिदान आदि स्कूलो के पुस्तकालय हेतु चयनित हुई , अतः देश के प्रायः अनेक स्कूलो में हैं। इसके अतिरिक्त संस्कृत एवं हिंदी पाठयपुस्तको से संबंधित किताबें भी विभिन्न शालाओ में सुरक्षित है।

अभिजात -आपके पारिवारिक जीवन के संबंध मे भी कुछ जानने की उत्सुकता है।
प्रो. श्रीवास्तव - मेरा पारिवारिक जीवन बचपन से ही संघर्षमय किंतु शांत और सुखद रहा। छात्रजीवन से ही शिक्षकीय कार्य प्रिय था। अतः शासकीय हाईसकूल मे सन 1948 मे विदर्भ के अकोला नगर मे शिक्षक के रूप मे कार्य प्रारंभ किया।ईश्वर कृपा से मन के अनुसार पदोन्नतिया मिलती रही और शासकीय शिक्षामहाविद्यालय जबलपुर से प्राध्यापक के रूप मे सेवानिवृत हुआ। जबलपुर मे प्राध्यापक के पद के समान प्रशासनिक पद संभागीय शिक्षण अधीक्षक ग्वालियर के पद पर स्थानांतरित होने पर शिक्षकीय कार्य अधिक रूचिकर होने के कारण मैने उसे स्वीकार नही किया। जूनियर कालेज सरायकाली तथा केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक 1 जबलपुर के संस्थापक प्रचार्य के रूप मे भी कार्य करने का अवसर मुझे मिला। मंडला मे मेरी पत्नी ,प्राचार्य उच्चतर माध्यमिक विधालय थी। उन्होने घर और बच्चो  की बडी जिम्मेदारी संभाली। मेरा एक पुत्र एवं तीन पुत्रिया है। सभी ने स्नातकोत्तर शिक्षा पाई है .  और जीवन में सब सुखी है। चिरंजीव विवेक रंजन मध्य प्रदेश विद्युत मंडल में अधीक्षण अभियंता है। वे स्वंय भी बहुत अच्छे रचनाकार है एवं उनकी अनेक किताबे प्रकाशित हुई हैं। मेरी तीन बेटियां हैं . जबलपुर ,पूना व मुम्बई मे वे सभी अपने परिवारो में सुखी है।बच्चो में साहित्यिक संस्कार हैं .  अगली पीढी के सभी बच्चे बच्चिया भी इंजीनियर डाक्टर तथा बैंको मे कार्यरत है। उनकी ओर से भी मैं निश्चिंत  हूं.लंबी सेवा और अनुभवो के बाद अब हर प्रकार से सुखी तथा प्रसन्न हूं . चिरजीव विवेक की दो लडकियां और एक पुत्र है। वे तीनो राष्टीय स्तर के उच्च संस्थानो के शिक्षा पा रहे है। जीवन मे ईश्वर की इस कृपा के लिये मै परमात्मा का बढा आभारी हूं..भगवान पर मेरी व मेरे परिवार की अगाध श्रृद्धा है। अब सरस्वती उपसना ही मेरा प्रिय दैनिक कार्य रह गया है। आध्यात्मिक रूचि अब प्रधान है।
आपने जो चर्चा व रूचिकर वार्तालाप किया उसके लिये हार्दिक धन्यवाद।
 संपर्क
अभिजात कृष्ण त्रिपाठी
प्राचार्य  , जानकी रमण महाविद्यालय


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